कैसे बीते दिन



कैसे बीते दिन कैसी है रातें 
हम किस तरह से कहे मन की बातें 
कैसे  बीते दिन...................
कहे उनसे कोई है लंबी ये रातें 
करवटें बदल रही है थकती निगाहें 
कैसे बीते दिन....................
वो जन्मों की कसमे यादों में आये
रही मन में कसकें न वादे निभाए 
कैसे बीते दिन ...................
ढूंढें निगाहें अब भी वो चाहे
वो नज़रों का मिलना कैसे भुलाएं 
कैसे बीते दिन .....................
अंजुम निहारें है कोई क्या उनसा
मगर मिल न पाए जो उनसे हो मिलता 
कैसे बीते दिन ..........................

6 comments:

दिव्या अग्रवाल said...

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 08 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-09-2020) को   "दास्तान ए लेखनी "   (चर्चा अंक-3819) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
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anita _sudhir said...

वाह बहुत खूब

मन की वीणा said...

बहुत सुंदर सृजन।

Marmagya - know the inner self said...

आदरणीया कुसुम ठाकुर जी, नमस्ते! बहुत सुंदर रचना है। खासकर ये पंक्तियाँ:
ढूंढें निगाहें अब भी वो चाहे
वो नज़रों का मिलना कैसे भुलाएं। साधुवाद!
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सादर!--ब्रजेन्द्रनाथ

दिगम्बर नासवा said...

विरह के दिन मुश्किल ही बीतते हैं ...
भावपूर्ण रचना ...