मेरा १०० वाँ पोस्ट

(मेरा १०० वाँ पोस्ट मेरे उस साथी को समर्पित जिसने मुझ पर विश्वास किया ।)

"जीवन तो है क्षण भंगुर"

बिछड़ कर ही समझ आता,
क्या है मोल साथी का ।

जब तक साथ रहे उसका,
क्यों अनमोल न उसे समझें ।

अच्छाइयाँ अगर धर्म है,
क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।

सराहने मे अहँ आड़े,
अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।

ज्यों अहँ को गहन न होने दें,
तो परिलक्षित होवे क्यों ।

क्यों साथी के हर एक इच्छा,
को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।

सामंजस्य की कमी जो नहीं,
कटुता का स्थान भी न हो ।

कहने को नेह बहुत,
तो फ़िर क्यों न वारे हम ।

खुशियों को सहेजें तो,
आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।

दुःख भी तो रहे न सदा,
आपस में न बाटें क्यों ।

जो समर्पण को लगा लें गले,
क्यों अधिकार न त्यागे हम ।

यह जीवन तो है क्षण भंगुर,
विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।

-कुसुम ठाकुर -

संस्मरण

एक बार मुझे किसी पत्रिका के लिए कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।

मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था ।

अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।

यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।

उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।

एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।

वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पडे तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।

मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।

लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा कि थी वो भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पडा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पडा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई साल तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नही है तो मन की शान्ति, नहीं है तो साथ ।


क्रमशः ............

संजो रही बस स्मृतियों को




"संजो रही बस स्मृतियों को "


समय भी इतना बदल जायेगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।


हम तो रहते थे प्रतिपल ,
स्नेह सुधा लुटाने को ।
स्वयं के लिए न सोची अब तक ,
आज लगे सब बदला बदला ।
समय भी इतना बदल जाएगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।


खुशियों की तो बात ही क्या है ,
वह तो अपनो के सँग है ।
अब हम हर पल वारें किस पर ,
दूर देश मे वे बसते हैं ।
समय भी इतना बदल जायेगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।


यह मन बसता अब भी उनपर ,
जो हैं हमसे कोसों दूर ।
पर आह्लाद करें हम कैसे
संजो रही बस स्मृतियों को ।
समय भी इतना बदल जाएगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।


- कुसुम ठाकुर -

कब आओगे समझ न आये

( आज मेरे लिए एक विशेष दिन है। यह कविता उस खास व्यक्ति को समर्पित है जिसने मुझे जीना सिखाया ।
 "कब आओगे समझ न आये" 
 
मैं तो बैठी पलक बिछाए , 
कब आओगे समझ न आए ।
 दिन भी ढल गया, हो गई रैना , 
जाने क्या ढूँढे ये नैना । 
 हर आहट लागे कर्ण प्रिय , 
तिय धर्म निभाऊँ कहे यह जिय । 
कुछ कहने को भी उद्धत है हिय , 
समझ न आये करूँ क्या पिय । 
 जानूँ मैं तुम जब आओगे , 
स्नेह का सागर छलकाओगे । 
फ़िर भी मेरे आर्द्र नयन हैं , 
सोच तिमिर यह ह्रदय विकल है। 
 - कुसुम ठाकुर -

ढूँढूँ तो पाऊँ मैं कैसे


"ढूँढू तो पाऊँ मैं कैसे "

पर ढूँढूँ मैं तुमको वैसे ,
ढूँढूँ तो पाऊँ मैं कैसे ?

आज मैं कहना कुछ चाहूँ
पर ,कहूँ किसे यह समझ न पाऊँ ।
याद करूँ मैं हर पल तुमको ,
 ढूँढूँ कैसे समझ न हमको।

कैसे बीता साथ सफर यह
समझ न पाई राज अभी वह।
अब तो लगता दिन भी भारी ,
रातों को तो स्वप्न ही सारी।

ध्यान में लिए छवि मैं सींचूं ,
पलक संपुटों में मैं भींचूं ।
जाने कब वह बस गयी उर में ,
चली गयी निद्रा के वश में ।

अर्ध रात्रि को नींद खुली तो ,
कानों ने यह बात सुनी तो _
मैंने तुमसे प्यार किया है ,
अपना सब कुछ वार दिया है ।

पर ढूँढूँ मैं तुमको वैसे ,
ढूढूं तो पाऊँ मैं कैसे ?

- कुसुम ठाकुर -




रहूँ मैं ऊहापोह में

"रहूँ मैं ऊहापोह में " 
 सोचूँ मैंने क्या बुरा किया , दिल की कही न छोड़ दिया । 
समय की पुकार को , किया कभी न अनसुना । 
 किया कभी न आत्मसात , ह्रदय की पुकार को । 
चली तो सदा साथ साथ , समय को निहार कर । 
 कठिन तो लागे है डगर , यह सोचूँ बार बार मैं । 
दिल की कही जो छोड़ दूँ । रहूँ मैं ऊहापोह में । 
 - कुसुम ठाकुर -

कैसे कहूँ मुझे क्यों है फिकर इतनी


" मुझे क्यों है फिकर इतनी "

कैसे कहूँ मुझे क्यों है फिकर इतनी ,
कभी ख़ुद के लिए न शिकन जितनी ।
सुनी जब से है नासाज तबियत उसकी ,
न है चैन न पाऊँ तो ख़बर उसकी ।

कहने को तो दूर है वो मुझसे,
पर लगता है जैसे वो करीब रूह से ।
महसूस मैं करुँ बदलूँ जब करवट,
हाय इस हाल में तड़पूँ कब तक ।

लगूँ गैर सा मगर ये तड़प जब तक ,
आए भी न चैन न लूँ साँसें तब तक ।
कोई बतला दे मैं बयाँ करूँ कैसे ,
न मैं गैर, न हूँ अजनबी वैसे ।।

- कुसुम ठाकुर -


ख़ुद को मैं तन्हा पाई


"ख़ुद को मैं तन्हा पाई "

दुनिया की इस भीड़ में ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।

खुशियों के अम्बार को देखी ,
चाही गले लगा लूँ उसको ।
खुशियों के अम्बार में जाकर ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।

सोची दुःख में होश न होगा ,
चल पडूँ मैं साथ उसी सँग ।
दुःख के गोते खाई फ़िर भी ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।

सपनों के सपने मैं देखूँ ,
तन्हाई उसमे क्यों हो ।
पर सपना तो बीच में टूटा ।
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।

कहने को तो साथ बहुत से ,
पर साथ चलन को मैं तरसी ।
चाहे कहीं भी जाऊँ मैं तो ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।।

- कुसुम ठाकुर -


बस रहो तुम सदा मुस्कुराते हुए



"बस रहो तुम सदा मुस्कुराते हुए "


 रहो तुम सदा मुस्कुराते हुए 
यही एक तमन्ना, यही आरजू 
कुछ कहूँ मैं तुम्हें तो सच मान लो ,
करो विश्वास हर मोड़ पर ।


मुझे अपने से ज्यादा भरोसा अगर ,
तुम पर ही है, यह मान लो 
तुम जो भी कहो सिरोधार्य है,
कुछ प्रमाणित करो न यही मैं कहूँ



तुम कहते सदा मैं खुली हुई किताब ,
 देर किस बात की, पढ़ लो मुझे 
तुम चाहो अगर, पूछ सकते मुझे ,
मैं व्याख्या करूँ ,हर एक प्रश्न का ।

- कुसुम ठाकुर -

न वहाँ पर है चैन यहाँ पर न खुशियाँ

"न वहाँ पर है चैन यहाँ पर न खुशियाँ "
 
न वहाँ पर है चैन, यहाँ पर न खुशियाँ । 
जाऊँ फिर कहाँ, पाऊँ मैं न पंथियाँ । 
है नन्हा सा दिल, कह सके सारी रतियाँ । 
पाऊँ मैं न ठौर, कहूँ कैसे बतियाँ । 
न वहाँ पर है चैन................ । 
 थी मुद्दत से मेरी, तमन्ना यही कि । 
कोई मुझको मिल जाए, कह दूँ उसे कि । 
हो चाहत तुम मेरी, इबादत भी तुम हो । 
रहूँ मैं सदा बनके, तुम्हरी ही अँखियाँ । 
न वहाँ पर है चैन ................. । 
 दिल की लगी अब, सहा भी न जाए । 
कहूँ अब मैं कैसे, कहा भी न जाए । 
मिला है तो बस, अब मेरे लब सिले हैं । 
खामोशियाँ हैं, बेबस हूँ मैं तो । 
न वहाँ पर है चैन ........... । 
 - कुसुम ठाकुर -

जन्म मरण अज्ञात क्षितिज


"जन्म मरण अज्ञात क्षितिज"

जन्म मरण अज्ञात क्षितिज ,
जिसे समझ सका न कोई ।
न इसका कोई मानदंड ,
और न जोड़ है इसका दूजा ।

कभी लगे यह चमत्कार सा ,
लगे कभी मृगमरीचिका ।
कभी तो लागे दूभर जीवन ,
कभी सात जन्म लागे कम ।

धूप के बाद छाँव है आता ,
है यह रीति प्रकृति का ।
पर जीवन की धूप छाँव ,
रहे कभी न एक सा ।

कभी लगे जन्मों का फल ,
पर साथ भी फल है मिलता ।
पुनर्जन्म भी बीच में आए ,
 पर नहीं सिद्ध है कर पाए

आत्मा तो है सदा अमर ,
दार्शनिकों का कहना ।
वैज्ञानिकों ने बस इतना माना ,
कुछ नष्ट न होवे पूर्णतः ।।

- कुसुम ठाकुर -



दिल की बातें

"दिल की बातें " 
 कहना चाहूँ दिल की बातें , 
पर कहूँ कैसे उसे , 
जिसे न है ख़ुद की ख़बर , 
वो करे कैसे परवाह मगर। 
 चाहूँ तो कहना बहुत कुछ ,
 कहूँ कैसे समझ ना सकूँ , 
नयन तो फ़िर भी हैं उद्यत , 
पर होठ हिलते नहीं । 
 हो गयी मुद्दत कि मैंने ,
 दिल की कही अब छोड़ दी , 
शब्द तो लेतीं हिलोरें , 
पर कलम उठते नहीं । 
 लेखनी तो ली हाथों में , 
पर शब्द जँचते नहीं , 
शब्दों की बंदिश न भाती , 
है मूक भावना मेरी।।
 - कुसुम ठाकुर -

वीरान उपवन



"वीरान उपवन "

आज यह वीरान उपवन ,
किसकी बाट तक रहा है ।
शायद कोई माली आए ,
यह लगी मन में जगी है ।।


वह समय था जब कि उपवन ,
फूलों लताओं से महक उठता ।
पर आज उसकी दशा को ,
देखने न आते परिंदे ।।


था समय वह एक अपना ,
जब कि वह अभिमान में था ।
तितलियों की बात क्या थी ,
भौंरे भी मंडराते रहते ।।

कलियाँ जहाँ खिलखिलातीं ,
छटाएँ फूलों की निराली ।
रस चुरातीं मधुमक्खियाँ ,
अठखेलियाँ करता पवन भी ।।


है कोई उसका न माली ,
न कोई सींचे उसे अब ।।
जहाँ थे चुने जाते तिनके ,
सूखे पत्ते पड़े हुए अब ।।


- कुसुम ठाकुर -

चाहत

"चाहत "

जिन भावों की मैं, वर्षों से प्यासी
वह भाव आज, फ़िर से जगी है
जिस चाहत को मैं तो, भूल ही गई थी
वह चाहत मन में, जागृत हुई है
जिन नयनों को मैं, समझी कभी न
वे नयन अब मुझे, भाने लगे हैं
जिस द्वार पर मैं,न तकती थी उसपर
नजर मेरी अब तो, ठहर सी गई है
जिस समर्पण में न मुझे मिलती थी खुशियाँ
वह समर्पण मैं आज करने को उत्सुक
जिन खुशियों की मैं न की थी कल्पना
वह खुशी आज मिल ही गई है

- कुसुम ठाकुर -

वे लम्हें

"वे लम्हें "


वे लम्हें भूले नहीं जाते ,
वे वादे चाहूँ भी न भूलूँ ।
पर यह कैसी मजबूरी ,
चाहकर, पाऊँ भी न तुमको ।

खुली हुई आँखों में तुम हो ,
बंद आँखों में भी बसा लूँ ।
व्याकुल हो ढूँढूँ मैं जब जब ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।

नैनो की भाषा भी तुम हो ,
चाहत की परिभाषा भी यही पर ,
सोचूँ तो लगे सपना सा ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।

अंसुवन की धार भी तुम हो ,
अंजन और श्रृंगार तुम्ही हो ।
पर करूँ कितना भी जतन मैं ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।




-कुसुम ठाकुर -

मैं कैसे करूँ आराधना

"मैं कैसे करूँ आराधना "
 
मैं कैसे करूँ आराधना , 
कैसे मैं ध्यान लगाऊँ । 
द्वार तिहारे आकर मैया , 
मैं कैसे शीश झुकाऊँ । 
 मन में मेरे पाप का डेरा , 
मैं कैसे उसे निकालूं । 
न मैं जानूं आरती बंधन , 
मैं कैसे तुम्हें सुनाऊँ । 
 बीता जीवन अंहकार में , ल
याद न आयी तुम तब । 
अब तो डूब रही पतवार , 
कैसे मैं पार उतारूँ । 
 कर्म ही पूजा रटते रटते ,
 बीता जीवन सारा ।
 पर अब तो तन साथ न देवे ,
 अर्चना करूँ मैं कैसे । 
 मैं तो बस इतना ही जानूँ , 
तू सब की सुधि लेती । 
एक बार ध्यान जो धर ले
दौड़ी उस तक आती । - 
कुसुम ठाकुर -

वामन वृक्ष


" वामन वृक्ष "

वामन वृक्ष करे पुकार ,
झेल रहा मनुज की मार ।
वरना मैं भी तो सक्षम ,
रहता वन मे स्वछंद ।

देख मनुज जब खुश होते ,
मेरी इस कद काठी को ।
कुढ़कर मैं रह जाता चुप ,
किस्मत मेरी है अभिशप्त ।

बेलों को तो मिले सहारा ,
पेडों को मिले नील गगन ।
पर हमारी किस्मत ऐसी ,
तारों से हमें रखें जकड़ ।

बढ़ना चाहें हम भी ऐसे ,
जैसे बेल और पेड़ बढ़ें ।
पर बदा किस्मत में मेरे ,
मिले हमें वामन का रूप ।

फल भी छोटा फूल भी छोटा ,
देख मनुज पर खुश होवें ।
पर हमारी अंतरात्मा की,
आह अगर वे देख सकें ।

चाहें हम भी रहना स्वछन्द ,
लगे हमें यह पिंजरे सा ।
हम भी तो प्रकृति की रचना ,
करे मनुज क्यों अत्याचार ।।


- कुसुम ठाकुर -



अगर न होते तुम जीवन में

"अगर न होते तुम जीवन में "

अगर न होते तुम जीवन में
मैं कैसे गीत सुनाती
अपनी भावनाओं को कैसे
लयबद्ध मैं कर पाती

मेरी रचना मेरे भाव
मेरे लय और मेरे साज
सबकी तान तुम्हीं ने थामा
मैं तो हूँ एक जरिया मात्र

आज जहाँ हूँ उसकी नींव
डाला तुमने बन दस्तूर
और उस इमारत के
हर श्रृंगार तुम्हीं हो

सृजनहार तुम्हीं हो
अलंकार तुम्हीं हो
प्रशंसक तुम्हीं हो
आलोचक भी तुम्हीं हो

- कुसुम ठाकुर -

मेरे भाव मेरी अभिव्यक्ति

मेरे भाव मेरी अभिव्यक्ति 
 
मेरे भाव कुछ भी हों , 
पर अभिव्यक्त मैं, न कर पाती । 
ऐसा क्यों होता मेरे साथ , 
यह समझ न पाऊं मैं। 
 भाव तो होते मेरे नेक , 
पर अभिव्यक्ति में ही दोष । 
अब मैं कैसे समझाऊँ , 
जो हो उनको यकीन । 
 मैं तो सोच समझकर बोलूँ , 
जो न लगे अप्रिय उन्हें । 
पर त्रुटि तो रह ही जाती , 
मैं भी मानूँ , हूँ मैं इंसान ।
 मेरे अंतर्मन की भाषा , 
समझ न पाए, यह मेरा कसूर । 
मैं कैसे उन्हें कष्ट पहुँचाऊँ , 
जिनपर मैं करूँ सदा यकीन।
 -कुसुम ठाकुर -

My Visit To Standford ( From My USA Trip 2008 )






Fremont

I went to visit the prestigious Stanford University with Vickie on 28 June. It is recognized as world's one of the leading research and teaching institutions, located in the heart of silicon valley, Palo Alto,California. It was established in 1891 by the Governor of California, Leland Stanford and his wife Jane Stanford. It is named in honour of their only child Leland Stanford Junior,who died of typhoid just before his 16th birthday.

Stanford University owns 8,183 acres(32km)of land. The main campus is bounded by EL Camino Real, Stanford Avenue, Junipero Serra Boulevard and Sand Hill Road in the northwest part of the Santa Clara Valley on the Sanfrancisco Peninsula.All the buildings of the university has red roofs and the campus is very big and beautiful. As you enter the gate you can see the mile long beautiful palm drive, palm tree-lined entrance to campus, connects Stanford with the neighbouring town of Palo Alto. We went straight through the palm drive and after parking the first thing we noticed was, a beautiful garden full of flowers and the logo of Stanford was made in the middle by flowers. Now from there we went to the Main Quaid, it has university's first buildings, constructed between 1887-1891. As we entered the Main Quaid, we saw a large number of outdoor art installations throughout the campus of the university.Bronze statue of Auguste Rodin are scatterd throughout the campus. The first one I saw was Burghers of Colois.It is the attraction for the visitors, taking pictures with the statues there. We also took some pictures there with the statues.

After spending some time with the statues and having some pictures, we saw the Memorial Church, which was behind the Main Quad. Here also we had our photo session and now we went to see the famous Hoover Tower.It is visible throughout the surrounding area, serves as a landmark of Stanford to faculty, students, alumni and the local community.It is named after US President Herbert Hoover.Here also we had some pictures, because all the buildings looks so beautiful that you need some memory that you visited such a nice place.Now it was time to leave but I will never forget that I had to take a photograph of Ami, Anand and Vickie four times, because Vickie thought that I was not taking the photo properly and to make sure that photo was taken properly I had to take it four times.We returned to Anand and Ami's house had a nice dinner and came back to Fremont.