"कैसे अब भूलूं मैं तुमको "

उस भाई की याद में जिसे मैं कितना मानती थी वह अब उसे नहीं कह पाऊंगी )

"कैसे अब भूलूं मैं तुमको "

हर पल तुमको याद करूं मैं 
रूठ गए क्यों मुझसे तुम ?

अब भी गूंजे दीदी दीदी
छोड़ गए क्यों दीदी को 

तुम तो हर पल छांव मेरे थे 
दूर रहकर भी आस मेरे थे 

बचपन की बातें हम करते 
अब किससे वो किस्से बाटूं

तुम तो कहते मत जा दीदी 
मुझसे पहले क्यों जल्दी थी 

जाने को तो मैं बढ़ती थी 
पर तुम मुझसे पहले पहुंचे 

वह तो सदा मनमानी करता 
एक अरज न सुनता मेरी 

मां बाबा भी तुमको चाहे 
मुझसे पहले गोद उठाए 

न भूली बचपन की बातें 
कैसे अब भूलूं मैं तुमको 
कुसुम ठाकुर-

" रोटरी के एक प्रेसिडेंट की व्यथा "

  " एक प्रेसिडेंट की व्यथा "

सन् 2012 में मैंने रोटरी की सदस्यता ली और उसका एकमात्र कारण यह था कि मैं बड़े स्तर पर सामाजिक कार्य करना चाहती थी और ज्यादा से ज्यादा जरूरत मंदो के काम आ सकूं इसी ध्येय के साथ मैंने 12 जुलाई 2012 को अपने जन्मदिन के दिन रोटरी क्लब ऑफ जमशेदपुर मिड टाउन की सदस्यता ली. मैं रोटरी में शामिल होने से पहले भी सामाजिक कार्यों से जुड़ी थी और गांव बस्तियों की खाक छानती रहती थी . आज भी उन गांव और बस्तियों के लोग मुझे जानते हैं और याद करते हैं. 

मेरी आदत है, जिस काम का जिम्मा मैं लेती; मेरी कोशिश होती कि उसकी जिम्मेदारी मैं अच्छे से निभाऊं और  रोटरी में तो काम करने के लिए ही शामिल हुई थी.  मेरी कोशिश होती कि मैं सारे मीटिंग, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस  में भाग लूं ताकि मुझे सीखने को मिले और बहुत कुछ सीखा भी मैंने।  हर मीटिंग, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस में रोटरी के एक से एक वक्ता होते; जिनसे सीखने के लिए बहुत कुछ होता। मैं हर वक्ता के वक्तव्य को बड़े ही ध्यान से सुनती और वापस आकर अपने क्लब के सदस्यों से उनकी तारीफ और बखान भी करती। पर एक बात जो हर मीटिंग में आम तौर पर समझ में आता वो यह कि प्रेसिडेंट के लिए 365 दिन बहुत अहम होता है और उन 365 दिन का बॉस प्रेसिडेंट होता है. 

क्लब में शामिल होने के शुरू के दिनों में तो नहीं पर कुछ सालों के बाद जब मुझे भी प्रेसिडेंट के लायक क्लब के सदस्य समझने लगे तब मैं भी आम इंसानों की तरह, प्रेसिडेंट बनने के मंसूबे देखने लगी. मुझे लगने लगा प्रेसिडेंट बनकर मैं कुछ विशिष्ट बन जाऊंगी और विशिष्ट बनने  की  इच्छा किसे नहीं होती। विशिष्ट बनने पर कुछ कर्तव्य भी होते और उन कर्तव्यों में एक कर्तव्य होता, सारे मीटिंग, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस में शामिल होना। विशिष्ट होने पर दूसरे क्लब वाले भी अपने अपने इंस्टॉलेशन में और विशिष्ट अवसरों पर निमंत्रण देंगें ही; वहां भी तो जाना जरूरी हो जाएगा। आखिर 365 दिनों की बॉस जो रहूंगी। यह सब सोच मैंने अपनी तैयारी शुरू कर दी कहां कहां जाना होगा यह सब  मन ही मन  मैंने  तय कर लिया और वहां के कार्यक्रम के अनुसार कपड़े वगैरह की तैयारी भी शुरू कर दी खासकर इंस्टॉलेशन और कॉन्फ्रेंस की मैंने बहुत जोर-शोर से तैयारी की थी. या यूं कहें तो इंस्टॉलेशन और कॉन्फ्रेंस की तैयारी तो मैंने उसी दिन से शुरू कर दी थी जिस दिन क्लब सदस्यों ने मुझे प्रेसिडेंट बनाने का निर्णय लिया जिसके लिए मैंने तुरंत सहमति भी दे दी थी.  इंस्टॉलेशन कहां और कैसे करना है वह तो उसी दिन से सोचना शुरू कर दी थी जिस दिन मेरा प्रेसिडेंट बनना तय हुआ. 

एक साल व्यस्तता रहेगी यह सोच होली में अपने बड़े बेटे के पास पूना गई और मेरे लौटने की तारीख से पहले ही लॉक डाउन लग गया.  किस्मत तो देखो इंस्टॉलेशन की सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई. आठ क्लबों का इंस्टॉलेशन एक साथ वो भी ऑनलाइन होना तय हुआ. तैयारी में एक साथ आठ बॉस को इकठ्ठा निर्णय लेना था साथ ही कुछ सुपर बॉस भी थे. कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पास जिन रंगो की अच्छी अच्छी साड़ियां पूना में थीं वो सारी की सारी रिजेक्ट कर दी गई .......... एक रंग जो हम सारी प्रेसिडेंट को पहनने का निर्णय लिया गया उस रंग  की बहुत ही साधारण सी साड़ी मेरे पास थी. लॉकडाउन के कारण न ही ऐसी परिस्थिति थी कि साड़ी खरीदी जाए न समय था बस उसी साड़ी को पहन मैंने ऑनलाइन ही प्रेसिडेंट की शपथ ली. उस दिन मायूस तो हुई पर मन को सांत्वना देते हुए सोची कॉन्फ्रेंस में सारी कसर निकाल लूंगी पर मेरी किस्मत में वो भी दिन नहीं आया। कॉन्फ्रेंस के साथ सारे के सारे कार्यक्रम रद्द हो गए और उन्हें ऑनलाइन ही कर दिया गया. हर कार्यक्रम के बाद आपस के विचार विमर्श से और मीटिंग के बाद उम्मीद जगती कि अगला कार्यक्रम में हम मिल सकते हैं; पर वह दिन नहीं आया और हमारा स्वर्णिम 365 दिन भी खत्म हो गए। मेरी सारी की सारी तैयारी धरी की धरी रह गई। हमारे इनकमिंग गवर्नर ने इंस्टॉलेशन का वोडियो शूट का बहुत ही अच्छा निर्णय लिया, जैसे ही पता चला कॉलर एक्सचेंज प्रोग्राम की वीडियो शूट होगी मेरी संजोए हुए साड़ियों में से एक साड़ी पहनने की उम्मीद जगी; यह सोच मैं खुशी से फूली नहीं समाई। "चलो उतनी साड़ियों  में से एक साड़ी तो पहनने  को मिलेगी "। मन में आया अब तो "मैं बॉस भी नहीं हूं, मात्र बॉस को कॉलर सुपुर्द करना है", पर कोई एक साड़ी पहनने का मौका तो मिलेगा। चूंकि एक भी आउटगोइंग प्रेसिडेंट कॉलर एक्सचेंज शूट वाली मीटिंग में नहीं थे अतः मेसेज मिला बस एक ही रंग बचा है आउटगोइंग प्रेसिडेंट के लिए, बाकी सब तय हो गया है. आज भी जब मैं अपनी आलमारी खोलती हूं लगता है साड़ियां मुझे चिढ़ा रही हैं.  

नारी व्यापकता का द्योतक है ,एक दिन ही क्यों ?

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1908 ई. में अमेरिका की 15000 कामकाजी महिलाएं अपने शोषण के विरुद्ध और अपने अधिकारों की मांग को लेकर सडकों पर उतर आईं। उनका मुख्य मुद्दा महिला और पुरुष के तनख्वाह  में असमानता की थी । 1909 ई. में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने उनकी मांगों के साथ-साथ राष्ट्रीय महिला दिवस की भी घोषणा कर दी । 1911 ई. में इसे ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का रूप दे दिया गया। ८ मार्च 1975 को अमेरिका में पहली बार अंतराष्ट्रीय महिला दिवस का  आयोजन हुआ और तब से  अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाई जा रही है। परन्तु कुछ वर्षों से " हर संस्थान में महिला दिवस मनाने की होड़ सी लगी  रहती है 

परंतु कुछ वर्षों से सभी संस्थानों की कोशिश होती है वे अच्छे से इस दिन को मनाएं और अपने आस पास की विशिष्ट महिलाओं को सम्मानित करें ।  ऐसा नहीं है कि किसी को विशेष दिन पर याद करना या उसे उस दिन सम्मान देना बुरी बात है। बुरा तो तब लगता है जब विशेष दिनों पर ही मात्र आडंबर के साथ कई उपाधि, सम्मान दी जाती है  सम्मान बोलकर देने की भी जरूरत नहीं है सम्मान तो मन से होता है क्रिया कलाप में होता है। क्या एक दिन महिला दिवस मना लेने से महिलाओं का सम्मान हो जाता है ? यह मेरा प्रश्न उन सभी लोगों से है जो महिला दिवस के पक्षधर हैं ?  किस महिला की क्या उपलब्धि है यह हम महिला दिवस के अवसर पर खोज तो लेते हैं पर साल के बाकी दिन ? क्या कभी अपने घर की महिलाओं पर ध्यान दिया है, उनके योगदान पर कभी दो शब्द सराहना के बोला है ? मेरा घर से तात्पर्य केवल अपने घर से ही नही है , अपने संस्थान अपने दफ्तरों से भी है एक बार घर की महिलाओं की सराहना करके भी देखिए ।  
 
कहने को तो आज सभी कहते हैं "नारी पुरुषों से किसी भी चीज़ में कम नहीं हैं". परन्तु नारी पुरुष से कम बेसी की चर्चा जबतक होती रहेगी तबतक नारी की स्थिति में बदलाव नहीं आ सकता।  बचपन में समानार्थक शब्द जब भी पढ़ती थी बस नारी के पर्यायवाची  शब्द "अबला " पर आकर अटक जाती थी। मेरे मन में एक प्रश्न बराबर उठता -"इतने शब्द हैं नारी के फिर अबला क्यों कहते हैं"? अबला से मुझे निरीह प्राणी का एहसास होता है। सोचती थी जो त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाती है वह अबला कैसे हो सकती ? एक तरफ हमारे पुरानों में नारी शक्ति का जिक्र है दूसरी तरफ हमारे व्याकरण में उसी नारी के लिए अबला शब्द का प्रयोग क्यों ? पर मुझे उत्तर मिल नहीं मिल पाता । मैं अबला शब्द का प्रयोग कभी नहीं करती थी बल्कि अपनी सहपाठियों को भी उसके बदले कोई और शब्द लिखने का सुझाव देती  थी।

जब मैं अपने बच्चों को पढ़ाने लगी उस समय भी बच्चों को नारी के समानार्थक शब्दों में "अबला" शब्द लिखने पढ़ने नहीं देती थी और बड़े ही प्यार और चालाकी से नारी के दूसरे-दूसरे शब्द लिखवा देती । मालूम नहीं क्यों अबला शब्द मुझे गाली सा लगता था और अब भी लगता है।  आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ । इन सबके बावजूद उसके स्वाभाविक रूप में कोई बदलाव नहीं आया है ।  आज भी हमारे यहां लोग विधवा और परित्यक्ता  को बेचारी अलंकार के बिना नहीं कहते । क्या मात्र पति के न रहने या साथ न रहने से वह बेचारी हो जाती है । यदि औरतें  पति के नही रहने पर बेचारी हो जाती हैं तो मर्द के विदुर होने पर बेचारा अलंकार क्यों नही लगाया जाता, यह आज  के समाज से मेरा प्रश्न है ?

ऐसा नहीं है कि नारी की दशा में औरतों का कोई दोष नही आज की नारी कुंठा ग्रसित हैं, जो उन्हें ऊपर उठाने में बाधक हो सकता है । हमारे साथ कल क्या हुआ उस विषय में सोचने के बदले यदि हम अपने आज के बारे में सोचें तो हमारा आत्म विश्वास और अधिक बढेगा । बीता हुआ कल तो हमें कमजोर बनाता है , हमारे मन में आक्रोश ,कुंठा , बदले की भावना को जन्म देता है । फिर क्यों हम अपने अच्छे बुरे की तुलना कल से करें और बात बात में नीचा दिखाने की कोशिश करें। जरूरी नहीं कि उंगली उठाने से ही गल्ती का एहसास हो । हमरा ह्रदय हमारे हर अच्छे बुरे की गवाही देता है, धैर्य भी तो नारी का एक रूप है। 


हर महिला दिवस पर महिलाओं के लिए सरकार के द्वारा भी आरक्षण की बात होती है कुछेक सम्मान का आयोजन भी । साल के बाक़ी दिनो में हर क्षेत्र में अब भी न वह सम्मान न वह बराबरी मिल पाता है जिसकी वह हकदार है या जो महिला दिवस मनाते वक्त कही जाती है। आज की हर नारी से मेरा एक प्रश्न,  मेरे हिसाब से जिसपर सोचने की जरूरत है एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है । यहाँ भी अबला का एहसास होता है । क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे ? क्या "कोटा" का ताना बंद हो जायेगा ? हममें  क्षमता है जिसके बल पर हम किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं । जरूरत है तो बस हमें कमतर न समझा जाए कमजोर न समझा जाए  


महिला दिवस, नारी दिवस के औचित्य  पर मेरा व्यक्तिगत विचार :  नारी तो व्यापकता का द्योतक है, क्या मात्र एक दिन ही महिलाओं के लिए काफी है ? एक दिन  ढोल पीट-पीटकर महिला दिवस मना लेने से जिम्मेदारी ख़त्म हो जाती है या महिलाओं के हिस्से की इज्जत और सम्मान बस वहीँ तक सिमित है?  नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी । यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी अबला शब्द व्याकरण से नहीं निकल पाया है और तब तक नहीं निकल पायेगा जबतक हम नीचा दिखाने की कोशिश करते रहेंगे ,आरक्षण की मांग करते रहेंगे । हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की और तब "नारी" शब्द का पर्यायवाची "अबला" हमारे व्याकरण से निकल पायेगा और उस दिन के बाद से हर दिन महिला दिवस होगा 

टेलीग्राम की महिमा

  "टेलीग्राम की महिमा"

(यह लघु कथा मैंने दशको पहले लिखी थी , यह कथा उस ज़माने की है जब टेलीग्राम सबसे जल्दी समाचार पहुँचाने का जरिया था, शब्दों के हिसाब से पैसे लगते थे इसलिए कम से कम शब्दों में सन्देश भेजा जा सके यह कोशिश होती थी. लोग टेलीग्राम को पढ़ सन्देश का अनुमान खुद लगाते थे)  

सुधा के पिताजी बोकारो स्टील के एक उच्च अधिकारी थे उसके जेठ भी उन्ही के विभाग में कार्यरत थे. दरअसल सुधा की शादी में उसके जेठ जिठानी ने मुख्य भूमिका निभाई थी . सुधा और श्यामानंद का गांव आस-पास ही था अतः सुधा के खानदान के बारे में तो श्यामानंद के परिवार वाले पहले से ही जानते थे.  श्यामानंद की माँ को ज्यादा चिंता थी कि श्यामानंद खुद इतने सज्जन है तो उनकी शादी भी सुशील कन्या से होनी चाहिए । सुधा की जेठानी ने इसकी गारंटी लेते हुए अपनी सास से कहा कि "लड़की अत्यंत ही सज्जन और सुशील है "। श्यामानंद को अपने भाई भाभी पर बहुत भरोसा था फिर भी उन्होने एक बार अपनी भाभी को लड़की से मिलवाने का जिक्र किया पर माँ नहीं मानी, उन्होंने साफ़ कह दिया उनके घर में आजतक किसी ने लड़की को शादी से पहले नहीं देखा है. श्यामानंद अपनी माँ की बात को ब्रह्म वाक्य मानते थे अतः उन्होंने शादी से पहले सुधा को देखने का ख्याल ही छोड़ दिया। 

सुधा अपने माता पिता की सबसे बड़ी संतान थी.  उसके दादा जी की पूरे इलाके में काफी प्रतिष्ठा थी पर वे काफी साल पहले ही परलोक सिधार गए थे दादी गांव में ही रहती थीं उनके आग्रह पर सुधा की शादी गांव से ही होना तय हुआ.  शादी के वक्त सुधा ने मैट्रिक पास कर कॉलेज में दाखिला लिया था, श्यामानंद फाइनल ईयर इंजिनियरिंग में थे.  दोनों की शादी काफी सादगी पर सारे रस्मों रिवाज के साथ संपन्न हुआ. सुधा अपने ससुराल चली गई और उसके माता पिता अपने बाकी के बच्चों के साथ बोकारो वापस चले गए . सुधा हर वर्ष अपने माता पिता के साथ गांव जाती थी पर ससुराल का माहौल कुछ अलग ही रहता है वो भी गांव का . दिनभर मिलने वालों का आना जाना लगा रहता था गाँव की बुजुर्ग महिलायें तो मिल लेतीं और कुछ देर पास में बैठने के बाद कमरे से बाहर जाकर उसकी सास के साथ बातें करतीं थीं पर गांव टोले की लड़कियां जिनसे ननदों का रिश्ता था उनका आना जाना लगा रहता। बहुत मुश्किल से दोपहर में कुछ देर आराम करने का समय मिलता। सुधा बैठे बैठे थक जाती पर कहे किससे ? उसकी स्थिति कभी कभी उसकी जेठानी भाप लेती और वे मिलने वाली ननदों को,  कुछ बहाने से बाहर ले जातीं और उसे इशारा कर देती कि कमरे बंद कर ले. 

सारी रस्मो रिवाज ख़त्म हो गई और एक एक कर अतिथि अपने अपने घर चले गए गांव में सुधा श्याम के आलावा उसके सास ससुर, जेठानी और एक छोटा देवर रह गए. एक दिन रात में श्याम ने सुधा से कहा अब मेरी छुट्टी ख़त्म हो रही है मुझे अब कुछ दिनों में लौटना होगा मेरे साथ भाभी भी जाएँगी उन्हें बोकारो छोड़ मैं रांची चला जाऊँगा। भैया जाते समय मुझे कहकर गए थे कि भाभी को बोकारो पहुँचाने का जिम्मा तुम्हारा ही है. तुम तो अभी कुछ दिन और यहाँ रहोगी तुम्हे लेने तुम्हारा भाई आएगा तुम्हारे पिताजी से मेरी बात हो गई थी.  सुधा यह सुन अपने पति से बोली मैं भी मायके आपके साथ ही जाना चाहती हूँ.  आप अपने पिताजी से अनुमति ले लें तो मैं भी आपके ही साथ बोकारो जा सकती हूँ. श्याम असमंजस में पड़ गए, सुधा को समझाते हुए उन्होंने कहा; अच्छा मैं सुबह पिताजी से बात करता हूँ पर शायद पिताजी नहीं माने पहली बार मायके से कोई न कोई लेने आता है यह हमारे यहाँ का रिवाज है फिर भी मैं उनसे बात करता हूँ.  

सुधा रात भर मायके जाने के विषय में ही सोचती रही, सुबह जल्दी उठ गई उसे मायके जाने की तीव्र इच्छा हो रही थी, उसने अपने पिताजी को एक चिट्ठी लिखी, जिसमे उसने लिखा पिताजी चूँकि श्याम अपनी भाभी को छोड़ने बोकारो जा रहे हैं मैं भी उन्ही के साथ आना चाहती हूँ. आप यदि श्याम के पिताजी को मेरी बिदाई के लिए आग्रह करें तो वो मान जाएंगे। मैं भी श्याम के साथ ही बोकारो आ जाऊँगी. उसने चिट्ठीअपने छोटे देवर को देकर उससे बोली अभी तुरंत जाकर पोस्ट ऑफिस में डाल दीजिये बहुत जरूरी चिट्ठी है.

सुधा चिट्ठी भेज तो दी पर उसके मन में तरह तरह के भाव आने लगे, कभी सोचती क्या ससुर जी उसे जाने देंगे ? कभी मन में आता उसकी सास को बुरा न लगे, वे तो सबसे कह रही थीं अभी बहु कुछ दिनों के लिए मेरे पास ही रहेगी कॉलेज खुलने से पहले फिर मायके चली जाएगी।  कभी मन में आता पहली बार है, दूसरी बार आएगी तो सास को अपने व्यवहार से खुश कर देगी। 

श्यामनन्द के जाने का समय ज्यों ज्यों नजदीक आता जा रहा था सुधा का मन उदास रहने लगा . उसके मन में तरह तरह के विचार आते, कभी सोचती सभी चले जायेंगे तो वह अपनी पढाई पर ध्यान देगी। कभी तो उसे लगता यहाँ तो न कोई मेरा साथी है न ही अपनी कोई ननद जिसके साथ बात चित या अपने मन की भावनाओं को व्यक्त कर सकूँ, सास से भी अभी तक खुलकर बातें नहीं कर पाती। काम काज करने की कई बार कोशिश की पर सास कहतीं हमारी सास ने भी मुझे पहली बार काम नहीं करने दिया था, अगली बार आना तो काम करना इसबार नहीं। 

सुधा अपने कमरे से निकलकर बैठक में जा रही थी उसकी दादी ने उसके चाचा को उससे मिलने के लिए भेजा था साथ में उसके लिए कपड़े और तरह तरह के पकवान और मिठाई भी.  वह अभी बैठक में पहुँच चाचा को प्रणाम की ही थी कि ससुर जी की आवाज आई कहाँ से टेलीग्राम आया है.  वह चाचा को प्रणाम कर बरामदे वाले दरवाजे के पास चली गई वहां से उसके ससुर जी की आवाज  सुनाई दे रही थी. उसके पति भी बाहर ही थे. पोस्ट मैन टेलीग्राम देने आया था . वह कह रहा था  बोकारो से टेलीग्राम आया है. सुधा बोकारो का नाम सुन और ध्यान से बातें सुनने का प्रयास करने लगी पर उसे समझ में नहीं आया वे लोग आपस में क्या बातें कर रहे थे. सुधा के चाचा को भी उसके ससुर जी ने बाहर बुला लिया। सुधा को जब कुछ समझ में नहीं आया तो अपने कमरे में आकर श्याम का इंतज़ार करने लगी. थोड़े ही इंतज़ार के बाद श्याम और श्याम के पिताजी के आंगन में आने की आवाज आई . उसके ससुर जी की आवाज अब स्पष्ट सुनाई दे रही थी वे सास से कह रहे थे कल सुधा और श्याम के जाने का इंतज़ाम करो और हाँ समाधी जी भी थोड़ी देर में चले जायेंगे उनके खाना और बिदाई का इंतज़ाम जल्दी कर दो. सरोज (बड़ी बहु) अभी नहीं जाएगी वो बाद में जाएगी। सुधा के समझ में नहीं आ रहा था आखिर टेलीग्राम में क्या है कि ससुर जी ऐसे बोल रहे हैं. खैर कुछ समय बाद श्याम आये और बोले सामान ठीक करो अपना और मेरा भी हम दोनों कल सुबह बोकारो जायेंगे, भाभी बाद में आएँगी।  सुधा ने धीरे से पूछा टेलीग्राम में क्या है और कहाँ से आया है. श्याम ने कहा "बाद में बताऊंगा " तुम सामान ठीक कर लो. 

सुधा के चाचा जाने के लिए तैयार थे, सुधा चाचा को प्रणाम करके बोली दादी को बता दीजियेगा मैं बोकारो जा रही हूँ वहां से चिट्ठी लिखूंगी। 

सुधा और श्याम ने सभी बड़ों को प्रणाम कर उनसे विदा लिया, सुधा के मन में बार बार प्रश्न उठ रहे थे आखिर टेलीग्राम में क्या था कि भाभी जाने वाली थीं वो तो रुक गईं और ससुर जी ने मुझे विदा कर दिया। उसने ने एक दो बार रास्ते में श्याम से पूछने की कोशिश भी की पर श्याम ने यही कहा कोई खास नहीं शायद तुम्हारे माँ की तबियत ठीक नहीं।  श्याम और सुधा सुबह सुबह बोकारो पहुँच गए सुधा ने जैसे ही गेट खोला माँ सामने ही बरामदे में बैठी मिली। सुधा ने माँ के पैर छूकर प्रणाम करते हुए पूछा तुम्हे क्या हुआ है .............? माँ आश्चर्य से बोली मुझे............ ? मुझे तो कुछ नहीं हुआ है, सुधा ने पूछा और बाबूजी ? तबतक सुधा के बाबूजी भी बाहर आ गए आते ही कहा आ गए तुम लोग? सरोज को भी पहले यहीं ले आते, शाम में चली जाती। श्याम बोले वो नहीं आयीं , वो तो माँ की तबियत ख़राब है सुन घर में बाबूजी माँ चिंतित हो गए इसलिए उन्होंने सुधा को तुरंत भेज दिया, भाभी बाद में आएंगी पर माँ तो कह रही हैं उन्हें कुछ नहीं हुआ पर आपके टेलीग्राम .........सुधा के पिताजी ने कहा अब समझा ............. मैंने जो टेलीग्राम किया थ यह उसी का कमाल है. दरअसल सुधा की चिट्ठी देख मुझे लगा अब चिट्ठी भेजने से समय पर नहीं मिल पायेगा इसलिए Send Sudha with Shyam टेलीग्राम कर दिया था. लगता है उसी का मतलब लोगों ने लगाया कि तुम्हारी माँ की तबियत ठीक नहीं है . सुधा के पिताजी ने इतना कहा ही था कि चाचा को गेट खोलते देख आश्चर्य हुआ साथ में सुधा की दादी भी थीं. दादी को देख सभी आगे बढे...... दादी ने सुधा की माँ को देखते ही पूछा बहु को क्या हुआ है. सुधा की माँ पांव छूते हुए बोलीं माँ मैं बिलकुल ठीक हूँ मुझे कहाँ कुछ हुआ है.  सभी हंस पड़े सुधा झेंप गई ........ 


 

  


कैसे बीते दिन



कैसे बीते दिन कैसी है रातें 
हम किस तरह से कहे मन की बातें 
कैसे  बीते दिन...................
कहे उनसे कोई है लंबी ये रातें 
करवटें बदल रही है थकती निगाहें 
कैसे बीते दिन....................
वो जन्मों की कसमे यादों में आये
रही मन में कसकें न वादे निभाए 
कैसे बीते दिन ...................
ढूंढें निगाहें अब भी वो चाहे
वो नज़रों का मिलना कैसे भुलाएं 
कैसे बीते दिन .....................
अंजुम निहारें है कोई क्या उनसा
मगर मिल न पाए जो उनसे हो मिलता 
कैसे बीते दिन ..........................

मीत सँग हो भोर

 "मीत सँग हो भोर"

जीवन जीने की कला, मिला तुम्ही से मीत।
अब आकर इस मोड़ पर, बढ़ा और भी प्रीत।।

गहरे होते भाव जो, वो‌ उतने  गंभीर।
बिनु बोले जो कह गए, नैनो की तासीर।।

ह्रदय सदा ही ढूँढता, मिलने का संयोग।
कहने को तो बहुत पर, कैसे सहूँ वियोग।।

स्त्रोत प्रेरणा का मिला, वही सृजन का हार।
दिशा दिखाया आपने, बहुत बड़ा उपकार।।

मन-दर्पण को देखकर, होते भाव विभोर।
कुसुम हृदय की कामना, मीत संग हो भोर।।

©कुसुम ठाकुर

वह जन्मदिन है याद मुझको

"वह जन्मदिन है याद मुझको"


वह जन्मदिन है याद मुझको आज भी
खबर आयी माँ कहे सौगात भी

थी नहीं मुझको खबर पहले कभी
सूचना मुझको मिली थी बस तभी


मूंद कर  मैं नैन माँ की गोद में थी
सुन रही थी माँ बड़ों की बात भी

स्वच्छंदता में विघ्न का न भान था
और न कर्तव्य का कुछ ज्ञान भी

प्रेम माता, भाई-बहनों तक रहा
और से हो प्रेम न था ज्ञात भी

सोच में तब पड़ गयी  क्या हो मेरा
हर सखी पूछेगी तब जज़्बात भी


देखने आयी तो थी बारात ही
क्या पता मेंहदी रचेगी हाथ भी

देख गहने खुश हुई सब भूलकर
हाथ मेहँदी रच गई उस प्रात  भी

मैं न समझी प्रेम उनसे क्यों करूँ
प्रेम में थी किन्तु इक सौगात भी

 © कुसुम ठाकुर
          

बनें आधुनिक

"बनें आधुनिक"

बनें आधुनिक बोलें हर इक बात में
लेकिन मोल चुकाएँ उसके साथ में

 यूँ बातों में कहें लोग कुछ भला-बुरा 
 नहीं मगर यह दिल बदला आघात में

 क्या दिन थे जब बैठे हम बिन बात भी
 अब फुरसत है कहाँ किसे दिन रात में

 खोल कलम दिल के भावों को लिखते थे
 अब तो नकली प्रेम दिखे सौगात में

 प्रेम सरोवर में ये 'कुसुम' रहे खिलती
जगह न हो कटुता की उसकी बात में।

सपनो का भारत

सपनो का भारत

हो न अमन की कमी इस जहां में
मिलजुल सब रहें इस जहां में 

हर विस्थापितों को मिले आशियाना
रहे अनाथ ना कोई इस जहां में 

आतंक के आतंक का हो खात्मा
उन्हें भी प्यार मिले इस जहां में 

बागों में खिले हर इक कली
कहीं कुम्भला न जाए इस जहां में

अधिकार हर औरत को यूं मिले
हक के लिए न लड़ें इस जहां में

नेता हम चुने अपने विवेक से 
धर्म के नाम पर न बटें इस जहां में 

फर्क बेटे बेटियों का जब मिटे
इज्जत भी तब मिले इस जहां में 

फूलों में खुशबू हो तभी  
कुसुम न बने मौसमी इस जहां में

निज स्वार्थ से ऊपर रहे देश हित
यही सपनो का भारत इस जहां में 

© कुसुम ठाकुर 

मिथिला का लोक पर्व "सामा- चकेबा"


sama-chakeba
सामा-चकेबा एकमात्र मिथिला में मनाया जाने वाला लोक पर्व है. यह पर्व मिथिला की संस्कृति से जुड़े होने के साथ ही इसकी पौराणिक मान्यता भी है. बहनो द्वारा भाई के लिए मनाया जाने वाले इस त्यौहार का शुभारम्भ कार्तिक शुक्ल सप्तमी, छठ के पारण यानि सुबह के अर्घ के दिन होता है और पूर्णिमा को इसका समापन होता है . भाई बहनों के प्रेम के प्रतीक स्वरुप यह पर्व मनाया जाता है. कहते हैं पूर्णिमा के दिन सामा अपने ससुराल चली जाती है.


 पुराण के अनुसार कृष्ण की बेटी का नाम श्यामा (सामा) और बेटे का नाम साम्ब था, साम्ब को बचपन से ही अपनी बहन सामा से बहुत प्रेम था . सामा के पति का नाम चारुवक्त्र (चकेबा) था. चकेवा भी अपनी पत्नी सामा से बहुत प्रेम करते थे . सामा  को प्रकृति से बहुत स्नेह था . वह सुबह उठकर प्रकृति प्रेमवश वृन्दावन चली जाती और दिनभर पेड़, पौधे, पक्षियों और प्रकृति के बीच वन में विचरण करती,  वह दिन भर सातों ऋषियों (सत भैया ) के बीच खेलती कथा-पुराण सुन वापस आ जाती। कृष्ण के राज्य में चूड़क (चुगला) नामक एक मंत्री था उसने सामा के पिता से नमक मिर्च लगा सामा के बारे में चुगली कर दी  और सामा पर लांछन भी लगा दिया। सामा के पिता ने क्रोध में आकर सामा और सातों ऋषियों को पक्षी रूप का श्राप दे दिया . चकेबा अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे वे शिव जी की तपस्या करने लगे और प्रसन्न हो शिव ने वरदान मांगने को कहा तो पक्षी रूप का वरदान मांग लिया और पत्नी वियोग में वनों में भटकते रहते . साम्ब बाहर गए हुए थे बाहर से आने के बाद जब उन्हें इस बात का पता चला तो वह कृष्ण को मनाने की कोशिश करने लगे और न मानने पर तपस्या कर उन्हें मनाने में कामयाब हुए. सामा और सातों ऋषियों को श्राप मुक्त करवाया. कृष्ण ने साम्ब को वचन दिया कि हर साल कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सामा आएगी और पूर्णिमा के दिन वापस लौट जाएगी . इसप्रकार सामा चकेबा का मिलन कार्तिक मास में होता है .



इसी कथा के मान्यता के आधार पर बहने छठ के पारण के दिन मिटटी के सामा, चकेबा, चुगला, वृन्दावन, बाटो-बहिन, सतभैया, इत्यादि की मूर्ती बनाकर रोज शाम में खेत या मंदिर के पास जाकर खेलती हैं. प्रतिदिन प्रतीक स्वरुप मिटटी के बनाये गए वृन्दावन जिसमे खढ लगा होता है उसे थोड़ा थोड़ा रोज जलाई जाती है. चुगला जिसके मुंह में पाट(पटुआ) लगा होता है उसे भी आग लगाकर जलाई जाती है उसे मोटे मोटे काजल लगा हंसी का पात्र बनाया जाता है.



वृन्दावन में आग लगाते समय बहने गातीं हैं :
वृन्दावन में आग लागल कियो नहि मिझाबय हे
हमर भैया बड़का भैया दौड़ दौड़ मिझाबय हे



चुगला को जलाते समय बहने गातीं हैं :
चुगला करे चुगली बिलाड़ि करे म्याऊँ
आरे चुगला तोरे फांसी दूँ
चाउर चाउर चाउर
भैया कोठी चाउर
छाउर छाउर छाउर
चुगला कोठी छाउर



हंसी ख़ुशी हंसी मजाक के माहौल और वातावरण में मनाया जाने वाले इस पर्व में बहनें भाई की लंबी उम्र और धन धान्य से परिपूर्ण होने की कामना से युक्त
गाने गातीं हैं जिसमे सारे भाई बहनों के नाम होते हैं . 



भाई को आशीष देने के लिए बहने गाती हैं :
सामा हे चकेबा हे
जोतला खेत में अबिह हे
ढेला फोड़ि फोड़ि खइह हे
भाई के आशीष दीह हे
भरि घर बहिना सामा खेलाय सामा खेलाय
निरसुख बहिना घुरि घर जाय घुरि घर जाय



गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हे
तोहें बड़का भैया हे
भैया हाथो दस पोखरि खूना दिय चम्पा फूल लगा दिय हे
भैया लोढायेल भौजी हार गुथु हे आहे सेहो हार पहिरथु बड़की बहिना साम चकेबा खेल करू हे
गाम के अधिकारी ....................................
कथिये बझायब बन तितिर हे
आहे कठिये बझायब राजहंस चकेबा खेलब हे
चाले बझायब बन तितिर हे
आहे रभासि बझायब राजहंस चकेबा खेलब हे
गाम के अधिकारी तोहें .................................



देवउठावन (देवउठनी) एकादशी के दिन सामा के ससुराल जाने का दिन तय होता है उस दिन सारे मूर्तियों पर चावल के पिठार का छींटा दिया जाता है अर्थात सामा के जाने का दिन तय हो गया . उस दिन से सामा के ससुराल जाने की तैयारी शुरू होती है . मिट्टी के पौती बनाते हैं जिसमे चूड़ा, चावल, मिठाई ,कपडे दिए जाते हैं . उस दिन से सारे मूर्तियों को रंग बिरंगे रंगों से रंगे जाते हैं और पूर्णिमा के दिन सारे मूर्तियों को बांस की डाली में लेकर उसमे दिया जलाकर खेत में सारी बहने झुण्ड में जाती हैं पूर्णिमा के दिन भाई का साथ जाना जरूरी होता है.  वहां पहुंचकर रोज की तरह सारी मूर्तियों को जमीन पर रख उनमे से चुगला और वृन्दावन को जलाते हुए हंसी मजाक और चुगला को गाली दी जाती है. अंत में भाइयों को मिठाई और नए चूड़े दी जाती है . एक चिड़िया बाटो- बहिना को छोड़ भाई सारे मूर्तियों को अपने घुटने से तोड़ते हैं और उन्हें जुते हुए खेत में विसर्जन कर दी जाती है.



यह पर्व भाई बहनों के प्रेम और भाई के बहन के प्रति अटूट विश्वास का सन्देश देता है. 

साल नया फिर इक आया



 "साल नया फिर इक आया "


साल नया फिर इक आया
न कहता वह क्या-क्या लाया
आशा है भरपूर
कहीं यह भी न हो शूल



बंद पिटारे अब खुलने हैं
आस लगाए सब बैठे हैं
क्या होगा अब भी दूर
कहीं यह भी न हो शूल



देख जिसे सब खुश होते
सपने भी सब सच लगते
अब हो गए हमसे दूर
कहीं यह भी न हो शूल



सहें सभी सहमी सी बाजी
हूँ राजा क्या करेगा क़ाज़ी
चाहें, जनता न हो दूर
कहीं यह भी न हो शूल



अहंकार- न डरूं किसी से
दूजे का अपराध दिखा
क्या घटा कभी है कसूर
कहीं यह भी न हो शूल



सच की परिभाषा ही झूठी
घड़े फूटे जब झूठ औ सच की
कुसुम को है न कबूल
कहीं यह भी न हो शूल



नए वर्ष से आस जगाकर
भूल गए कुछ नया बताकर
कुर्सी ज्यों होगी दूर
कहीं यह भी न हो शूल



- कुसुम ठाकुर-

वामन वृक्ष



" वामन वृक्ष "

वामन वृक्ष करे पुकार ,
झेल रहा मनुज की मार ।
वरना मैं भी तो सक्षम ,
रहता वन मे स्वछंद ।

देख मनुज जब खुश होते ,
मेरी इस कद काठी को ।
कुढ़कर मैं रह जाता चुप ,
किस्मत मेरी है अभिशप्त ।

बेलों को तो मिले सहारा ,
पेडों को मिले नील गगन ।
पर हमारी किस्मत ऐसी ,
तारों से हमें रखें जकड़ ।

बढ़ना चाहें हम भी ऐसे ,
जैसे बेल और पेड़ बढ़ें ।
पर बदा किस्मत में मेरे ,
मिले हमें वामन का रूप ।

फल भी छोटा फूल भी छोटा ,
देख मनुज पर खुश होवें ।
पर हमारी अंतरात्मा की,
आह अगर वे देख सकें ।

चाहें हम भी रहना स्वछन्द ,
लगे हमें यह पिंजरे सा ।
हम भी तो प्रकृति की रचना ,
करे मनुज क्यों अत्याचार ।।

- कुसुम ठाकुर -

सावन आज बहुत तड़पाया

"सावन आज बहुत तड़पाया"

फिर बदरा ने याद दिलाया
पिया मिलन की आस जगाया

तड़पाती है विरह वेदना
सोये दिल की प्यास बढ़ाया

कट पाये क्या सफ़र अकेला
बस जीने की राह दिखाया

पतझड़ बीता और बसंत भी
सावन आज बहुत तड़पाया

आदत काँटों में जीने की
जहाँ कुसुम हरदम मुस्काया

-कुसुम ठाकुर- 

झलक दिखाने आ जाओ

'झलक दिखाने आ जाओ'

पलभर को कहीं गफलत ही सही, चेहरा तो दिखाने आ जाओ
तुम बुझे हुए नयनों के इन पलकों में समाने आ जाओ

प्रिय रुठे क्यों हो तुम अब तक बोलो कैसी है मजबूरी
ये  बेचैनी मैं कासे कहूँ एहसास जगाने आ जाओ

हो दूर मगर तुम जुदा नहीं आंसूं का साथ हुआ अपना
तन्हाई संग-संग रहती है पल भर को सताने आ जाओ

इस पार हैं हम उस पार हो तुम फिर मिलना कैसे हो संभव
सपनों में यकीं है मुझको तुम इक झलक दिखाने आ जाओ

दिन भर तो प्रतीक्षा कुसुम करे फिर शाम ढले वो मुरझाए
भंवरों की गुंजन यही कहे सपनों को सजाने आ जाओ

-कुसुम ठाकर-

वह रात मुझे डराती है

"वह रात मुझे डराती है "

वह रात मुझे डराती है 
जब याद तुम्हारी आती है 

दुःख की बातें याद नहीं
सुख सोच बहुत तडपाती है

व्याकुल हो जब भी ढूढूँ मैं
लगता मुझे चिढाती है

जीवन हो जीने की कला
यह सोच मुझे भरमाती है

साथी मुझसे छूटा जबसे
सपनो में सहलाती है

-कुसुम ठाकुर-

भारत को शिक्षित बनाओ

 
(पोलियो निवारण के बाद रोटरी का अगला कदम है 'साक्षरता मिशन' उसी पर कुछ पंक्तियाँ )
"भारत को शिक्षित बनाओ"

भारत को शिक्षित बनाओ हम सबका यह नारा है
जन-जन तक शिक्षा पहुँचाएं यह कर्तव्य हमारा है 

ठान लिया जब हमने बीड़ा कदम कभी न रुकने देंगे
हर व्यक्ति जब होगा शिक्षित तब स्वतंत्र कहलाएंगे

तीन वर्ष का समय मिला है जाया इसे न करना है
पथ प्रदर्शक साथ हमारे मिला देश हर कोना है

शून्य दिया है देश ने जग को होगा साक्षर हर व्यक्ति
 फिर कलाम की जन्म भूमि के जन-जन  को मिले शक्ति

  शिक्षा तो जन का अधिकार, जागरूक हम बनाएंगे
  पूरा होगा मिशन हमारा, अशिक्षा दूर भगाएंगे
-कुसुम ठाकुर-

हार मिली पर हार वही

"हार मिली पर हार वही"

है चाहत  हर बार वही
क्यों रहता ना प्यार वही

आती जाती यादों पर
हो अपना अधिकार वही

प्यार सदा सच  कहता है
हार मिली पर हार वही

प्यार कला है जीने की
तब जगमग संसार वही

समझ कुसुम नैनों की भाषा
प्रेम सहज हर बार वही

-कुसुम ठाकुर-

कन्यादान महादान क्यों ?

 कहते हैं कन्यादान महा दान अर्थात इससे बड़ा दान नहीं होता है. बेटियों को दान में क्यों दिया जाता है यह आजतक मेरी समझ से परे है. दान में तो वस्तु दी जाती है, तो क्या बेटियाँ वस्तु हैं ? कहते हैं जो वस्तु दान में दे दी जाती है  उस पर न कोई अधिकार होता है न ही उसके बारे में सोचना चाहिए. तो क्या बेटियों पर भी यही लागू होता है ? कन्यादान कब कैसे और क्यों हमारे विवाह पद्धति में जुड़ा यह अभी चर्चा का विषय नहीं है पर उसका दुष्परिणाम आज भी हमारे समाज में लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है. 

कहते हैं सीता जी की अग्नि परीक्षा, वनवास और लव कुश की कहानी अर्थात उत्तरकाण्ड राम चरित मानस का अंश नहीं है, इसे बाल्मीकि ने नहीं लिखा है, इसे बाद में विद्वानों ने जोड़ा है. हमारे धर्म ग्रंथों पर चर्चा करें तो यह विवाद का विषय हो जाएगा. पर हम उसी ग्रन्थ के आधार पर गर्व से कहते हैं मर्यादा पुरषोत्तम राम ने एक धोबन के कहने पर अपनी सीता जैसी पत्नी तक का त्याग कर दिया. यहाँ भी पुरुष की प्रधानता दर्शाता है. क्या यह पौरुषता का विषय है? एक गर्भवती पत्नी का त्याग करना क्या पौरूषता है ? यहाँ भी सीता को अबला नारी का दर्जा मिला . दिव्य शक्ति प्राप्त सीता अबला नारी बन गई. 

पहले हम कहते थे बेटियाँ घर की शोभा होती हैं, सच उसी घर की शोभा को दान में देकर हम खुश हो जाते है और उम्मीद करते हैं कि हमारे घर की शोभा अपने ससुराल जहां वह दान स्वरुप भेजी जा रही है उस घर की शोभा बनकर तो रहे ही, साथ ही उस घर की जिम्मेदारियों की भी अच्छी तरह पालन करे, उसे कितना भी कष्ट हो दोनों घरों की इज्जत पर आंच न आने दे, लड़कियों और लड़कों के लिए परिभाषा अलग अलग है.

आजकल लडकियां घर की शोभा तो नहीं कहलाती हाँ, लड़के लड़की में क्या फर्क है ? लोग यह जरूर कहते हैं. जब ही यह कहा जाता लड़के लड़की में क्या फर्क है मतलब स्पष्ट है फर्क तो है हम कोशिश कर रहे हैं फर्क कम करने की. आज भी बहुत कम लोग हैं जो शादी के बाद बेटी के बारे में भी उतना ही सोचते हैं जितना बेटे के बारे में सोचते हैं. आज भी बेटी शादी के बाद परायी हो जाती है. हा, सांत्वना और दिखावा के लिए यह जरूर कहते हैं बेटियाँ बेटों से ज्यादा माँ बाप के बारे में सोचती हैं. केवल बेटों के लिए धन उपार्जन और पैतृक संपत्ति का रिवाज अभी भी बरकरार है. 

कन्यादान जैसे महादान को हटा देना चाहिए , तब ही हम कह सकते है लडके लड़कियों में कोई फर्क नहीं, वर्ना सदियों से चली आ रही लडके लड़की में फर्क रहेगा ही. जबतक हम कन्या का दान करते रहेंगे उसके साथ अबला शब्द जोड़ा जाता रहेगा और माता पिता बेटा बेटी में भेद करते रहेगे. 

मानवता के मूल्य को समझें यही हमारी संस्कृति रही है

एक बार एक प्रसिद्ध फिल्म नेर्देशक से बातें हो रही थी और उन्होंने कहा था "एक दिन मैं बम्बई में एक फिल्म शूटिंग देख रहा था उस दिन मेरे मन में आया सिनेमा सबसे अच्छा माध्यम है लोगों तक अपने विचारों को पहुंचाने का."  उसके बाद ही हमने  पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने का निर्णय लिया और निर्देशन को चुना.

सच सिनेमा वह शसक्त माध्यम है जिसके जरिए निर्देशक अपनी बातें आम लोगों तक पहुंचा सकता है, समाज को नई दिशा दिखा सकता है. जिन छोटी छोटी बातों पर हम गौर नहीं करते उनका आईना हमें निर्देशक सिनेमा के माध्यम से दिखा सकता है. परन्तु आज हमारे यहाँ हर जगह राजनीति इतनी हावी हो गई है, लोगों की भावनाएं इतनी कलुषित हो गई हैं कि समाज सदा दो भागों में बंट जाती है, लोग आपस में उलझकर रह जाते है, विषय के मतलब ही बदल जाते हैं. जिस उद्देश्य से निर्देशक ने अपनी बात रखी वह तो बेमानी हो जाती है. सिनेमा मनोरंजन के लिए बनाई जाती है........देश के नेता उसे धर्म, देवी देवता पर आक्रमण कह चिंगारी भड़काने का काम करते हैं, उसे धर्म और कौम से जोड़ देते हैं. 

हम इक्कीसवीं सदी में में कहने को तो जी रहे हैं लेकिन आज भी हमारे विचारों में ईश्वर का खौफ विद्यमान है. जो जितना पाप करता है वह उतना ज्यादा पूजा पाठ धर्म का आडम्बर करता है. मैं नहीं कहती पूजा नहीं करनी चाहिए. पूजा करना या किसी विशेष धर्म का अनुयायी होने का मतलब यह नहीं होता कि हम दूसरों को भी उसके विचारों को मानने के लिए बाध्य करें और सहमत न होने पर उसे भला बुरा कहें, धर्म हमें दूसरों का आदर करना सिखाता है, हमें अनुशासित बनाता है न कि उद्दंड.

ईश्वर हैं या नहीं इसपर बात करूँ इतनी विदूषी मैं नहीं पर इतना जरूर कहूँगी कि आज के युग में, धर्म के ठेकेदार बाबा और संत हो ही नहीं सकते. संत की परिभाषा क्या होती है यह भी आज के बाबाओं और संतों को मालुम नहीं होगा. हाँ लोगों में आगे बढ़ने की जल्दबाजी और डर ने आज व्यावसायिक बाबाओं, संतों को जन्म दिया है जो धर्म के नाम पर लोगों को ठगते हैं और लोगों के मन में बसे डर और लालच उन्हें ठगने का मौका देती है. उन्हें धर्म की जानकारी हो या न हो इतना अवश्य मालूम है कि धर्म के नाम पर देश को बांटा जा सकता है.

पंडित, पुजारी,मौला, पादरी या बाबाओं को हम भगवान का प्रतिनिधि मानते हैं और हमारी इसी कमजोरी का फायदा आजके ये प्रतिनिधि उठाते हैं. एक प्रश्न मैं करना चाहूंगी अगर सच में ईश्वर हैं.....और अगर  हम इन प्रतिनिधियों का वहिष्कार कर खुद से अपने ईश्वर या ईष्ट की पूजा करें तो क्या हमारे ईश्वर हमारी नहीं सुनेंगे और यदि नहीं सुनेंगे तो फिर ईश्वर कैसे ?

हमारे यहाँ एक सिनेमा आज देश के प्रबुद्ध वर्ग से कहना चाहूंगी कि वे जागें और अपने विचारों पर किसी को हावी न होने दें. धर्म के आधार पर किसी को अपनी भावना पर अधिकार न करने दें . मानवता के मूल्य को समझें यही हमारी संस्कृति रही है उसे विलुप्त न होने दें.

चलने का बहाना ढूँढ लिया

"चलने का बहाना ढूँढ लिया"

चलने की हो ख्वाहिश साथ अगर 
चलने का बहाना ढूंढ लिया 

यूं रहते थे दिल के पास मगर 
तसरीह का बहाना ढूंढ लिया

मुड़कर भी जो देखूं मुमकिन नहीं
आरज़ू थी जो मुद्दत से ढूंढ लिया

तसव्वुर में बैठे थे शिद्दत सही 
खलिश को छुपाना ढूंढ लिया 

कहने को मुझे हर ख़ुशी है मिली 
हँसने का बहाना ढूंढ लिया 

- कुसुम ठाकुर -