संस्मरण(चतुर्थ कड़ी )

टाटा स्टील के पदाधिकारी एवं कर्मचारियों मे सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाने के लिए टाटा स्टील प्रतिवर्ष एक अन्तर विभागीय नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करती थी। अपने अपने विभाग के पदाधिकारी और कर्मचारी इसमें भाग लेते थे परन्तु इस पर बहुत ही कम खर्च किया जाता था और यह बिल्कुल ही नीरस होता था जो मात्र संदेश के लिए होता था । इस नाटक में मात्र अपने विभागीय पदाधिकारी और कुछ दूसरे विभाग के लोग होते थे। टाटा स्टील में पद भर संभालने के कुछ ही महीने बाद श्री ठाकुर ने अपने विभाग के सुरक्षा नाटक में भाग लिया और उस नाटक के संवाद को कुछ अपने तरीके से फेर बदल कर उस नाटक में श्रेष्ठ कलाकार का पुरस्कार प्राप्त किया।


दूसरे वर्ष जब श्री ठाकुर को नाटक के लिए बोला गया तो उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया वे नाटक रविन्द्र भवन , जो कि जमशेदपुर का सबसे अच्छा प्रेक्षागृह था, में ही मंचित करेंगे। उस वर्ष नाटक रविन्द्र भवन में ही हुआ और उस नीरस विषय पर मंचित नाटक की प्रशंसा श्री ठाकुर जी को मिली साथ ही यहीं से उनके नाट्य यात्रा की शुरुआत भी हुई।


सुरक्षा नाटक की सफलता के बाद सदा श्री ठाकुर जी के मन में रहता था कि हिन्दी एवं अपनी मात्रृ भाषा मैथिली की सेवा अपने कलम से करें साथ ही उन्हें लगा कि अपने विचारों को आम जनता तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम भी यही है।यह उस समय की बात है जिस समय मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल आन्दोलन चल रहा था और निर्णय लिया गया था कि प्रत्येक शहर और गाँव से पोस्टकार्ड पर मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल करने का अनुरोध लिखकर प्रधानमन्त्री तक पहुंचाई जाय। जमशेदपुर से भी पोस्टकार्ड भेजने का निर्णय लिया गया और साथ ही एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन का भी निर्णय लिया गया जिसका भार श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दी गयी। समय कम था पर उन्होंने कुछ अलग सा कार्यक्रम करने की सोची।


उन्होंने एक संगीत संध्या करने की सोची और उस कार्यक्रम का नाम "संकल्प दिवस" दिया। पूरे कार्यक्रम के लिए मैथिली में गीत स्वयं लिख सारे गीतोंके धुन भी दी तथा मुख्य गायक भी स्वयं ही थे। उस कार्यक्रम के उद्घाटन गीत का नाम " संकल्प गीत" रखा। यह कार्यक्रम अत्यन्त ही सफल रहा ओर श्री ठाकुर जी के कला का परिचय जमशेदपुर के कलाकार और दर्शकों से हुआ।


"संकल्प दिवस" कार्यक्रम की सफलता ने श्री ठाकुर जी को नाटक मंचित करने को प्रेरित किया। उसी समय जमशेदपुर की मिथिला सांस्कृतिक परिषद् ने अपने महिला शाखा की स्थापना की थी और महिला शाखा की सदस्यों ने श्री ठाकुर जी से एक कार्यक्रम करने का अनुरोध किया जिसे उनहोंने स्वीकार भी कर ली और तय हुआ कि नाटक का मंचन होगा। श्री ठाकुर का पहला नाटक "बड़का साहब" उसी की देन है। उस नाटक की रचना के समय की एक एक बातें अब भी मुझे याद हैं।उन्होंने इतने सरल और सामान्य भाव से नाटक लिखा कि मालुम ही नहीं हुआ कि नाटक लिखना भी किसी के लिए कठिन काम हो सकता है। उसके एक एक संवाद मुझे कई कई बार सुनना पडा था। पूर्वाभ्यास से पहले ही मुझे नाटक के सारे संवाद याद हो गए


बड़का साहब का पूर्वाभ्यास महिला शाखा की एक सदस्य के घर पर ही होता थाकलाकार के चुनाव में ही अंदाजा हो गया कि जितने भी इच्छुक कलाकार थे सभी नए थेकलाकार के आभाव में मुख्य भूमिका श्री ठाकुर को स्वयं ही करना पड़ा हम चारों प्रतिदिन पूर्वाभ्यास में जाते थेविक्की को तो उस नाटक में बाल कलाकार की भूमिका निभानी थी मुझे नाटक सम्बंधित अनेको कार्य बता दिया था और उन सब के लिए प्रतिदिन नाटक का पूर्वाभ्यास देखना जरूरी था न जाने क्यों, शायद महिला शाखा की सदस्यों को इनके कार्य करने का ठंग पसंद नहीं था या उन्हें यह विशवास नहीं था कि नाटक अच्छा होगा, पर वे प्रतिदिन पूर्वाभ्यास के दौरान कुछ न कुछ नाटक किया करती थीं कुछ को तो होता था कि उन्हें नाटक का अधिक ज्ञान था पर असलियत यही होता है कि हर निर्देशक की अपनी सोच होती है और वह उसी के अनुसार निर्देशन करता है एक तो कलाकार अच्छे नहीं थे दूसरा बिल्कुल नए, व्यवस्थापक ऐसे कि हर बात में टांग अड़ाने की तो जैसे उन्होंने ठान ली थी हर दिन श्री ठाकुर जी उन व्यवस्थापक को समझाते कि वे निश्चिंत रहें नाटक अच्छा होगा ही पर वे नहीं समझतीं पूर्वाभ्यास के बाद प्रतिदिन मैं और बालमुकुन्द जी श्री ठाकुर जी को समझाती एक तो अच्छे कलाकार का अभाव दूसरा व्यवस्थापकों का हस्तक्षेप उसी नाटक में श्री ठाकुर जी ने सोच लिया कि दूसरों या दूसरी संस्था के लिए नाटक नहीं करेंगे, वह भी महिलाओं के लिए तो बिल्कुल ही नहीं


नाटक मंचन की तारीख से तीन चार दिन पहले श्री मति इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी और प्रशासन की ओर से सारे कार्यक्रम रद्द करने का आदेश आ गया
नाटक के मंचन की दूसरी तारीख तय करने में देरी नहीं की गयी और सभी समाचार पत्रों में भी दे दी गई पर नाटक मंचन की पूर्व तारीख के दिन कुछ लोगों और कलाकारों को साथ लेकर खुद भी रविन्द्र भवन के सामने खड़े हो गए जिससे आम लोगों को तकलीफ न हो


२० नवम्बर को जमशेदपुर में बड़का साहब नाटक का सफल मंचन हुआ जिसे देख जमशेदपुर वासी अचम्भित रह गए
पहली बार किसी मैथिली नाटक का मंचन टिकट पर हुआ था "बड़का साहब" नाटक की सफलता और अनुभव ने श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दूसरा नाटक लिखने और मंचित करने पर बाध्य कर दिया

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

Kusum Thakur said...

धन्यवाद और आपको भी रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएं.

Dr. Dhanakar Thakur said...

Jamshedpurme ekhnahu seho lok Maithili bahait aa likhit chhthi.

वन्दना said...

aapki zindagi ki kitaab ke kuch panne padhe jo aapke jeevan ke anek pahluon ko ujagar kar rahe hain..........ye yaadein hi jeene ka sahara hoti hain.