लोकतंत्र बीमार है

 "लोकतंत्र बीमार है"

लोकतंत्र बीमार अब, है जनता में रोष।
इक दूजे पर थोपते, अपना अपना दोष।।

बातें जन-हित की करें, स्वार्थ न करते दूर।
आम लोग सच जानते, साथ चले भरपूर।। 

जागो देश निवासियों, नहीं हुई है देर  ।
बनी रहे बस एकता, दुश्मन होंगे ढेर।।

नहीं गुलामी देश में, फिर भी है संताप।
छोड़ गये अंग्रेज पर, शेष रह गयी छाप।।

प्रकृति नियम हरदम यही, होंगे ही बदलाव।
बहे हवा के संग कुसुम, उससे नहीं लगाव।।


-कुसुम ठाकुर-

सपनो में बस जाते हो


"सपनो में बस जाते हो"

कुछ बरसों का साथ रहा पर याद बहुत तुम आते हो
जानूँ वे पल फिर न आए, तुम सपनो में बस जाते हो

वे क्षण कितने प्यारे होते नैन जहाँ सब कह जाते
इक दूजे को समझ गए तो खुद को क्यूँ भरमाते हो

साथ नहीं मन का छूटा, बस आँखें न मिल पातीं हैं
मीत भिज्ञ हो कारण से तुम प्रश्न नया क्यों लाते हो

न बसंत न मेघ रिझाता, न भंवरों के गीत मुझे
ताल तलैया न सूखे क्यूँ अश्क से प्यास बुझाते हो

कला है जीना गर जीवन तो, कलाकार प्रेमी माला
कुसुम के सपनों को गीतों से आकर रोज सजाते हो

-कुसुम ठाकुर-   

तेरा दिया ही लाई हूँ

 

"तेरा दिया ही लाई हूँ"

 हूँ तो माँ इक तुच्छ उपासक,द्वार पे तेरे आई हूँ। 
कैसे कहूँ लोभ नहीं है,सब तेरा दिया ही लाई हूँ। । 

न मैं जानूँ आरती वंदन,स्वर में भी कम्पन मेरे। 
 दर्शन की प्यासी हूँ मैया,इसी उद्देश्य वश आई हूँ। 

बीच भंवर में नाव है मेरी,खेवनहार तुम्ही हो कहूं।  
शरणागत की रक्षा करती,माँ यही गुहार लगाई हूँ।  

मन में मेरे पाप का डेरा,सेवा में अर्पण क्या करूँ।   
तू माता लेती सुधि सबकी,बस यही राग मैं गाई हूँ।   

है मेरा मन चंचल मैया,मन के भाव कहूँ कैसे 
तुमको कहते अन्तर्यामी,इस द्वार पे साहस पाई हूँ।   

-कुसुम ठाकुर-  

मैं न उसमे बही सही


"मैं  उसमे बही सही"

मैंने मन की कही सही 
जो सोचा वह सही-सही 

भूली बिसरी यादें फिर भी 
आज कहूँ न रही सही 

 कितना भी दिल को समझाऊँ  
आँख हुआ नम यही सही 

वह रूठा न जाने कब से 
प्यार अलग सा वही सही 

रंग अजब दुनिया की देखी 
मैं न उसमे बही सही 

- कुसुम ठाकुर- 


भय हरण कालिका


"भय हरण कालिका"

जय जय जग जननि देवी
सुर नर मुनि असुर सेवी
भुक्ति मुक्ति दायिनी भय हरण कालिका।
जय जय जग जननि देवी।

मुंडमाल तिलक भाल 
शोणित मुख लगे विशाल 
श्याम वर्ण शोभित, भय हरण कालिका।
जय जय जग जननि देवी ।

हर लो तुम सारे क्लेश 
मांगूं नित कह अशेष 
आयी शरणों में तेरी, भय हरण कालिका ।
जय जय जग जननि देवी ।

माँ मैं तो गई हूँ हारी 
 माँगूं कबसे विचारी 
करो अब तो उद्धार तुम, भय हरण कालिका ।  
जय जय जग जननि देवी ।

-कुसुम ठाकुर-  

क्या आत्म हत्या करना किसी दुःख का हल है?

अचानक सुबह में मेरी एक सहेली का फ़ोन आया और उसने कहा "पता है मि. मुर्मू की बेटी ने आत्म हत्या कर ली अभी उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा है".  यह सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई. अपने बालकनी में जाकर खड़ी हो गई और जो दृश्य देखी वह देख मैं विचलित हो गई. आगे आगे मालिनी का शव कंधे पर लिए चार लोग और पिता छतरी को मालिनी के सर पर ताने बढ़ रहे थे, पीछे पीछे पूरा परिवार रोते बिलखते मालिनी को अंतिम विदाई देने के लिए. मालिनी के पार्थिव शरीर को एक फूलों से लदे ट्रक पर डाल दिया गया. जिस बेटी या बच्चे को छोटी सी चोट लगने पर माँ बाप बेचैन हो जाते हैं आज उसे ही अग्नि देव को सुपुर्द करने ले जाते समय उनकी मानसिक स्थिति का सोच मेरा मन रो उठा. पर मैं सबसे ज्यादा उस समय द्रवित हुई जब पत्रकारों का एक समूह उस गमगीन घडी में भी होड़ लगाये हुए थे कि कौन सबसे नजदीक और अच्छी तस्वीर ले सकता है. उस होड़ में वे दुःख में डूबे परिजनों को बगल हटने या पीछे जाने के लिए भी कह रहे थे. 

श्री मुर्मू और श्रीमती मुर्मू मेरे पड़ोस में रहते हैं. बड़ी बेटी मालिनी का इसबार आई आई एम बंगलौर में दाखिला दिलाने के बाद वे बहुत ही खुश थे. उन्हें क्या पता था कि उनकी यह ख़ुशी जल्द ही दुःख में परिवर्तित हो जायेगा. किसी से मालिनी को प्रेम हो गया था पर उस प्रेमी द्वारा फेस बुक स्टेटस में "filing super cool, dumped my new ex girl friend, happy independence day" को मालिनी बर्दाश्त नहीं कर पाई और suicide note लिखकर लैपटॉप के पास छोड़ अपने हॉस्टल में फाँसी लगाकर आत्म हत्या कर ली. आज के ज़माने में जीवन की रफ़्तार इतनी तेज़ है कि लोगों को किसी के भावना का भी जरा सा ख्याल नहीं रहता. इस भौतिकवादी ज़माने में बहुत कम व्यक्ति हैं जो भावनाओं को अहमियत देते हैं. अहम की भावना भी आज की पीढ़ी में बढ़ता जा रहा है बर्दाश्त करने की शक्ति तो जैसे नगण्य होता जा रहा है. 

क्या आत्म हत्या करना ही किसी भी दुःख का अंत या हल है ? 

सदा मीत सँग भोर

  "सदा मीत सँग भोर"


जीवन जीने की कला मिला तुम्ही से मीत 
लगता है इस मोड़ पर बढ़ा और भी प्रीत 


गहरे होते भाव जितने होते उतने ही गंभीर 
बिना शब्द ही कह गए यह नैनो की तासीर 


ह्रदय सदा ही ढूँढता मिलन हुआ संयोग 
कहने को तो है बहुत पर कैसे सहूँ वियोग 


स्त्रोत प्रेरणा का मिला कहूं न सृजनहार 
दिशा दिखाया आपने हुआ यही उपकार 


मन का दर्पण खोलकर हुए जो भाव विभोर 
कुसुम कामना सँग लिए सदा मीत सँग भोर 


-कुसुम ठाकुर-

हार मिले न हार बिना

 

"हार मिले न हार बिना "

सूना जीवन प्यार बिना 
नीरस होता यार बिना  

कला नहीं जीवन जीने की    
पर पलता व्यवहार बिना  

दिल में उपजे प्रणय-भाव पर 
यह सजता अभिसार बिना 

आशा हो पर ना हो बन्धन 
हार मिले न हार बिना  

कठिन बाँधना कुसुम प्रेम को  
बढ़ता नित उपहार बिना 

- कुसुम ठाकुर-  



मुझे आज मेरा वतन याद आया



 "मुझे आज मेरा वतन याद आया"

मुझे आज मेरा वतन याद आया।
ख्यालों में तो वह सदा से रहा है ,
 मजबूरियों ने जकड़ यूँ रखा कि,
मुड़कर भी देखूँ तो गिर न पडूँ मैं ,
यही डर मुझे तो सदा काट खाए ।
मुझे आज ......................... ।


छोड़ी तो थी मैं चकाचौंध को देख ,
 मजबूरी अब तो निकल न सकूँ मैं,
करुँ अब मैं क्या मैं तो मझधार में हूँ ,
इधर भी है खाई, उधर मौत का डर ।
मुझे आज ............................... ।


बचाई तो थी टहनियों के लिए मैं ,
है जोड़ना अब कफ़न के लिए भी ।
काश, गज भर जमीं बस मिलता वहीँ पर ,
मुमकिन मगर अब तो वह भी नहीं है ।
मुझे आज ................................ ।


साँसों में तो वह सदा से रहा है ,
मगर ऑंखें बंद हों तो उस जमीं पर।
इतनी कृपा तू करना ऐ भगवन ,
देना जनम  निज वतन की जमीं पर ।
मुझे आज .................................. ।

-कुसुम ठाकुर-

किस तरह


"किस तरह"

तुमको चाहा है मगर तुमको बताऊँ किस तरह 
 आँखों में जुबाँ नहीं तो सुनाऊँ किस तरह  

 भूलकर दर्द जुदाई का ना मिलती खुशियाँ 
 जफ़ा के आसुओं को अब बहाऊँ  किस तरह

 भूलना है कठिन बहुत जो पल थे यादों के 
 वो सभी यादें अभी दिल से मिटाऊँ  किस तरह

  अगर नहीं है बेबसी तो बेड़ियाँ कैसी 
  वफ़ा की चाहतें जो दिल में निभाऊँ किस तरह

 हर कदम साथ हो कुसुम की ख्वाहिश इतनी 
 मगर अकेले अब कदम को बढाऊँ  किस तरह

-कुसुम ठाकुर- 

हरएक आँख में नमी


"हरएक आँख में नमी"


लगे अमन की कमी इस खूबसूरत जहाँ में
बँटी हुई क्यों जमीं  इस खूबसूरत जहाँ में

कर्म आधार था जीने का कैसे जाति बनी 
हरएक आँख में नमी इस खूबसूरत जहाँ में

जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों  
गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में

सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर 
भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में

यूँ तो मालिक सभी का एक नाम कुछ भी दे दो  
कुसुम बने न मौसमी इस खूबसूरत जहाँ में

-कुसुम ठाकुर-

जो कह न सको तो


"जो कह न सको तो"

 वो भी कैसा प्यार जो कह न सको तो 
दिल में उठे बयार जो कह न सको तो

यूँ दूरियाँ सही पर दिल के करीब है जो 
मिलने का इंतजार जो कह न सको तो 

लम्बे सफर के सँग ही मजबूरियाँ बहुत 
आयेगा क्या करार जो कह न सको तो 

क्या प्यार रह सका है वश में किसी के   
 होते हैं दिल पे वार जो कह न सको तो 

दिल में उसे बसाया जो स्वप्न था कुसुम का 
दीदार में है प्यार जो कह न सको तो 

- कुसुम ठाकुर-

नहीं है प्रेम की सीमा

"नहीं है प्रेम की सीमा"

छवि बसती जो नैनों में उसे झुठलाया नहीं जाता
प्रेम का पाश बंधने पर उसे सुलझाया नहीं जाता

डूब जाए अगर प्रेमी  झील सी गहरी आँखों में
नयन चार जब हो जाए तो शरमाया नहीं जाता

विकलता इंतजारी में धैर्य की क्या बने सीमा
मिलन को प्रेमी जब आतुर उसे तड़पाया नहीं जाता

समर्पण भाव से जब है झिझक फिर छोड़ना लाजिम
ख़ुशी और गम ह्रदय में जब उसे बिसराया नहीं जाता

नहीं है प्रेम की सीमा निहित हो भाव कोमल सा 
कुसुम कोमल उसे काँटों से सहलाया नहीं जाता 

-कुसुम ठाकुर-

था मेरा सचमुच कभी


 "था मेरा सचमुच कभी"

उड़ सकूँ स्वछन्द होकर सोचा नहीं था यह कभी  
मन के तारों से बंधूँ हो न सका मुमकिन कभी

नभ में तारा दिख गया इक थी चमक सबसे अलग
खोजती उसको थी कब से था मेरा सचमुच कभी  

चांदनी भी श्वेत चादर ओढ़कर हँसती है जब 
निस्तब्धता की वो तरंगे आ चूम लेगी फिर कभी

सीप अपना मुँह खोले राह कब से तक रहा है
बूँद स्वाति की गिरेगी आएगा वो दिन कभी

ओस बूंदों को समेटे देख निशिकर मुस्कुराये
और कुसुम रवि- तेज सहकर कुम्भला जाए न कभी  

-कुसुम ठाकुर- 

न जाने क्यों आज विकल है


"न जाने क्यों आज विकल है"

मीत मिला तो भाग्य प्रबल है 
जीवन नश्वर भाव अचल है 

रह के दूर पास में दिल के 
क्या शिकवे की यहाँ दखल है 

उत्सर्गों का नाम प्यार है 
न पाकर भी जन्म सफल है 

प्रीत है बन्धन कई जन्मों का
हृदय धैर्य फिर कहाँ विफल है

कुसुम तो खिलकर हँसना जाने 
न जाने क्यों आज विकल है

-कुसुम ठाकुर-

दुःख के दिन भी कट जायेंगे


"दुःख के दिन भी कट जायेंगे"

सुख के दिन न रहे सदा तो
दुःख के दिन भी कट जायेंगे

भाग्य समझ मनमीत मिले तो  
सहज सफ़र फिर हो जायेंगे

जीवन में सद्भाव अगर हो
भाव प्रेम के क्यूँ कम होंगे  

एक है मांझी नाव कई है
धैर्य धरो हम नाव चढ़ेंगे 

भाग दौड़ है इस जीवन में
ठहरावों पर गले मिलेंगे  

 -कुसुम ठाकुर-

आस है ऋतुराज से


"आस है ऋतुराज से"

आज रूठूँ किस तरह जब पूछने वाला नहीं 
दिल के कोने में छिपा गम ढूँढने वाला नहीं

ढूँढती है ये निगाहें हर तरफ मुमकिन अगर
कैसे कम हो दर्द दिल का बाँटने वाला नहीं

रुख हवा का मोड़ दूँ है दिल में हलचल इस तरह
अनुभूतियाँ स्पर्श की पर चाहने वाला नहीं  

तान छेड़ूँ सप्त सुर में रागनी ऐसी कहाँ
संगीत की गहराईयों में डूबने वाला नहीं 

आस है ऋतुराज से नव कोपलें हों फिर कुसुम  
पत्तियाँ फिर से न सूखे सींचने वाला नहीं 

- कुसुम ठाकुर-

कर में हरसिंगार


"कर में हरसिंगार"

श्वेत केसरिया कोमल सुन्दर 
हो तुम सौम्य प्रतीक 
नम्र भाव को देख कर
भक्त हुए नत शीश 

तुमसे महके चारों दिशाएँ 
हो भक्तों के भक्त 
कष्ट भी उनके सोचते 
गिरो भूमि यह रीति 

देख तुम्हारी नम्रता 
हुए भक्त विभोर
भूमि दोष देखे नहीं
देव चढ़ावें शीश

कद में छोटे हो मगर
सौरभ मन को भाए
सूचना आगमन का
फल होगा सुखदाय

तन्मय होकर चुन रही
चेहरे पर मुस्कान
शिव की करूँ आराधना  
कर में हरसिंगार 

-कुसुम ठाकुर- 

मौन तराना सीख लिया


"मौन तराना सीख लिया"

तिमिर से रिश्ता है मेरा तो उसमे जीना सीख लिया 
छूटे रिश्ते, तन्हाई के जहर को पीना सीख लिया 

यादें आतीं वो बसंत जो बरसों पहले छूटा 
दूर भले पर यादों में अब पास बुलाना सीख लिया 

मिलते हैं कुछ लोग मुझे वे भीड़ में तन्हा जीते हैं 
 मीत बनाकर तन्हाई को हाथ मिलाना सीख लिय़ा

 थिरक रही अब उन यादों में झूले मन सावन के
फ़िक्र करूँ क्या इस दुनिया की मौन तराना सीख लिया 

जब हुई जुदाई बगिया से कुछ कुसुम गए देवालय तक
कुछ को सुन्दर सी परियों ने जूड़े में सजाना सीख लिया 

- कुसुम ठाकुर- 

तुम हो वही पलाश

 

"तुम हो वही पलाश"

सौंदर्य के प्रतीक 
तुम हो गए विलुप्त 
देख तुम्हें मन खुश हो जाता 
भूले बिसरे आस
तुम हो वही पलाश 

वह होली 
न भूली अबतक 
पिया प्रेम ने रंग दी जिसमे
दमक उठा मेरा अंग रंग  
तुम हो वही पलाश

खेतों के मेड़ पर
  खाली परती जमीन पर
न लगता अब वह बाग़ 
अब कैसे  चुनूँ हुलास 
 तुम हो वही पलाश

वह बसंत
क्या फिर आया 
पर खुशबू ही भरमाया
न भूली कभी बहार 
तुम हो वही पलाश 

-कुसुम ठाकुर-

सावन आज बहुत तड़पाया


"सावन आज बहुत तड़पाया"

फिर बदरा ने याद दिलाया 
पिया मिलन की आस जगाया 

तड़पाती है विरह वेदना 
सोये दिल की प्यास बढ़ाया

कट पाये क्या सफ़र अकेला 
बस जीने की राह दिखाया

पतझड़ बीता और वसंत भी
सावन आज बहुत तड़पाया

आदत काँटों में जीने की
जहाँ कुसुम हरदम मुस्काया

-कुसुम ठाकुर- 

दर्द की सौगात दूँ मैं


"दर्द की सौगात दूँ मैं"

 है इबादत इश्क तो संगीत से पूजा करूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं

तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं

भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं

कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं

प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं

-कुसुम ठाकुर-

इबादत - ईश्वर की उपासना, पूजा 
मुकम्मल - पूर्ण, पूरा
तिश्नगी - प्यास, पिपासा 
संजीदगी - गंभीरता 

रास्ते मुश्किल पड़ी है


"रास्ते मुश्किल पड़ी है"

 याद आए जो घडी अब, वो घडी मुश्किल बड़ी है
देख जिसको मुस्कुराऊँ, क्या कोई मुमकिन कड़ी है

हो के विह्वल कह दूँ सारी, बातें दिल की सोचती
बेड़ियाँ भी कम नहीं है, रास्ते मुश्किल पड़ी है

नैन समझे सब इशारे, दर्द सहकर कह न पाए
हो किनारे कह सकूँ पर, वो बहुत नाजुक घड़ी है

तोड़ के बंधन सभी गर, कह सकूँ जज्बात दिल के
क्यूँ लगे आघात दिल को, आंसुओं की ये लड़ी है

है कुसुम की कामना, हर स्वप्न ही तुमसे सजेंगे
मुस्कुराऊँ याद में फिर, भाव की ऐसी लड़ी है

-कुसुम ठाकुर- 

मन जाने क्या क्या कहता है


"मन जाने क्या क्या कहता है"

मन तो प्रतिपल ही बहता है 
पर बंधन का दुःख सहता है 

उठ तरंग जब छू ले मन को 
तब तब मन चंचल रहता है 

जब तरणी में बैठकर डोले 
मन जाने क्या क्या कहता है  

जब अपनों से चोट लगे तो 
बना खंडहर मन ढहता है 

सफल कुसुम जीवन है उसका 
सच्चे प्रेमी संग रहता है

- कुसुम ठाकुर-  

नैन बहुत कुछ कह जाते हैं


"नैन बहुत कुछ कह जाते हैं"

नैन बहुत कुछ कह जाते हैं, कितना भी इन्कार करो 
मगर समर्पण मूल प्रेम का, यह भी तो इकरार करो 

प्रेम की सीमा उम्र नहीं है जानो, मत अनजान बनो 
भले ह्रदय में द्वन्द के कारण, चाहो तो इज़हार करो 

बनो नहीं नादान कभी तुम, समझो सभी इशारों को 
और समेटो हर पल खुशियाँ, कभी नहीं तकरार करो 

चार दिनों का यह जीवन है,प्रेम फुहारें हों सुरभित 
कहीं वेदना अगर विरह की, उस पल को भी प्यार करो 

काँटों में रहकर जीने की, कला कुसुम ने सीख लिया 
देर हुई है मत कहना फिर, आकर के स्वीकार करो 

-कुसुम ठाकुर- 

नहीं समझे?


"नहीं समझे"


दुखी करना नहीं जानूँ, मगर दुःख तुम नहीं समझे
उलझना क्यों है शब्दों में, अभी तक तुम नहीं समझे  


मेरी उलझन मेरी बातें, न खुद समझी यही गम है
मैं चाहूँ पर मेरी चाहत, अभी तक तुम नहीं समझे


इशारे भी चिढाते हैं, करूँ फिर व्यक्त मैं कैसे 
है जीना मूक बनकर क्यों, न सोचा जो वही समझे 


है कहने को बहुत कुछ पर, यहाँ बंदिश नहीं कम है 
हिलोरें दिल की समझूँ पर, थपेड़ों को नहीं समझे 


निगाहें तुम न फेरोगे, सदा विश्वास है मुझको
अहम तेरी सदा खुशियाँ, ये उलझन भी नहीं समझे


जुदाई हो तो रूठे रब, कठिन होता बहुत सहना
मिलन में सुख तो होता है, तड़प को क्यों नही समझे


दिशा का ज्ञान मिलते ही, रहूँ संज्ञान मैं हरदम
इशारों से कहूँ कैसे कुसुम को भी नहीं समझे


 -कुसुम ठाकुर- 

हमारे देश की जनता कब जागेगी !


 जमशेदपुर भी अब बाकी शहरों की तरह असुरक्षित हो गया है. आये दिन हत्या, अपहरण की वारदातें सुनने को मिलती है. कभी डॉक्टरों की हत्या तो कभी बैंक अधिकारी का अपहरण.

अभी हाल में ही एक बैंक के अधिकारी का अपहरण हो गया, जिसे अपहरणकर्ता ने बाद में फिरौती की रकम वसूल कर छोड़ दिया.

बैंक अधिकारी घर जाने के लिए निकले ही थे कि किसी ने गाड़ी रोक जबरदस्ती गाड़ी में सवार हो गया और उन्हें जंगल की और ले गया. जंगल में ले जाने के बाद अपहरणकर्ता ने ५० हज़ार रकम की मांग रखी और कहा उसी समय मंगवाकर दे. पत्नी से फ़ोन द्वारा पैसे मंगवाने की जिद्द की तो अधिकारी को उस सुनसान जंगल में कुछ नहीं सूझा और उसने पत्नी को फ़ोन कर दी कि उसे ५० हज़ार की अभी तुरंत जरूरत है किसी से मांगकर भेजे. पत्नी के पूछने पर कि पैसा कौन ले जायेगा .....अपहरण कर्ताओं ने उस अधिकारी से कह्वाया उसके बैंक का एक आदमी जाकर ले आयेगा. पर पत्नी से ५० हज़ार का इंतजाम नहीं हो पाया. अब उस अधिकारी को अपहरणकर्ता ने जबरदस्ती अपने दोस्तों और परिचितों को फ़ोन द्वारा रुपैये मंगवाने की धमकी दी.

अधिकारी क्या करता उन्होंने बारी बारी अपने दोस्तों और सहकर्मियों को फ़ोन से पैसे का इंतजाम करने कहता. अंत में एक सहकर्मी ने इंतज़ाम किया और उसे उनके खाते में डाल दिया. जिसकी पुष्टि हो गयी तो अपहरणकर्ता अधिकारी को ले गया और ATM से रुपैये निकलवाकर ले लेने के पश्चात अधिकारी को घर जाने की अनुमति दे दी. कुछ दिनों बाद फिर उसका फ़ोन आया और ५० हज़ार की मांग फिर उस अपहरणकर्ता ने रखी और साथ में धमकी भी कि अगर पुलिस को बताया तो बीवी बचे को उठवा लेगा. कोई चारा नहीं देख उस अधिकारी ने फिर ५० हज़ार उसे दे दिया, पर इस बार अपहरण कर्ता को अपने इलाके में ही बुलाकर पैसे दी. साथ ही पैसे देने के बाद पुलिस में खबर कर दी और एफआईआर भी दर्ज करवा दिया.

दरअसल अपहरणकर्ता को बैंक अधिकारी पहचानता है. वह कभी बैंक से क़र्ज़ लेने के सिलसिले में अधिकारी के पास आया था. क़र्ज़ के नियमो के अनुसार उसे क़र्ज़ नहीं मिल पाया था. इस वारदात के बाद अधिकारी ने पुलिस को सारी बातें बता दी थी और पुलिस ने आश्वासन भी दिया था कि अपराधी अवश्य पकड़ा जायेगा. परन्तु एक महीने से ऊपर हो गया है अबतक अपराधी नहीं पकड़ाया है. पुलिस अधिकारी आश्वासन तो देते हैं.... पर अपहरणकर्ता अब फिर से पैसे कि मांग कर रहा है. पुलिस कहती है वह अपराधी फरार है...पुलिस उसे ढूंढ रही है.

दहशत में पूरा परिवार है... अब उनके पास विकल्प क्या है ? क्या हमारी निकम्मी पुलिस सक्षम नहीं है कि अपराधी को ढूढ़ निकाले या यहाँ भी अपराधी ने पैसे से मुंह बंद कर दिया है? कुछ वर्ष पहले जिस शहर की शांति से प्रभावित होकर कई लोग यहीं बस जाते थे आज वही शहर बिलकुल असुरक्षित होता जा रहा है.

एक तरफ अतिक्रमण को हटाया जा रहा है दूसरी तरफ नेताओं के इशारे पर उनके आदमी अतिक्रमण कर रहे हैं. हमारे देश की जनता कब जागेगी ?

उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं


"उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं"

जब भूली ना उन लम्हों को, याद आए कहूँ तो ठीक नहीं
कह दूँ कैसे तुम रूठ गए, बेवफा कहूँ तो ठीक नहीं

डूबी रहती हूँ  खयालों में , ख़्वाबों को संजोया है दिल में
जब होश में आती हूँ सचमुच, उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं

क्या करूँ जो दिल ये माने ना, मजबूरी को भी जाने ना
जब तुम बसते हो साँसों में, दर्मियाँ कहूँ तो ठीक नहीं

जीवन के भाव नहीं वश में,गम खुशियों का ही संगम है
यादों के साये  में जी कर, तन्हाई कहूँ तो ठीक नहीं

कुसुम ने जीवन से सीखा, भाए ना शब्दों की बंदिश
न मिलन बिछोह समझ पाई, मजबूरी कहूँ तो ठीक नहीं


-कुसुम ठाकुर-

विद्यापति पर्व समारोह मात्र औपचारिकता !!


आज अचानक लल्लन जी लिखी हुई एकांकी "विद्यापतिक दुर्दशा" याद आ गई. आज से २० साल पहले लल्लन जी ने मैथिलि में लिखी अपनी रचना के माध्यम से समाज को एक सन्देश देने की कोशिश की थी. 

लल्लन जी अपने हर नाटक के मंचन से पहले अपनी ही लिखी हुई एकांकी का मंचन बच्चों से करवाते थे. "विद्यापतिक दुर्दशा" के माध्यम से उन्होंने जो कहना चाहा था वह आज अचानक "मिथिला सांस्कृतिक परिषद्"  द्वारा आयोजित विद्यापति पर्व समारोह को देख मुझे याद आ गई. 

मिथिला के सर्वश्रेष्ठ कवि " कवि कोकिल विद्यापति " एक ऐसे कवि श्रेष्ठ हैं जिनकी भक्ति से प्रसन्न हो स्वयं भगवान शिव उनके घर चाकर बन वर्षों तक उनकी सेवा की थी. ऐसे कवि को याद करने के लिए पर्व मानाने का प्रचलन है. प्रचलन इसलिए कह रही हूँ क्यों कि अपनी यादाश्त में मैं ३५ वर्षों से जमशेदपुर में विद्यापति पर्व समारोह मानते हुए देखती आ रही हूँ. इन ३५ वर्षों में यदि बदलाव की ओर देखती हूँ तो लगता है मैं कई पीढ़ी पहले की हूँ परन्तु यदि "विद्यापति पर्व समारोह" जो की प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है...... के कार्यक्रम की समीक्षा करती हूँ तो पाती हूँ आज भी उसके आयोजन में कोई बदलाव नहीं आया है. 

अपने संस्कार, अपने कवि अपनी विभूतियों को याद करने के नाम पर, अपने समाज का कल्याण करने के नाम पर, उद्धार करने के नाम पर संस्था का क्या औचित्य है कितना औचित्य है यह मेरी समझ के बाहर है. हाँ एक मंच अवश्य जरूरी होता है जहाँ अपनी भावनाएँ अपने विचार रखा जा सके, समाज को सन्देश दिया जा सके, जरूरत मंदों की सहायता की जा सके, कला एवं संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा सके. 

कहने को तो "विद्यापति पर्व" मनाया जाता है....परन्तु एक कोने में विद्यापति के चित्र रख बड़े बड़े नेताओं से जिन्हें यह भी मालुम नहीं होता कि विद्यापति कौन थे, न ही बताने की कोशिश की जाती है, उनसे  दीप प्रज्वलित करवा उसे पर्व नाम देने की कोशिश तो की जाती है, परन्तु उस विभूति, उस कवि श्रेष्ठ के बारे में कम से कम संक्षिप्त परिचय देने की किसी को सुध कहाँ ? आयोजक को चिंता रहती है आयोजन सफल कैसे हो. आयोजन के सफलता की भी परिभाषा मेरी समझ में तो नहीं आती. जिस बार जितने बड़े बड़े नेता और जितने ज्यादा पत्रकार आएं उस बार का आयोजन उतना सफल माना जाता है. चाहे दर्शक उन नेताओं और आयोजक के भाषण ही सुनकर वापस क्यों न चले जाएँ. इसके लिए आयोजक साल भर एड़ी चोटी लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.  आखिर एड़ी चोटी क्यों न लगाएँ ? साल भर इंतज़ार जो करते हैं उस पल का,  नेताओं के साथ मंच पर बैठ गौरवान्वित होने का, नेताओं के मुख से अपने नाम और अच्छे कार्यक्रम की तारीफ़ सुनने का. 

यह विद्यापति की दुर्दशा नहीं तो और क्या है ? 

धडकनों को तो अबतक जाना नहीं

"धडकनों को तो अबतक जाना नहीं"

दिल की ख्वाहिश सही, फिकर क्यूँ नहीं  
यूँ तसव्वुर कहूँ, यह सिफर तो नहीं

मैं दिल का कहा अब भी सुनता कहाँ 
क्या  कहूँ कब कहूँ यह फिकर ही नहीं 

 दिल की बेताबियाँ, क्या कहूँ खूबियाँ 
 बस सफ़र रह गई, वह भी माना नहीं 

है तलबगार फिर क्यों मैं आहें भरूँ 
तरन्नुम तो अब वो मुमकिन नहीं

अलविदा तुमने कह दी मेरे हमसफ़र
धडकनों को तो अबतक जाना नहीं 

-कुसुम ठाकुर- 

शब्दार्थ : 

तसव्वुर - ध्यान, ख्याल, कल्पना, विचार 
सिफर - अवकाश, शून्य, खाली होने का भाव, सुन्ना, बिंदी
तलबगार - चाहने वाला 
तरन्नुम - स्वर , माधुर्य





भारत चीन युद्ध के 49 वर्ष.


१९६२ का भारत चीन युद्ध को करीब ४९ वर्ष बीत गए, पर इन ४९ वर्षों में "सेवेन सिस्टर स्टेट्स" कहा जाने वाला अरुणाचल, सिक्किम, असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और मिजोरम यानि भारत का उत्तर पूर्व अब भी उपेक्षित राज्य हैं . आज भी यहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी है. 

७० के दशक में अरुणाचल से सटे भारत चीन सीमा रेखा बनाने के लिए भारत सरकार के कर्मचारी कई कई दिनों तक पैदल चलकर उस स्थान पर पहुँचते थे जहाँ उन्हें भारत और चीन की सीमा पर खम्भा डालना होता था. उनके साथ उनका सामान, सीमेंट, बालू इत्यादि ...और साथ में कारीगर होते थे. कई कई दिनों तक तम्बू में रहकर सीमा स्तम्भ (boarder pillar) बनाई जाती और तब वे वापस घर आते. इन ४० वर्षों में भी उस राज्य की स्थिति में कोई अंतर हो यह नहीं कहा जा सकता. भारत चीन सीमा को जाने वाली सड़क आज भी पूरी तरह तैयार नहीं है. जब कि आज के विकास को देखते हुए वहाँ सड़क और रेल दोनों की सुविधा होना चाहिए था. स्थिति ऐसी है कि यदि चीन आज हमला कर दे तो भारतीय सेना को वहाँ पहुँचने में कम से कम सात दिन लग जाएगा.

चहु दिशा में तरक्की करने वाला चीन की नीति है "राष्ट्र ने तय कर लिया तो देश हर कीमत देने को तैयार है ." और ऐसी नीति रखने वाला देश भारतीय सीमा को ध्यान में रखते हुए अपने "पीपल्स लिबरेशन आर्मी" यानि चीन की सेना को जाने के लिए हर तरफ से तैयार है. उन्होंने सड़क और रेल मार्ग तैयार कर रखा है साथ ही अब अपने सैनिकों को भी. चीनी सेना जिनका तीन नारा है ......"चुप रहकर काम करो, अपनी क्षमता बढाओ और अनुकूल समय देखकर वार करो ".


चीन ने अपनी सेना न सिर्फ भारत चीन सीमा पर बढ़ा दिया है बल्कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से लगे भारत की सीमा पर और भारत पाकिस्तान की सीमा से सटे सीमा नियंत्रण रेखा पर भी तैनात कर दी है. देश के वरिष्ठ सेना अधिकारी की चेतावनी और चिंता से यह अवश्य स्पष्ट है कि विषय गंभीर है और इस ओर ध्यान देने की जरूरत है. देश की स्थिति ऐसी है कि यहाँ नेताओं को भ्रष्टाचार और अपने विपक्ष की छवि बिगड़ने की चिंता से फुर्सत ही नहीं है कि वे इस गंभीर विषय की ओर ध्यान दें. भारत चीन युद्ध को करीब पचास वर्ष हो गए. चीनी चीनी भाई भाई का नारा अब भी हम नहीं भूले हैं तो यह किसकी गलती है ? चिंता इस बात की है कि कहीं आज के भ्रष्ट नेताओं के स्वार्थ की बलि बेदी अरुणाचल और कश्मीर न चढ़ जाए.

जीवन तो है क्षण भंगुर

"जीवन तो है क्षण भंगुर"

बिछड़ कर ही समझ आता,
क्या है मोल साथी का ।

जब तक साथ रहे उसका,
क्यों अनमोल न उसे समझें ।

अच्छाइयाँ अगर धर्म है,
क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।

सराहने मे अहँ आड़े,
अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।

ज्यों अहँ को गहन न होने दें,
तो परिलक्षित होवे क्यों ।

क्यों साथी के हर एक इच्छा,
को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।

सामंजस्य की कमी जो नहीं,
कटुता का स्थान भी न हो ।

कहने को नेह बहुत,
तो फ़िर क्यों न वारे हम ।

खुशियों को सहेजें तो,
आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।

दुःख भी तो रहे न सदा,
आपस में न बाटें क्यों ।

जो समर्पण को लगा लें गले,
क्यों अधिकार न त्यागे हम ।

यह जीवन तो है क्षण भंगुर,
विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।

-कुसुम ठाकुर - 




साथ रंग न छूटे


"साथ रंग न छूटे"

रंगों की बहार 
प्रेम की फुहार 
फागुन की बयार 
होली का त्यौहार 

छोड़ो मन के द्वेष 
लगो एक ही भेष 
फिर काहे का क्लेश
छोड़ो कल पर शेष

साथ रंग न छूटे
और न छूटे अपने 
सपने भी रंग लाए
जीवन में अपने 

जीवन का हर गीत 
सजे तुम्ही से मीत 
न छोड़ूँ मैं रीत 
कहूँ किसे यह जीत

-कुसुम ठाकुर-     
  

मेरा साथी


"मेरा साथी"

 मुझे मिला एक साथी
जिस पर थी न्योछावर
रात दिन मैं उसकी
सपनों मे रहती थी डूबी
एक तो वो विद्वान
और मैं अनपढ़ नादान
दूजे मैं ऐसी प्रतिभा
न देखी फिर
सुनी तो फिर भी कभी कभी
पर जब तक उसके मोल को
मैं समझ और सहेज पाती
वह देकर धोखा मुझे
चला गया किसी और देश
जहाँ से न कोई लौटा है
और ख़बर ही भेजा है ।

 -कुसुम ठाकुर -

अपना सा आभास तो लगता

"अपना सा आभास तो लगता"

समझूं कैसे क्या है रिश्ता,
बिन देखे क्यूँ स्नेह पनपता।

है क्या उलझन समझ न पाऊँ,
होंठ हिले, न शब्द निकलता।

राह तकूँ मैं प्रतिपल जिसकी,
उस तक न सन्देश पहुँचता।

वह न समझे कैसे कह दूँ,
अपना सा आभास तो लगता।

यही  कुसुम जीवन की उलझन
ह्रदय प्रेम की यही विकलता

- कुसुम ठाकुर - 


क्या कहूँ,कब कहूँ ?

क्या कहूँ, कब कहूँ,चुप रहूँ या कहूँ ?
अपने दिल की सही दास्ताँ मैं कहूँ ?

मुद्दतों से कभी, दिल की माना नहीं,
अब मैं आहें भरूँ या तकब्बुर कहूँ .

टूटा अब तो वहम, याद आए कसम,
जब मैं तनहा रहूँ, अपने दिल से कहूँ.

आरज़ू थी मेरी, अंजुमन में सही,
बस मैं दीदार करूँ, चाहे कुछ न कहूँ.

- कुसुम ठाकुर-

शब्दार्थ :
 तकब्बुर - अभिमान, घमंड 
अंजुमन -मजलिस, सभा