मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा

(आज मेरे लिए एक विशेष दिन है . मन में कुछ बातें आईं, सोची शब्दों में पिरो दूँ. )

"मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा "

हो तो दूर मगर लगे पास यदा 
हर ख़ुशी जो मिले यह आशीष सदा 

है कचोट कहूँ जो मैं हूँ न वहाँ 
है वो बात कहाँ जो कहूँ मैं यदा  

धरूँ धीर सदा फिर न पीर कमा  
लगे कुछ न सही यही रीत बदा

तप ज्यों मैं करूँ रहे क्यों न भला 
यही मन में मेरे है जो बात सदा 

कहूँ कुछ न भला लगे राज बला 
मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा 

- कुसुम ठाकुर -  

शिव भजन


"शिव भजन "

शिव शंकर कहूँ याद करते हैं हम 
पूजा कैसे करूँ यह नहीं है पता ।

तुमको कहते हैं औघर दानी सभी,
इस अधम को तो यह भी नहीं है पता ।
शिव शंकर ............................ ।

फूल अक्षत औ चन्दन धरा थाल में ,
ध्यान कैसे धरूँ यह नहीं है पता ।
शिव शंकर ............................... ।

तुम तो बसते हो भक्तों के दिल में सही 
भक्ति का सुर मुझे भी नहीं है पता ।
शिव शंकर ............................ ।

आई शरणों में तेरे क्या अर्पण करूँ ,
सब तो तेरा दिया है यही है पता ।।
शिव शंकर ............................ ।

- कुसुम ठाकुर -

मुझे आज मेरा वतन याद आया

"मुझे आज मेरा वतन याद आया"

मुझे आज मेरा वतन याद आया ।
ख्यालों में वह तो सदा से रहा है ,
मजबूरियों ने जकड़ यूँ रखा कि ।
मुड़कर भी देखूँ तो गिर न पडूँ मैं ,
यही डर मुझे सदा काट खाए ।
मुझे आज ......................... ।


छोड़ी तो थी मैं चकाचौंध को देख ,
निकल न सकूँ यह मजबूरी अब तो ।
करुँ क्या मैं अब तो मझधार में हूँ ,
इधर भी है खाई उधर मौत का डर ।
मुझे आज ............................... ।


बचाई तो थी टहनियों के लिए मैं ,
मगर जोड़ना कफ़न के लिए भी ।
गज भर जमीं बस मिले वहीँ पर ,
पर वह मुमकिन अब तो नहीं है ।
मुझे आज ...........................।


साँसों में भी तो सदा से रहा है ,
मगर बंद आँखें, हों उस जमीं पर।
इतनी कृपा तू करना ऐ भगवन ,
देना जनम फ़िर मुझे उस जमीं पर ।
मुझे आज ............................।

- कुसुम ठाकुर -

माँ

 Happy Mother's Day 
माँ तुम सदा ऐसे ही मुस्कुराती रहो 

आज के दिन सभी माओं और मातृत्व को मेरी शुभकामनाएँ !!
यों तो माँ को  कभी याद करने के लिए औपचारिकता की जरूरत नहीं होती । माँ के एहसास को तो हर पल महसूस किया जा सकता है चाहे वह कितनी दूर ही क्यों न हो । 

अबला

इस बीच अस्वस्थता काम की व्यस्तता और मानसिक तनाव की वजह से काफी कम लिख  पाई हूँ  हाँ, समाचार से दूरी नहीं बना पाई। अपने स्वभाव वश मैं छोटी सी छोटी बातों को गहराई से सोचती हूँ और कई बार ऐसा होता है कि मैं उसमे उलझकर रह जाती हूँ  क्यों कि बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिसमे सब की राय मुझसे बिल्कुल ही अलग होता है। मैं तर्क ज्यादा नहीं कर सकती इसलिए चुप रहकर मूक दर्शक बन जाती हूँ, परन्तु मेरा मन बिचलित रहता है हाँ अनुशासन हीनता और अन्याय मैं कदापि बर्दाश्त नहीं कर सकती उस समय मैं बिल्कुल चुप नहीं रहती, चाहे वह कोई हो और किसी के साथ हो रहा हो।   


बचपन में समानार्थक शब्द जब भी पढ़ती थी बस "नारी" पर आकर अटक जाती थी। मेरे मन में एक प्रश्न बराबर उठता -"इतने शब्द हैं नारी के फिर अबला क्यों कहते हैं"? अबला से मुझे निरीह प्राणी का एहसास होता। सोचती, जो त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाती है वह अबला कैसे हो सकती ? एक तरफ हमारे पुरानों में नारी शक्ति का जिक्र है दूसरी तरफ हमारे व्याकरण में उसी नारी के लिए अबला शब्द का प्रयोग क्यों ? पर मुझे उत्तर मिल नहीं मिल पाता । मैं अबला शब्द का प्रयोग कभी नहीं करती बल्कि अपनी सहपाठियों को भी उसके बदले कोई और शब्द लिखने का सुझाव देती ।


जब बच्चों को पढ़ाने लगी उस समय भी बच्चों को नारी के समानार्थक  शब्द में "अबला" शब्द लिखने पढ़ने नहीं देती और बड़े ही प्यार और चालाकी से नारी के दूसरे दूसरे शब्द लिखवा देती । मालूम नहीं क्यों अबला शब्द मुझे गाली सा लगता था और अब भी लगता है।  


आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ । इन सबके बावजूद उसके स्वाभाविक रूप में कोई बदलाव नहीं आया है । पर आज की नारी कुंठा ग्रसित हैं, जो उन्हें ऊपर उठाने में बाधक हो सकता है । हमारे साथ कल क्या हुआ उस विषय में सोचने के बदले यदि हम अपने आज के बारे में सोचें तो हमारा आत्म विश्वास और अधिक बढेगा । बीता हुआ कल तो हमें कमजोर बनाता है , हमारे मन में आक्रोश ,कुंठा , बदले की भावना को जन्म देता है । फिर क्यों हम अपने अच्छे बुरे की तुलना कल से करें और बात बात में नीचा दिखाने की कोशिश करें। जरूरी नहीं कि उंगली उठाने से ही गल्ती का एहसास हो । हमरा ह्रदय हमारे हर अच्छे बुरे की गवाही देता है , धैर्य भी नारी का एक रूप है। 


आज एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है । यहाँ भी अबला का एहसास होता है । क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे? 

नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी  यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी अबला शब्द व्याकरण से नहीं निकल पाया है और तब तक नहीं निकल पायेगा जबतक हम नीचा दिखाने की कोशिश करते रहेंगे ,आरक्षण की मांग करते रहेंगे । हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की और तब "नारी" शब्द का पर्यायवाची "अबला" हमारे व्याकरण से निकल पायेगा । 



संस्मरण (तीसरी कड़ी)


बाबुजी की बदली "भूटान " से "गया" हो गई और हम "गया" आ गए । हमारे आते ही बाबुजी हम दोनों भाई बहनों को स्कूल में दाखिला के लिए तैयारी करवाने लगे। बाबुजी को हम दोनों के पीछे काफी मेहनत करनी पड़ी और तब जाकर नाज़रथ अकादमी (स्कूल ) में हमारा दाखिला हो पाया । दाखिला के लिए हम दोनों भाई बहन बाबूजी के साथ स्कूल पहुँचे । स्कूल का बड़ा सा गेट देखकर मैं तो दंग रह गई । गेट के अन्दर पहुंचाते ही ख़ुशी और उत्सुकता मिश्रित मुस्कान दोनों के चहरे पर अनायास ही छलक गए। कहाँ गाँव का वह छोटा सा स्कूल जिसमे गिने हुए कमरे मात्र और एक छोटा सा खेलने की जगह और कहाँ यह, जहाँ खेलने के लिए हर तरह के झूले वगैरह , बड़ा सा खेलने का मैदान , टिफिन खाने के लिए अलग से बड़ा सा हौल जहाँ टेबल और बेंच लगे हुए थे, और फैली हुई चार मंजिला इमारत। ऑफिस में दाखिल हुई तो सिस्टर को देख और भी आश्चर्य हुआ। सिस्टर हम दोनों से इंटरव्यू में बहुत सारे प्रश्न पूछीं और कुछ लिखने के लिए भी। इंटरव्यू  के बाद उन्होंने बाबुजी से कहा दोनों पहली कक्षा के लायक ही हैं।


 इंटरव्यू  में बौआ ने तो सारे प्रश्नों के जवाब दे दिए, पर मैं आते हुए प्रश्नों का जवाब भी नहीं दे पाई । हमारा दाखिला पहली कक्षा में हो गया । हमें सिस्टर ने कहा स्कूल के कपड़े स्कूल का दर्जी ही सिलता है, अतः नाप देना पड़ेगा। दर्जी ने हमारा नाप ले लिया और हम घर आ गए । 


घर पहुँचने के साथ ही बौआ ने माँ को सारी बातें बता दिया साथ ही यह भी कि " दीदी ने जवाब नहीं दिया इसलिए हम दोनों का नाम एक ही कक्षा में लिखाया है " । माँ को स्कूल की तैयारी करते देख हम खुश होते ।


 आज तो स्कूल जाने के लिए कई साधन हैं , पर उस जमाने में  रिक्शा ही स्कूल आने जाने का साधन होता था , या फिर जिनके पास गाडी थी वे गाड़ी से स्कूल जाते थे। हम भी रिक्शा से प्रतिदिन स्कूल आना जाना करते थे। 


बौआ स्वभाव से चंचल था , और छुट्टी के समय प्रतिदिन रिक्शा वाले से आगे के लोहे वाले रौड पर बैठने कि जिद्द करता पर रिक्शा वाला मना कर देता । इसी तरह से करीब छः महीने स्कूल जाते हुए हो गया एक दिन रिक्शा वाला भी तंग आकर उसे घर से कुछ ही दूर पहले सामने बैठा लिय़ा । उस समय उसकी ख़ुशी देखने लायक थी । ऐसा प्रतीत होता था मानो उसने जंग जीत ली हो । मुझसे और रिक्शा वाले से हँस हँसकर बातें करते हुए वह फूले नहीं समा रहा था । अचानक वह चुप हो गया और उसी समय तीन चार लोग सामने से दौड़कर आते हुए दिखे जो रिक्शावाले को रुकने का इशारा कर रहे थे । रिक्शावाला उनकी इशारों पर बिना ध्यान दिए लगातार आगे कि और बढ़ रहा था , पर उसे रिक्शा चलने में दिक्कत महसूस हो रही थी । अचानक एक व्यक्ति "अरे बच्चे का पैर रिक्शा में फंसा हुआ है " कहते हुए रिक्शा को पकड़कर रोक दिया और उसे काफी डांट लगाईं , साथ ही वहाँ भीड़ जमा हो गई । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रही थी । पर लोगों ने रिक्शा वाले से घर का पता पूछा और बौआ को गोद में लेकर दौड़ते हुए घर पहुँच गए । रिक्शा वाला मुझे लिए हुए घर पहुँचा । बौआ  को देखकर मुझे भी रुलाई छूट गई । उसके दाहिने पैर का करीब करीब पूरा चमड़ा निकल चुका था और खून से लथ पथ । 
मुझे ठीक से याद तो नहीं है कैसे, पर बौआ को अस्पताल ले जाना पड़ा । करीब एक डेढ़ महीने वह स्कूल नहीं जा सका ।  डॉक्टर ने उसे स्कूल जाने की अनुमति दे भी दी तब भी चलने में उसे काफी तकलीफ होती। 


हमारे स्कूल में स्पेशल पहली कक्षा थी , उसमे जो भी बच्चे रहते उन्हें तरक्की मिलती थी और सीधा तीसरी कक्षा में पहुँच जाते, उन्हें दूसरी कक्षा नहीं पढ़ना पड़ता । बौआ स्कूल जाने लगा उसके कुछ ही दिनों बाद मुझे तरक्की मिल गई , मैं स्पेशल पहली कक्षा में चली गई और बौआ उसी कक्षा में रह गया । अगर वह दुर्घटना नहीं हुई होती तो शायद वह भी मेरे साथ स्पेशल पहली कक्षा में चला जाता।


क्रमशः ...............