अपना सा आभास तो लगता

"अपना सा आभास तो लगता"

समझूं कैसे क्या है रिश्ता,
बिन देखे क्यूँ स्नेह पनपता।

है क्या उलझन समझ न पाऊँ,
होंठ हिले, न शब्द निकलता।

राह तकूँ मैं प्रतिपल जिसकी,
उस तक न सन्देश पहुँचता।

वह न समझे कैसे कह दूँ,
अपना सा आभास तो लगता।

यही  कुसुम जीवन की उलझन
ह्रदय प्रेम की यही विकलता

- कुसुम ठाकुर - 


8 comments:

मनोज कुमार said...

है क्या उलझन समझ न पाऊँ,
होंठ हिले, न शब्द निकलता।
भावुक कर देने वाली अभिव्यक्ति।

Priyankaabhilaashi said...

अच्छी पंक्तियाँ..!!

नीरज गोस्वामी said...

है क्या उलझन समझ न पाऊँ,
होंठ हिले, न शब्द निकलता।

वाह...लाजवाब रचना...बधाई...

नीरज

वाणी गीत said...

वह ना समझे कैसे कह दूं
अपना सा आभास तो लगता ...
डैफोडिल की पत्तियां तोड़ने का दृश्य साकार हो उठा है !

Mahesh Rajput said...

Lehro Ko Pyar Hua Kinaro Se,
Par Uski Shadi Hogai Sagar Se,
Aaj Bhi Kinaro Ki Preet Lehro Ko Khich Lati He,
Lekin Badnaam Na Ho MOHABAT Isliye Laut Jati He......

girish pankaj said...

ISS BAAR AAPKI KAVITAA NE DIL KO AUR GAHARAI TAK CHHOO LIYAA . CHHUND BHI KASAA HUAA HAI. BADHAI.

मोहम्मद कमरूद्दीन शेख //MD. QAMARUDDIN SHEIKH said...

आपकी रचना की तारीफ में एस यही कहना चाहूंगा कि -
उलझन में उलझाता है वो
पहचान नहीं बतलाता है वो
ढूंढ सके जो उसकी कुदरत
झलक मगर दिखलाता है वो

IRA Pandey Dubey said...

राह तकूँ मैं प्रतिपल जिसकी,
उस तक न सन्देश पहुँचता।बहुत अच्छी पक्तिय है .