बनें आधुनिक

बनें आधुनिक बोलें हर इक बात में
लेकिन मोल चुकाएँ उसके साथ में

 यूँ बातों में कहें लोग कुछ भला-बुरा 
 नहीं मगर यह दिल बदला आघात में

 क्या दिन थे जब बैठे हम बिन बात भी
 अब फुरसत है कहाँ किसे दिन रात में

 खोल कलम दिल के भावों को लिखते थे
 अब तो नकली प्रेम दिखे सौगात में

 प्रेम सरोवर में ये 'कुसुम' रहे खिलती
जगह न हो कटुता की उसकी बात में।

सपनो का भारत

सपनो का भारत

हो न अमन की कमी इस जहां में
मिलजुल तब रहें इस जहां में 

हर विस्थापितों को मिले आशियाना
रहे अनाथ ना कोई इस जहां में 

आतंक के आतंक का हो खात्मा
उन्हें भी प्यार मिले इस जहां में 

बागों में खिले हर इक कली
कहीं कुम्भला न जाए इस जहां में

अधिकार हर औरत को यूं मिले
हक के लिए न लड़ें इस जहां में

नेता हम चुने अपने विवेक से 
धर्म के नाम पर न बटें इस जहां में 

फर्क बेटे बेटियों का जब मिटे
इज्जत भी तब मिले इस जहां में 

फूलों में खुशबू हो तभी  
कुसुम न बने मौसमी इस जहां में

निज स्वार्थ से ऊपर रहे देश हित
यही सपनो का भारत इस जहां में 

© कुसुम ठाकुर