संस्मरण (तीसरी कड़ी)


बाबुजी की बदली "भूटान " से "गया" हो गई और हम "गया" आ गए । हमारे आते ही बाबुजी हम दोनों भाई बहनों को स्कूल में दाखिला के लिए तैयारी करवाने लगे। बाबुजी को हम दोनों के पीछे काफी मेहनत करनी पड़ी और तब जाकर नाज़रथ अकादमी (स्कूल ) में हमारा दाखिला हो पाया । दाखिला के लिए हम दोनों भाई बहन बाबूजी के साथ स्कूल पहुँचे । स्कूल का बड़ा सा गेट देखकर मैं तो दंग रह गई । गेट के अन्दर पहुंचाते ही ख़ुशी और उत्सुकता मिश्रित मुस्कान दोनों के चहरे पर अनायास ही छलक गए। कहाँ गाँव का वह छोटा सा स्कूल जिसमे गिने हुए कमरे मात्र और एक छोटा सा खेलने की जगह और कहाँ यह, जहाँ खेलने के लिए हर तरह के झूले वगैरह , बड़ा सा खेलने का मैदान , टिफिन खाने के लिए अलग से बड़ा सा हौल जहाँ टेबल और बेंच लगे हुए थे, और फैली हुई चार मंजिला इमारत। ऑफिस में दाखिल हुई तो सिस्टर को देख और भी आश्चर्य हुआ। सिस्टर हम दोनों से इंटरव्यू में बहुत सारे प्रश्न पूछीं और कुछ लिखने के लिए भी। इंटरव्यू  के बाद उन्होंने बाबुजी से कहा दोनों पहली कक्षा के लायक ही हैं।


 इंटरव्यू  में बौआ ने तो सारे प्रश्नों के जवाब दे दिए, पर मैं आते हुए प्रश्नों का जवाब भी नहीं दे पाई । हमारा दाखिला पहली कक्षा में हो गया । हमें सिस्टर ने कहा स्कूल के कपड़े स्कूल का दर्जी ही सिलता है, अतः नाप देना पड़ेगा। दर्जी ने हमारा नाप ले लिया और हम घर आ गए । 


घर पहुँचने के साथ ही बौआ ने माँ को सारी बातें बता दिया साथ ही यह भी कि " दीदी ने जवाब नहीं दिया इसलिए हम दोनों का नाम एक ही कक्षा में लिखाया है " । माँ को स्कूल की तैयारी करते देख हम खुश होते ।


 आज तो स्कूल जाने के लिए कई साधन हैं , पर उस जमाने में  रिक्शा ही स्कूल आने जाने का साधन होता था , या फिर जिनके पास गाडी थी वे गाड़ी से स्कूल जाते थे। हम भी रिक्शा से प्रतिदिन स्कूल आना जाना करते थे। 


बौआ स्वभाव से चंचल था , और छुट्टी के समय प्रतिदिन रिक्शा वाले से आगे के लोहे वाले रौड पर बैठने कि जिद्द करता पर रिक्शा वाला मना कर देता । इसी तरह से करीब छः महीने स्कूल जाते हुए हो गया एक दिन रिक्शा वाला भी तंग आकर उसे घर से कुछ ही दूर पहले सामने बैठा लिय़ा । उस समय उसकी ख़ुशी देखने लायक थी । ऐसा प्रतीत होता था मानो उसने जंग जीत ली हो । मुझसे और रिक्शा वाले से हँस हँसकर बातें करते हुए वह फूले नहीं समा रहा था । अचानक वह चुप हो गया और उसी समय तीन चार लोग सामने से दौड़कर आते हुए दिखे जो रिक्शावाले को रुकने का इशारा कर रहे थे । रिक्शावाला उनकी इशारों पर बिना ध्यान दिए लगातार आगे कि और बढ़ रहा था , पर उसे रिक्शा चलने में दिक्कत महसूस हो रही थी । अचानक एक व्यक्ति "अरे बच्चे का पैर रिक्शा में फंसा हुआ है " कहते हुए रिक्शा को पकड़कर रोक दिया और उसे काफी डांट लगाईं , साथ ही वहाँ भीड़ जमा हो गई । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रही थी । पर लोगों ने रिक्शा वाले से घर का पता पूछा और बौआ को गोद में लेकर दौड़ते हुए घर पहुँच गए । रिक्शा वाला मुझे लिए हुए घर पहुँचा । बौआ  को देखकर मुझे भी रुलाई छूट गई । उसके दाहिने पैर का करीब करीब पूरा चमड़ा निकल चुका था और खून से लथ पथ । 
मुझे ठीक से याद तो नहीं है कैसे, पर बौआ को अस्पताल ले जाना पड़ा । करीब एक डेढ़ महीने वह स्कूल नहीं जा सका ।  डॉक्टर ने उसे स्कूल जाने की अनुमति दे भी दी तब भी चलने में उसे काफी तकलीफ होती। 


हमारे स्कूल में स्पेशल पहली कक्षा थी , उसमे जो भी बच्चे रहते उन्हें तरक्की मिलती थी और सीधा तीसरी कक्षा में पहुँच जाते, उन्हें दूसरी कक्षा नहीं पढ़ना पड़ता । बौआ स्कूल जाने लगा उसके कुछ ही दिनों बाद मुझे तरक्की मिल गई , मैं स्पेशल पहली कक्षा में चली गई और बौआ उसी कक्षा में रह गया । अगर वह दुर्घटना नहीं हुई होती तो शायद वह भी मेरे साथ स्पेशल पहली कक्षा में चला जाता।


क्रमशः ...............

4 comments:

Suman said...

nice

ललित शर्मा said...

बहुत अच्छी पोस्ट ....

धन्यवाद

वन्दना said...

rochak sansmaran.

Shekhar Kumawat said...

bahut khub