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हार मिली पर हार वही

"हार मिली पर हार वही"

है चाहत  हर बार वही
क्यों रहता ना प्यार वही

आती जाती यादों पर
हो अपना अधिकार वही

प्यार सदा सच  कहता है
हार मिली पर हार वही

प्यार कला है जीने की
तब जगमग संसार वही

समझ कुसुम नैनों की भाषा
प्रेम सहज हर बार वही

-कुसुम ठाकुर-

आई शरण तुम्हारी




" आई शरण तुम्हारी "

हरि मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी,
अब जाऊँ किधर तज शरण तुम्हारी 


दर भी तुम्हारा लगे मुझको प्यारा,
 तजूँ  कैसे अब मैं शरण तुम्हारी 
हरि ..................................


मन मेरा चंचल, धरूँ ध्यान कैसे,
बसो मेरे मन मैं शरण तुम्हारी  
हरि ...................................


जीवन की नैया मझधार में है 
पार उतारो मैं शरण तुम्हारी
हरि ................................ 


तन में न शक्ति, करूँ कैसे भक्ति 
अब दर्शन दे दो मैं शरण तुम्हारी 
हरि .....................................

- कुसुम ठाकुर - 

क्या आत्म हत्या करना किसी दुःख का हल है?

अचानक सुबह में मेरी एक सहेली का फ़ोन आया और उसने कहा "पता है मि. मुर्मू की बेटी ने आत्म हत्या कर ली अभी उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा है".  यह सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई. अपने बालकनी में जाकर खड़ी हो गई और जो दृश्य देखी वह देख मैं विचलित हो गई. आगे आगे मालिनी का शव कंधे पर लिए चार लोग और पिता छतरी को मालिनी के सर पर ताने बढ़ रहे थे, पीछे पीछे पूरा परिवार रोते बिलखते मालिनी को अंतिम विदाई देने के लिए. मालिनी के पार्थिव शरीर को एक फूलों से लदे ट्रक पर डाल दिया गया. जिस बेटी या बच्चे को छोटी सी चोट लगने पर माँ बाप बेचैन हो जाते हैं आज उसे ही अग्नि देव को सुपुर्द करने ले जाते समय उनकी मानसिक स्थिति का सोच मेरा मन रो उठा. पर मैं सबसे ज्यादा उस समय द्रवित हुई जब पत्रकारों का एक समूह उस गमगीन घडी में भी होड़ लगाये हुए थे कि कौन सबसे नजदीक और अच्छी तस्वीर ले सकता है. उस होड़ में वे दुःख में डूबे परिजनों को बगल हटने या पीछे जाने के लिए भी कह रहे थे. 

श्री मुर्मू और श्रीमती मुर्मू मेरे पड़ोस में रहते हैं. बड़ी बेटी मालिनी का इसबार आई आई एम बंगलौर में दाखिला दिलाने के बाद वे बहुत ही खुश थे. उन्हें क्या पता था कि उनकी यह ख़ुशी जल्द ही दुःख में परिवर्तित हो जायेगा. किसी से मालिनी को प्रेम हो गया था पर उस प्रेमी द्वारा फेस बुक स्टेटस में "filing super cool, dumped my new ex girl friend, happy independence day" को मालिनी बर्दाश्त नहीं कर पाई और suicide note लिखकर लैपटॉप के पास छोड़ अपने हॉस्टल में फाँसी लगाकर आत्म हत्या कर ली. आज के ज़माने में जीवन की रफ़्तार इतनी तेज़ है कि लोगों को किसी के भावना का भी जरा सा ख्याल नहीं रहता. इस भौतिकवादी ज़माने में बहुत कम व्यक्ति हैं जो भावनाओं को अहमियत देते हैं. अहम की भावना भी आज की पीढ़ी में बढ़ता जा रहा है बर्दाश्त करने की शक्ति तो जैसे नगण्य होता जा रहा है. 

क्या आत्म हत्या करना ही किसी भी दुःख का अंत या हल है ? 

लेखन एक अनवरत यात्रा है

किसी ने सच ही कहा है :"लेखन एक अनवरत यात्रा है  - जिसका न कोई अंत है न मंजिल ", और यह सच भी है निरंतर अपने भावों को कलम बद्ध करना ही इस यात्रा की नियति होती है। अपने भावों को कलम बद्ध कर व्यक्ति को संतुष्टि के साथ ख़ुशी का अनुभव भी प्राप्त होता है। यह एक ऐसी यात्रा है जहाँ हर रचना एक पड़ाव होता है और पड़ाव पर आ व्यक्ति कभी तो अपने आप को तरोताजा महसूस करता है और अपनी अगली यात्रा को और दूने उत्साह के साथ तय करता है। कभी कभी उस रचना के शब्द जालों में उलझ व्यक्ति थकान का अनुभव भी करता है, फिर भी यात्रा पर निकल पड़ता है। कभी वह इतना खुश होता है कि ख़ुशी से आत्म विभोर हो अपनी अगली यात्रा को ही भूल जाता है पर कभी तो उसे ऐसा महसूस होता है मानो सारे शब्द ही ख़त्म हो गए ऐसी स्थिति में वह अपनी पिछली यात्रा को कामयाबी मान खुश होता है और ख़ुशी की उस धूरी पर घूमता रहता है। यों तो लेखन से आत्म तुष्टि कभी नहीं होती पर इस यात्रा में कभी कभी ऐसे मोड़ भी आते हैं जब व्यक्ति आत्म मुग्ध हो उठता है। 
 
लेखन एक कला है और अपने भावों को शब्दों द्वारा जिवंत बनाना ही लेखकीय कला कहलाता है, जो पाठक के मन में छाप छोड़ जाए, वही सार्थक लेखन कहलाता है लेखक, कवि अपनी रचनाओं में अपने अनुभव अपनी ज़िन्दगी अपने भावों को व्यक्त करते हैं। वह किसी न किसी रूप में उनके इर्द गिर्द घूमती है। उन्हें यह छूट रहती है कि वह कल्पना की उड़ान में, अपने पात्र के माध्यम से अपने मन में आने वाले ज्वार भांटा, अपने अनुभव, विचार, हर्ष, उल्लास, सपने, अपनी इच्छाओं को चाहे तो काट छांटकर या फिर बढ़ा चढ़ाकर लोगों तक पहुंचा सके पात्र  तो निमित्त मात्र होते हैं जिसे अपनी कल्पना, अनुभव से व्यापक दायरा प्रदान करना और लोगों का अनुभव बनने की कोशिश ही लेखक का उद्देश्य होता है। परन्तु इसके विपरीत आत्म कथा में यह गुंजाइश नहीं होती .......यहाँ पात्र ही उदेश्य होता है और लक्ष्य भी। यहाँ कल्पना की उड़ान में नहीं उड़ा जा सकता, जो कुछ देखा सुना और जो घटित हुआ उसी का वर्णन "अपनी कहानी" का उदेश्य होता है। अपने बारे में लिखना बहुत ही कठिन होता है। यहाँ न कल्पना की उड़ान में उड़ा जा सकता है न ही किसी से ताल मेल बिठाने की जरूरत होती है। बस अपने इर्द गिर्द  घटित घटनाओं को, अपने अनुभव, अपने मन के भावों को लिखना ही इसका लक्ष्य होता है 


मैं कभी यह नहीं सोची थी कि मैं कुछ लिखूंगी मैं तो बस हमसफ़र थी एक ऐसे व्यक्तित्व की जिसने अपने जीवन के चंद वर्षों में उतार चढ़ाव भरी जिंदगी को भी बड़े ही सहज, स्वाभाविक ढंग से सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए बिताया। एक बार मुझे किसी पत्रिका के लिए कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं.....मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।  मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था ।

अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।

यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।

उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।

एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।

वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पड़े तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।

मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।

लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा की थी, वह भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पड़ा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पड़ा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई सालों तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नहीं है तो साथ। 

क्रमशः ...........

आई पी address पुलिस में देने की धमकी !!

वैसे तो मैं १९९६ से कंप्यूटर का प्रयोग कर रही हूँ और १९९९ से पूरे तौर पर इन्टरनेट और ईमेल से जुड़ी, पर ब्लॉग की दुनिया से जुड़े हुए मुझे दो साल और तीन महीने ही हुए हैं . यों तो लिखने पढ़ने का शौक पहले से ही था , या कह सकती हूँ कि मैं उसी माहौल का हिस्सा दशकों से थी . अतः  लेखन पाठन मेरे शौक का हिस्सा कब बना नहीं कह सकती . पर ब्लॉग न ही पढ़ती थी और न ही उसके बारे में ज्यादा कुछ मालूम ही था . वह तो २००८ में जब मैं बेटे के पास कैलिफोर्निया आई उस समय श्वेता, (बड़ी बहु) के कहने पर ब्लॉग लिखना शुरू की . शुरुआत तो की थी अपनी यात्रा से वह भी अंग्रेजी में . धीरे धीरे भिन्न भिन्न विषयों पर लिखने लगी और अलग अलग कई ब्लॉग बना ली . एक मित्र के कहने पर हिन्दी में भी लिखना शुरू कर दी . कभी कभी अपनी पोस्ट पर टिप्पणी देखती और यदि लिंक छोड़ा हुआ होता तो उत्सुकतावश उनके ब्लॉग पर जाती और उसे पढ़ती थी . कभी कभी औपचारिकतावश और कभी कभी मन को भा जाता तब भी, टिप्पणी देने लगी.  उस समय मुझे यह नहीं पता था ब्लॉग और ब्लॉगर की भी अपनी अलग दुनिया होती है . आम परिवार और समाज की तरह यहाँ भी लोग एक दूसरे से मिलते हैं उनके सुख दुःख में हिस्सा लेते हैं मित्रता के दायरे बढ़ाते हैं . साथ ही आम परिवार और समाज की तरह यहाँ भी आपस में नोक झोंक , सहृदयता और द्वेष की भावना विधमान है , जो कि एक समाज परिवार के लिए स्वाभाविक होता है . मैं भी इस परिवार समाज का हिस्सा कब बन गई मालूम नहीं . बहुत से खट्टे मीठे अनुभव हुए इस परिवार से जुड़ने के बाद . कई बहुत ही अच्छे मित्र बने पर स्वभावतः मैं विवादों से दूर रहने की कोशिश करती और अब भी करती हूँ . मुझे विवाद और राजनीति यह दोनों बिल्कुल ही पसंद नहीं है . मैं कर्म में विश्वास रखती हूँ और मेरी बातों से या किसी तरह के व्यवहार से किसी को ठेस न पहुँचे यह सदा प्रयास करती हूँ . 

इस बीच बराबर सुनने में आता है किसी का मेल a/c hack हो गया तो किसी का फेस बुक a/c . दो दिनों पहले मेरे एक मित्र का g mail a/c ही hack हो गया . बहुत ही परेशान था, उसके कई ब्लॉग हैं वह उनसब पर लॉग इन नहीं हो सकता . उसने कई जरूरी आंकड़े भी अपने IN BOX  में रखे थे ....जिसे खोने का उसे काफी दुःख था. मैं भी चिंतित थी और उसी को ध्यान में रख मैं अपने सारे e mail a/c के पास वर्ड बदलने की सोची . इसी सिलसिले में मैं अपने याहू a/c पर गई .  पर वहाँ मेरे नाम से कोई पहले से ही लॉग इन था . मेरी समझ में यह नहीं आया ऐसा  भी हो सकता है . पहले तो मैं याद करने की कोशिश की , कहीं कोई कुसुम ठाकुर मेरे मित्र सूची में तो नहीं . पर वह अगर होता तो अवश्य याद रहता . अपने नाम के मित्र को कैसे भूल सकती हूँ . 

मुझे जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैं उसे एक मैसेज भेजी .....आप कौन हैं, जरा अपने बारे में बताएँगे ? उधर से जवाब आया "मैं कोई हूँ.....आप कौन हैं "? मैं तुरन्त जवाब दी मेरा नाम कुसुम ठाकुर है, मैं एक ब्लॉगर हूँ पर आप भी इसी नाम से लोग इन हैं . मुझे लगा एक व्यक्ति जो इन्टरनेट का प्रयोग करता है या उससे जुड़ा हुआ है उसके लिए ब्लॉग का परिचय देना ही उचित होगा . ताकि वह ब्लॉग पर जाकर मेरा परिचय देख पूरी तरह से वाकिफ हो सकता है और जो भी प्रश्न चाहे पूछ सकता है . उन्होंने कहा अपने ब्लॉग का url दें . मैंने कहा ....मेरे ब्लॉग का नाम "Kusum's journey"  है पर आप मेरे उत्सुकता का निवारण पहले करें . यह सुनते ही उस सज्जन को मालूम नहीं क्या लगा तुरन्त ही मैसेज किया " I work with police and I am giving your IP address to the police." मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया . पर जो कभी कुछ गलत काम नहीं करता उसे आत्म विश्वास की कमी नहीं होती . मैंने भी धैर्य के साथ उसे कहा "I also know police as well as google and yahoo first you enquire about me and if you feel give my IP Address to the police". इसके बाद मैं उन्हें किसी भी तरह का मैसेज नहीं भेजी और जुट गई यह ढूँढने में यह महानुभाव हैं कौन .

 बहुत खोज बीन के बाद पता चला उस व्यक्ति का mail ID अनूप भार्गव नाम से था . तब मेरी शंका और बढ़ गई पर यह कैसे हुआ मेरी समझ में नहीं आया . याहू पर मैं बहुत ही कम जाती हूँ और जहाँ मेल ID देना जरूरी होता है वहाँ yahoo ID का ही प्रयोग करती हूँ . हाँ एक और ब्लॉगर साथी के कहने पर मैंने एक बार ई कविता की सदस्य बन गई थी पर मात्र एक बार ही उसमे कविता भेजी थी और साथियों ने सुझाव भी भेजा था . जिसके लिए मैं उन साथियों का शुक्रगुजार हूँ. अब मैं ऑनलाइन ढूँढने लगी कहीं कोई अनूप भार्गव के नाम से मिले .....एक व्यक्ति मिले भी जो शायद लिखते भी हैं और उनका ब्लॉग भी देखी  ...और अभी अमेरिका में जहाँ मैं हूँ,  वहाँ से पास ही रहते है . पर मेरा मन नहीं माना... एक सभ्य व्यक्ति परिचय पूछने पर सीधा पुलिस की धमकी देगा ...मैंने तो उन्हें मेरे बारे में जानने के सुराग भी दी थी . उन्होंने तो सीधा बस पुलिस की ही धमकी दे डाली . सबसे पहले मैं उनके नाम को अपने संपर्क सूची (contact list) से हटा दी . संयोग वश एक दो साथी ब्लॉगर ऑन लाइन दिखे उनसे उन सज्जन के विषय में पूछी पर किसी ने उनके बारे में कुछ नहीं बताया ,बल्कि वे उस नाम को जानते ही नहीं थे . खैर, संयोग वश एक ब्लॉगर साथी से बातें हो रही थी और उन्होंने कहा हाँ वे उन्हें जानते हैं और अनूप जी सज्जन भी हैं . सज्जनता की यदि यही परिभाषा है तो शायद मैं उसकी परिभाषा ही नहीं जानती . क्या सज्जन इसे ही कहते हैं ? क्या सज्जन व्यक्ति की नज़रों में दूसरे सभी दुर्जन हैं ? यह कैसे कोई आंक लेता है कि सामने वाला व्यक्ति कमजोर है और धमकी से डर जाएगा ? 

पर मुझे स्वर्ग सा नहीं लगा !!

मुझे अमेरिका आए हुए एक महीने से ज्यादा हो गए, १६ जून को आई थी. एक महिना कैसे बीता, पता ही नहीं चला . वैसे भी बच्चों के साथ रहने पर समय का पता कहाँ चलता है . इस बार तो कुछ ख़ास ही व्यस्तता और ख़ुशी है . बेटे ने घर जो लिय़ा है . बच्चे की तरक्की प्रत्येक माता पिता को खुशियाँ देती है . खासकर ऐसे माता पिता को जिसे अकेले ही माँ और पिता दोनों की जिम्मेदारी निभानी पड़ी हो और वह बड़े ही तन्मयता से अपने बच्चों में अपनी आशा को पूरी होते देखने की आशा रखता हो. उनकी हर छोटी बड़ी इच्छा का ध्यान यह सोच रखता हो कि कहीं उसे अपने माता पिता दोनों में से किसी एक की कमी महसूस ना हो और अपनी इच्छाओं को कभी उनपर थोपने की कोशिश ना करता हो. जो समाज परिवार से परे जाकर अपने बच्चे की हर इच्छा और ख़ुशी में शामिल होने से कभी ना चुका हो. 

जीवन का १५ साल कैसे बीता समझ में ही नहीं आता  ...... बच्चे कब बड़े हुए , कैसे बड़े हुए, इसका भान तो है . अपनी जिम्मेदारी निभाने में कहाँ तक सफल हुई इसकी सफलता और असफलता का लेखा जोखा कुछ वर्षों बाद ही लिया जा सकता है पर अपने बच्चों की ख़ुशी और तरक्की देख दूसरे माता पिता की तरह मैं भी ख़ुशी से फूली नहीं समाती . 

अमेरिका के शहर बहुत छोटे छोटे सुन्दर और व्यवस्थित हैं . शहर की सीमा नाम की कोई चीज़ ही नहीं है . कहाँ से शहर शुरू होता और कहाँ खत्म होता यह आम पर्यटक या नए लोगों को समझ पाना बहुत मुश्किल है.  २३ को गृहप्रवेश था और अब हम नए घर में रह रहे हैं . "वेस्ट औरेंज" नु यार्क शहर से मात्र १५ मील की दूरी पर अवस्थित है . प्रसिद्ध वैज्ञानिक और बल्ब के अविष्कारक ने यहीं रह बल्ब का आविष्कार किया और अपनी अंतिम सांस भी यहीं पर लिय़ा . इस वजह से इस शहर का अपना अलग महत्त्व है. एडिसन की यादों को ताज़ा रखने के लिए खास खास जगहों पर प्रतीक के रूप में बड़े बड़े बल्ब बने हुए हैं . एडिसन हिस्टोरिक पार्क, संग्रहालय इस शहर में अब भी है . 

एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि अमेरिका का सबसे अच्छा क्या लगा...... तुरन्त ही मैंने जवाब दिया वहाँ के लोगों में अनुशासन और प्रदूषण रहित वातावरण . अमेरिका का नु यार्क वाला भाग भी अपनी प्राकृतिक छटाओं से भरा है .  हमारा घर पहाड़ों पर अवस्थित है और घर के ठीक पीछे जंगल है जहाँ हिरन और तरह तरह के जानवरों को स्वाभिक रूप से विचरण करते देखा जा सकता है .

मैं पूरा अमेरिका घूम चुकी हूँ ऐसा तो नहीं कह सकती, क्यों कि अमेरिका बहुत बड़ा है , पर अमेरिका में काफी घूम चुकी हूँ यह कह सकती हूँ . खान पान से लेकर अनुशासन, सफाई और यातायात तक हर जगह बहुत सी सुविधाएँ हैं जो हमारे भारत में अभी होने में बहुत समय लगेगा . फिर भी कुछ दिनों रहने के बाद अपने वतन की याद तो आती ही है . घूमने के लिए आना और बात है .........पर लालसा कभी नहीं होती कि यहाँ सदा के लिए बस जाऊं . 

अभी कुछ ही दिनों पहले मैं नेट पर किसी की लेख पढ़ रही थी .....उन्होंने लिखा था  "हमारे यहाँ मरने के बाद लोग स्वर्ग जाते है .........अमेरिका तो साक्षात स्वर्ग है ". अमेरिका अच्छा तो मुझे बहुत लगता है सुविधाओं की तो बात ही क्या है . पर मुझे स्वर्ग सा नहीं लगा  . मैं तो कहूँगी स्वर्ग की परिभाषा ही शायद उन्हें नहीं मालूम . एक तो स्वर्ग किसने देखा है. जिसे देखा जा सके वह स्वर्ग कैसे हो सकता है ? स्वर्ग की तो मात्र कलपना की जा सकती है .

संस्मरण (दूसरी कड़ी )

मुझे अपने बचपन की बहुत कम बातें ही याद , पर कुछ बातें जिसे माँ बराबर दुहराती रहती थी और हमेशा सबको बताती थी, वह मानस पटल पर इस तरह बैठ गए हैं कि अब शायद ही भूल पाऊँ । उनमें कुछ हैं मेरे और मेरे भाई के बीच का प्रेम।


मेरे बाबूजी उस समय भूटान में थे , मैं और मेरा भाई दोनों ही बहुत छोटे थे । उन दिनों मैं और मेरा भाई जिसे प्यार से हम बौआ कहते हैं और मुझसे १५ महीना छोटा है माँ के साथ दादी बाबा के पास रहते थे । हम दोनों भाई बहनों में बहुत ही प्यार था । बौआ तो फ़िर भी कभी कभी मुझे चिढा देता या मार भी देता था पर मैं उसे बहुत मानती थी । कभी कभी तंग करता तो उसे धमकी देती कि "मैं बाबुजी के पास चली जाऊँगी "। बौआ को यह अच्छा नही लगता था।


मुझे यह तो याद नहीं है कि उस दिन हुआ क्या था पर यह अच्छी तरह से याद है कि बौआ ने मुझे किसी बात को लेकर चिढाया और मैं बहुत रोई । उस दिन भी मैं और दिनों की भाँति उसे धमकी दी कि मैं बाबुजी के पास चली जाऊँगीपर वह न माना ।हम दोनों बाहर में खेल रहे थे, बस क्या था मैं वहीं से रोते हुए यह कह कर चल पड़ी कि मैं बाबुजी के के पास जा रही हूँ । बौआ को इसकी उम्मीद न थी कि मैं सच चल पडूँगी और मुझे जाता देख वह भी मेरे पीछे पीछे बढ़ने लगा। आगे आगे मैं रोती हुई जा रही थी, पीछे -पीछे बौआ "दीदी मत जाओ , बीच बीच में कहता " मेरी दीदी भागी जा रही है "। इस तरह से हम दोनों भाई बहन रोते हुए सड़क के किनारे तक पहुँच रुक गए । वहाँ एक बड़ा सा आम का बागीचा था और उस जगह पता नही क्यों मुझे बहुत डर लगता था , अतः उसके आगे न बढ़ पाई और वहीँ से रो रो कर बाबूजी को पुकारने लगी । मैं रो रो कर कहती "बाबुजी आप जल्दि आ जाईये बौआ मुझे चिढाता है "। मैं जितनी बार यह कहती बौआ भी रोते हुए कहता "दीदी मत जाओ अब मैं तुमको कभी नहीं मरुंगा न चिढाऊँगा घर चलो "। हम दोनों का इस तरह से रोना और मनाना उस रास्ते से जाता हुआ हर व्यक्ति देख रहा था और सब ने मानाने की कोशिश भी की पर हम न माने । अंत में सड़क पर भीड़ जमा हो गयी और उन्ही लोगों में से किसी ने जाकर बाबा दादी को हमारे बारे में बताया और दादी आकार हमें ले गयीं । घर जाने के बाद जब माँ हमसे पूछीं कि क्या हुआ तो मैं कुछ न बोली चुप रह गयी, अंत में बौआ से जब माँ ने पूछा तो वह सारी कहानी बता दिया ।

क्रमशः ............

संस्मरण

एक बार मुझे किसी पत्रिका के लिए कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।

मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था ।

अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।

यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।

उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।

एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।

वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पडे तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।

मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।

लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा कि थी वो भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पडा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पडा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई साल तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नही है तो मन की शान्ति, नहीं है तो साथ ।


क्रमशः ............