बनें आधुनिक

बनें आधुनिक बोलें हर इक बात में
लेकिन मोल चुकाएँ उसके साथ में

 यूँ बातों में कहें लोग कुछ भला-बुरा 
 नहीं मगर यह दिल बदला आघात में

 क्या दिन थे जब बैठे हम बिन बात भी
 अब फुरसत है कहाँ किसे दिन रात में

 खोल कलम दिल के भावों को लिखते थे
 अब तो नकली प्रेम दिखे सौगात में

 प्रेम सरोवर में ये 'कुसुम' रहे खिलती
जगह न हो कटुता की उसकी बात में।

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-08-2019) को "गीत बन जाऊँगा" (चर्चा अंक- 3441) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Meena Bhardwaj said...

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में " मंगलवार 27अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति.. ...बधाई

Rakesh Kaushik said...

प्रशंसनीय