जाने मन ढूंढता क्यों है
पाकर स्नेह सम्भलता क्यों है
ठहर न पाया जो सदियों तक
उसके लिए सिसकता क्यों है
स्वप्न दिखा ज्यों बीते पल के
बस उसमें चमकता क्यों है
समझ न पाया क्या थी नेमत
फिर उससे डरता क्यों है
चाहत की अनुभूति फिर भी
हर पल वह लुढ़कता क्यों है
पा सदियों का स्नेह पलों में
न जाने तरसता क्यों है
कुसुम कामना वह काम आए
फिर कलियां मुरझाता क्यों है ?
- कुसुम ठाकुर -



