कैसे बीते दिन



कैसे बीते दिन कैसी है रातें 
हम किस तरह से कहे मन की बातें 
कैसे  बीते दिन...................
कहे उनसे कोई है लंबी ये रातें 
करवटें बदल रही है थकती निगाहें 
कैसे बीते दिन....................
वो जन्मों की कसमे यादों में आये
रही मन में कसकें न वादे निभाए 
कैसे बीते दिन ...................
ढूंढें निगाहें अब भी वो चाहे
वो नज़रों का मिलना कैसे भुलाएं 
कैसे बीते दिन .....................
अंजुम निहारें है कोई क्या उनसा
मगर मिल न पाए जो उनसे हो मिलता 
कैसे बीते दिन ..........................

मीत सँग हो भोर

 "मीत सँग हो भोर"

जीवन जीने की कला, मिला तुम्ही से मीत।
अब आकर इस मोड़ पर, बढ़ा और भी प्रीत।।

गहरे होते भाव जो, वो‌ उतने  गंभीर।
बिनु बोले जो कह गए, नैनो की तासीर।।

ह्रदय सदा ही ढूँढता, मिलने का संयोग।
कहने को तो बहुत पर, कैसे सहूँ वियोग।।

स्त्रोत प्रेरणा का मिला, वही सृजन का हार।
दिशा दिखाया आपने, बहुत बड़ा उपकार।।

मन-दर्पण को देखकर, होते भाव विभोर।
कुसुम हृदय की कामना, मीत संग हो भोर।।

©कुसुम ठाकुर