मैं कैसे करूँ आराधना



"मैं कैसे करूँ आराधना "


मैं कैसे करूँ आराधना ,
कैसे मैं ध्यान लगाऊँ ।
द्वार तिहारे आकर मैया ,
मैं कैसे शीश झुकाऊँ



मन में मेरे पाप का डेरा ,
मैं कैसे उसे निकालूं ।
न मैं जानूं आरती बंधन ,
मैं कैसे तुम्हें सुनाऊँ ।


बीता जीवन अंहकार में ,
याद न आयी तुम तब ।
अब तो डूब रही पतवार ,
कैसे मैं पार उतारूँ ।


कर्म ही पूजा रटते रटते ,
बीता जीवन सारा ।
पर अब तो तन साथ न देवे ,
अर्चना करूँ मैं कैसे ।


मैं तो बस इतना ही जानूँ ,
तू सब की सुधि लेती ।
एक बार ध्यान जो धर ले ,
दौड़ी उस तक आती ।


- कुसुम ठाकुर -

4 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ॐ शांति.

संगीता पुरी said...

सुंदर भावयुक्‍त रचना .. जय माता दी !!

rajani kapoor said...

jai mata di
bahut sunder prathna

rajani kapoor said...

jai mata di
bahut sunder prathna