दुःख के दिन भी कट जायेंगे
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Kusum Thakur
on Saturday, July 9, 2011
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आस है ऋतुराज से
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Kusum Thakur
on Tuesday, July 5, 2011
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"आस है ऋतुराज से"
आज रूठूँ किस तरह जब पूछने वाला नहीं
दिल के कोने में छिपा गम ढूँढने वाला नहीं
ढूँढती है ये निगाहें हर तरफ मुमकिन अगर
कैसे कम हो दर्द दिल का बाँटने वाला नहीं
रुख हवा का मोड़ दूँ है दिल में हलचल इस तरह
अनुभूतियाँ स्पर्श की पर चाहने वाला नहीं
तान छेड़ूँ सप्त सुर में रागनी ऐसी कहाँ
संगीत की गहराईयों में डूबने वाला नहीं
आस है ऋतुराज से नव कोपलें हों फिर कुसुम
पत्तियाँ फिर से न सूखे सींचने वाला नहीं
- कुसुम ठाकुर-
कर में हरसिंगार
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Kusum Thakur
on Monday, June 27, 2011
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"कर में हरसिंगार"
श्वेत केसरिया कोमल सुन्दर
हो तुम सौम्य प्रतीक
नम्र भाव को देख कर
भक्त हुए नत शीश
भक्त हुए नत शीश
तुमसे महके चारों दिशाएँ
हो भक्तों के भक्त
कष्ट भी उनके सोचते
गिरो भूमि यह रीति
देख तुम्हारी नम्रता
हुए भक्त विभोर
भूमि दोष देखे नहीं
देव चढ़ावें शीश
कद में छोटे हो मगर
सौरभ मन को भाए
सूचना आगमन का
फल होगा सुखदाय
तन्मय होकर चुन रही
चेहरे पर मुस्कान
शिव की करूँ आराधना
कर में हरसिंगार
-कुसुम ठाकुर-
मौन तराना सीख लिया
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on Sunday, June 26, 2011
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"मौन तराना सीख लिया"
तिमिर से रिश्ता है मेरा तो उसमे जीना सीख लिया
छूटे रिश्ते, तन्हाई के जहर को पीना सीख लिया
यादें आतीं वो बसंत जो बरसों पहले छूटा
दूर भले पर यादों में अब पास बुलाना सीख लिया
मिलते हैं कुछ लोग मुझे वे भीड़ में तन्हा जीते हैं
मीत बनाकर तन्हाई को हाथ मिलाना सीख लिय़ा
थिरक रही अब उन यादों में झूले मन सावन के
फ़िक्र करूँ क्या इस दुनिया की मौन तराना सीख लिया
जब हुई जुदाई बगिया से कुछ कुसुम गए देवालय तक
कुछ को सुन्दर सी परियों ने जूड़े में सजाना सीख लिया
- कुसुम ठाकुर-
तुम हो वही पलाश
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on Tuesday, June 21, 2011
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"तुम हो वही पलाश"
सौंदर्य के प्रतीक
तुम हो गए विलुप्त
देख तुम्हें मन खुश हो जाता
भूले बिसरे आस
तुम हो वही पलाश
वह होली
न भूली अबतक
पिया प्रेम ने रंग दी जिसमे
दमक उठा मेरा अंग रंग
तुम हो वही पलाश
खेतों के मेड़ पर
खाली परती जमीन पर
न लगता अब वह बाग़
खाली परती जमीन पर
न लगता अब वह बाग़
अब कैसे चुनूँ हुलास
तुम हो वही पलाश
वह बसंत
क्या फिर आया
क्या फिर आया
पर खुशबू ही भरमाया
न भूली कभी बहार
तुम हो वही पलाश
-कुसुम ठाकुर-
दर्द की सौगात दूँ मैं
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Kusum Thakur
on Wednesday, June 15, 2011
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"दर्द की सौगात दूँ मैं"
है इबादत इश्क तो संगीत से पूजा करूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं
तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं
भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं
कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं
प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं
तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं
भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं
कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं
प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं
-कुसुम ठाकुर-
इबादत - ईश्वर की उपासना, पूजा
मुकम्मल - पूर्ण, पूरा
तिश्नगी - प्यास, पिपासा
संजीदगी - गंभीरता
रास्ते मुश्किल पड़ी है
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Kusum Thakur
on Saturday, June 11, 2011
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"रास्ते मुश्किल पड़ी है"
याद आए जो घडी अब, वो घडी मुश्किल बड़ी है
देख जिसको मुस्कुराऊँ, क्या कोई मुमकिन कड़ी है
हो के विह्वल कह दूँ सारी, बातें दिल की सोचती
बेड़ियाँ भी कम नहीं है, रास्ते मुश्किल पड़ी है
नैन समझे सब इशारे, दर्द सहकर कह न पाए
हो किनारे कह सकूँ पर, वो बहुत नाजुक घड़ी है
तोड़ के बंधन सभी गर, कह सकूँ जज्बात दिल के
क्यूँ लगे आघात दिल को, आंसुओं की ये लड़ी है
है कुसुम की कामना, हर स्वप्न ही तुमसे सजेंगे
मुस्कुराऊँ याद में फिर, भाव की ऐसी लड़ी है
-कुसुम ठाकुर-
नैन बहुत कुछ कह जाते हैं
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Kusum Thakur
on Saturday, June 4, 2011
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मगर समर्पण मूल प्रेम का, यह भी तो इकरार करो
प्रेम की सीमा उम्र नहीं है जानो, मत अनजान बनो
भले ह्रदय में द्वन्द के कारण, चाहो तो इज़हार करो
बनो नहीं नादान कभी तुम, समझो सभी इशारों को
और समेटो हर पल खुशियाँ, कभी नहीं तकरार करो
चार दिनों का यह जीवन है,प्रेम फुहारें हों सुरभित
कहीं वेदना अगर विरह की, उस पल को भी प्यार करो
काँटों में रहकर जीने की, कला कुसुम ने सीख लिया
देर हुई है मत कहना फिर, आकर के स्वीकार करो
-कुसुम ठाकुर-
नहीं समझे?
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Kusum Thakur
on Friday, May 27, 2011
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"नहीं समझे"
दुखी करना नहीं जानूँ, मगर दुःख तुम नहीं समझे
उलझना क्यों है शब्दों में, अभी तक तुम नहीं समझे
मेरी उलझन मेरी बातें, न खुद समझी यही गम है
मैं चाहूँ पर मेरी चाहत, अभी तक तुम नहीं समझे
इशारे भी चिढाते हैं, करूँ फिर व्यक्त मैं कैसे
है जीना मूक बनकर क्यों, न सोचा जो वही समझे
है कहने को बहुत कुछ पर, यहाँ बंदिश नहीं कम है
हिलोरें दिल की समझूँ पर, थपेड़ों को नहीं समझे
निगाहें तुम न फेरोगे, सदा विश्वास है मुझको
अहम तेरी सदा खुशियाँ, ये उलझन भी नहीं समझे
जुदाई हो तो रूठे रब, कठिन होता बहुत सहना
मिलन में सुख तो होता है, तड़प को क्यों नही समझे
दिशा का ज्ञान मिलते ही, रहूँ संज्ञान मैं हरदम
इशारों से कहूँ कैसे कुसुम को भी नहीं समझे
-कुसुम ठाकुर-
हमारे देश की जनता कब जागेगी !
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Kusum Thakur
on Tuesday, May 24, 2011
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जमशेदपुर भी अब बाकी शहरों की तरह असुरक्षित हो गया है. आये दिन हत्या, अपहरण की वारदातें सुनने को मिलती है. कभी डॉक्टरों की हत्या तो कभी बैंक अधिकारी का अपहरण.
अभी हाल में ही एक बैंक के अधिकारी का अपहरण हो गया, जिसे अपहरणकर्ता ने बाद में फिरौती की रकम वसूल कर छोड़ दिया.
बैंक अधिकारी घर जाने के लिए निकले ही थे कि किसी ने गाड़ी रोक जबरदस्ती गाड़ी में सवार हो गया और उन्हें जंगल की और ले गया. जंगल में ले जाने के बाद अपहरणकर्ता ने ५० हज़ार रकम की मांग रखी और कहा उसी समय मंगवाकर दे. पत्नी से फ़ोन द्वारा पैसे मंगवाने की जिद्द की तो अधिकारी को उस सुनसान जंगल में कुछ नहीं सूझा और उसने पत्नी को फ़ोन कर दी कि उसे ५० हज़ार की अभी तुरंत जरूरत है किसी से मांगकर भेजे. पत्नी के पूछने पर कि पैसा कौन ले जायेगा .....अपहरण कर्ताओं ने उस अधिकारी से कह्वाया उसके बैंक का एक आदमी जाकर ले आयेगा. पर पत्नी से ५० हज़ार का इंतजाम नहीं हो पाया. अब उस अधिकारी को अपहरणकर्ता ने जबरदस्ती अपने दोस्तों और परिचितों को फ़ोन द्वारा रुपैये मंगवाने की धमकी दी.
अधिकारी क्या करता उन्होंने बारी बारी अपने दोस्तों और सहकर्मियों को फ़ोन से पैसे का इंतजाम करने कहता. अंत में एक सहकर्मी ने इंतज़ाम किया और उसे उनके खाते में डाल दिया. जिसकी पुष्टि हो गयी तो अपहरणकर्ता अधिकारी को ले गया और ATM से रुपैये निकलवाकर ले लेने के पश्चात अधिकारी को घर जाने की अनुमति दे दी. कुछ दिनों बाद फिर उसका फ़ोन आया और ५० हज़ार की मांग फिर उस अपहरणकर्ता ने रखी और साथ में धमकी भी कि अगर पुलिस को बताया तो बीवी बचे को उठवा लेगा. कोई चारा नहीं देख उस अधिकारी ने फिर ५० हज़ार उसे दे दिया, पर इस बार अपहरण कर्ता को अपने इलाके में ही बुलाकर पैसे दी. साथ ही पैसे देने के बाद पुलिस में खबर कर दी और एफआईआर भी दर्ज करवा दिया.
दरअसल अपहरणकर्ता को बैंक अधिकारी पहचानता है. वह कभी बैंक से क़र्ज़ लेने के सिलसिले में अधिकारी के पास आया था. क़र्ज़ के नियमो के अनुसार उसे क़र्ज़ नहीं मिल पाया था. इस वारदात के बाद अधिकारी ने पुलिस को सारी बातें बता दी थी और पुलिस ने आश्वासन भी दिया था कि अपराधी अवश्य पकड़ा जायेगा. परन्तु एक महीने से ऊपर हो गया है अबतक अपराधी नहीं पकड़ाया है. पुलिस अधिकारी आश्वासन तो देते हैं.... पर अपहरणकर्ता अब फिर से पैसे कि मांग कर रहा है. पुलिस कहती है वह अपराधी फरार है...पुलिस उसे ढूंढ रही है.
दहशत में पूरा परिवार है... अब उनके पास विकल्प क्या है ? क्या हमारी निकम्मी पुलिस सक्षम नहीं है कि अपराधी को ढूढ़ निकाले या यहाँ भी अपराधी ने पैसे से मुंह बंद कर दिया है? कुछ वर्ष पहले जिस शहर की शांति से प्रभावित होकर कई लोग यहीं बस जाते थे आज वही शहर बिलकुल असुरक्षित होता जा रहा है.
एक तरफ अतिक्रमण को हटाया जा रहा है दूसरी तरफ नेताओं के इशारे पर उनके आदमी अतिक्रमण कर रहे हैं. हमारे देश की जनता कब जागेगी ?
उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं
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Kusum Thakur
on Thursday, May 19, 2011
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"उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं"
जब भूली ना उन लम्हों को, याद आए कहूँ तो ठीक नहीं
कह दूँ कैसे तुम रूठ गए, बेवफा कहूँ तो ठीक नहीं
डूबी रहती हूँ खयालों में , ख़्वाबों को संजोया है दिल में
जब होश में आती हूँ सचमुच, उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं
क्या करूँ जो दिल ये माने ना, मजबूरी को भी जाने ना
जब तुम बसते हो साँसों में, दर्मियाँ कहूँ तो ठीक नहीं
जीवन के भाव नहीं वश में,गम खुशियों का ही संगम है
यादों के साये में जी कर, तन्हाई कहूँ तो ठीक नहीं
कुसुम ने जीवन से सीखा, भाए ना शब्दों की बंदिश
न मिलन बिछोह समझ पाई, मजबूरी कहूँ तो ठीक नहीं
-कुसुम ठाकुर-
विद्यापति पर्व समारोह मात्र औपचारिकता !!
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Kusum Thakur
on Monday, May 2, 2011
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विद्यापति पर्व समारोह
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आज अचानक लल्लन जी लिखी हुई एकांकी "विद्यापतिक दुर्दशा" याद आ गई. आज से २० साल पहले लल्लन जी ने मैथिलि में लिखी अपनी रचना के माध्यम से समाज को एक सन्देश देने की कोशिश की थी.
लल्लन जी अपने हर नाटक के मंचन से पहले अपनी ही लिखी हुई एकांकी का मंचन बच्चों से करवाते थे. "विद्यापतिक दुर्दशा" के माध्यम से उन्होंने जो कहना चाहा था वह आज अचानक "मिथिला सांस्कृतिक परिषद्" द्वारा आयोजित विद्यापति पर्व समारोह को देख मुझे याद आ गई.
मिथिला के सर्वश्रेष्ठ कवि " कवि कोकिल विद्यापति " एक ऐसे कवि श्रेष्ठ हैं जिनकी भक्ति से प्रसन्न हो स्वयं भगवान शिव उनके घर चाकर बन वर्षों तक उनकी सेवा की थी. ऐसे कवि को याद करने के लिए पर्व मानाने का प्रचलन है. प्रचलन इसलिए कह रही हूँ क्यों कि अपनी यादाश्त में मैं ३५ वर्षों से जमशेदपुर में विद्यापति पर्व समारोह मानते हुए देखती आ रही हूँ. इन ३५ वर्षों में यदि बदलाव की ओर देखती हूँ तो लगता है मैं कई पीढ़ी पहले की हूँ परन्तु यदि "विद्यापति पर्व समारोह" जो की प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है...... के कार्यक्रम की समीक्षा करती हूँ तो पाती हूँ आज भी उसके आयोजन में कोई बदलाव नहीं आया है.
अपने संस्कार, अपने कवि अपनी विभूतियों को याद करने के नाम पर, अपने समाज का कल्याण करने के नाम पर, उद्धार करने के नाम पर संस्था का क्या औचित्य है कितना औचित्य है यह मेरी समझ के बाहर है. हाँ एक मंच अवश्य जरूरी होता है जहाँ अपनी भावनाएँ अपने विचार रखा जा सके, समाज को सन्देश दिया जा सके, जरूरत मंदों की सहायता की जा सके, कला एवं संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा सके.
कहने को तो "विद्यापति पर्व" मनाया जाता है....परन्तु एक कोने में विद्यापति के चित्र रख बड़े बड़े नेताओं से जिन्हें यह भी मालुम नहीं होता कि विद्यापति कौन थे, न ही बताने की कोशिश की जाती है, उनसे दीप प्रज्वलित करवा उसे पर्व नाम देने की कोशिश तो की जाती है, परन्तु उस विभूति, उस कवि श्रेष्ठ के बारे में कम से कम संक्षिप्त परिचय देने की किसी को सुध कहाँ ? आयोजक को चिंता रहती है आयोजन सफल कैसे हो. आयोजन के सफलता की भी परिभाषा मेरी समझ में तो नहीं आती. जिस बार जितने बड़े बड़े नेता और जितने ज्यादा पत्रकार आएं उस बार का आयोजन उतना सफल माना जाता है. चाहे दर्शक उन नेताओं और आयोजक के भाषण ही सुनकर वापस क्यों न चले जाएँ. इसके लिए आयोजक साल भर एड़ी चोटी लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. आखिर एड़ी चोटी क्यों न लगाएँ ? साल भर इंतज़ार जो करते हैं उस पल का, नेताओं के साथ मंच पर बैठ गौरवान्वित होने का, नेताओं के मुख से अपने नाम और अच्छे कार्यक्रम की तारीफ़ सुनने का.
यह विद्यापति की दुर्दशा नहीं तो और क्या है ?
धडकनों को तो अबतक जाना नहीं
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Kusum Thakur
on Tuesday, April 26, 2011
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"धडकनों को तो अबतक जाना नहीं"
दिल की ख्वाहिश सही, फिकर क्यूँ नहीं
दिल की ख्वाहिश सही, फिकर क्यूँ नहीं
यूँ तसव्वुर कहूँ, यह सिफर तो नहीं
मैं दिल का कहा अब भी सुनता कहाँ
क्या कहूँ कब कहूँ यह फिकर ही नहीं
दिल की बेताबियाँ, क्या कहूँ खूबियाँ
बस सफ़र रह गई, वह भी माना नहीं
है तलबगार फिर क्यों मैं आहें भरूँ
तरन्नुम तो अब वो मुमकिन नहीं
अलविदा तुमने कह दी मेरे हमसफ़र
धडकनों को तो अबतक जाना नहीं
अलविदा तुमने कह दी मेरे हमसफ़र
धडकनों को तो अबतक जाना नहीं
-कुसुम ठाकुर-
शब्दार्थ :
तसव्वुर - ध्यान, ख्याल, कल्पना, विचार
सिफर - अवकाश, शून्य, खाली होने का भाव, सुन्ना, बिंदी
तलबगार - चाहने वाला
तरन्नुम - स्वर , माधुर्य
भारत चीन युद्ध के 49 वर्ष.
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Kusum Thakur
on Friday, April 8, 2011
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भारत चीन युद्ध के 49 वर्ष.
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१९६२ का भारत चीन युद्ध को करीब ४९ वर्ष बीत गए, पर इन ४९ वर्षों में "सेवेन सिस्टर स्टेट्स" कहा जाने वाला अरुणाचल, सिक्किम, असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और मिजोरम यानि भारत का उत्तर पूर्व अब भी उपेक्षित राज्य हैं . आज भी यहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी है.
७० के दशक में अरुणाचल से सटे भारत चीन सीमा रेखा बनाने के लिए भारत सरकार के कर्मचारी कई कई दिनों तक पैदल चलकर उस स्थान पर पहुँचते थे जहाँ उन्हें भारत और चीन की सीमा पर खम्भा डालना होता था. उनके साथ उनका सामान, सीमेंट, बालू इत्यादि ...और साथ में कारीगर होते थे. कई कई दिनों तक तम्बू में रहकर सीमा स्तम्भ (boarder pillar) बनाई जाती और तब वे वापस घर आते. इन ४० वर्षों में भी उस राज्य की स्थिति में कोई अंतर हो यह नहीं कहा जा सकता. भारत चीन सीमा को जाने वाली सड़क आज भी पूरी तरह तैयार नहीं है. जब कि आज के विकास को देखते हुए वहाँ सड़क और रेल दोनों की सुविधा होना चाहिए था. स्थिति ऐसी है कि यदि चीन आज हमला कर दे तो भारतीय सेना को वहाँ पहुँचने में कम से कम सात दिन लग जाएगा.
चहु दिशा में तरक्की करने वाला चीन की नीति है "राष्ट्र ने तय कर लिया तो देश हर कीमत देने को तैयार है ." और ऐसी नीति रखने वाला देश भारतीय सीमा को ध्यान में रखते हुए अपने "पीपल्स लिबरेशन आर्मी" यानि चीन की सेना को जाने के लिए हर तरफ से तैयार है. उन्होंने सड़क और रेल मार्ग तैयार कर रखा है साथ ही अब अपने सैनिकों को भी. चीनी सेना जिनका तीन नारा है ......"चुप रहकर काम करो, अपनी क्षमता बढाओ और अनुकूल समय देखकर वार करो ".
चीन ने अपनी सेना न सिर्फ भारत चीन सीमा पर बढ़ा दिया है बल्कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से लगे भारत की सीमा पर और भारत पाकिस्तान की सीमा से सटे सीमा नियंत्रण रेखा पर भी तैनात कर दी है. देश के वरिष्ठ सेना अधिकारी की चेतावनी और चिंता से यह अवश्य स्पष्ट है कि विषय गंभीर है और इस ओर ध्यान देने की जरूरत है. देश की स्थिति ऐसी है कि यहाँ नेताओं को भ्रष्टाचार और अपने विपक्ष की छवि बिगड़ने की चिंता से फुर्सत ही नहीं है कि वे इस गंभीर विषय की ओर ध्यान दें. भारत चीन युद्ध को करीब पचास वर्ष हो गए. चीनी चीनी भाई भाई का नारा अब भी हम नहीं भूले हैं तो यह किसकी गलती है ? चिंता इस बात की है कि कहीं आज के भ्रष्ट नेताओं के स्वार्थ की बलि बेदी अरुणाचल और कश्मीर न चढ़ जाए.
जीवन तो है क्षण भंगुर
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Kusum Thakur
on Friday, March 25, 2011
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"जीवन तो है क्षण भंगुर"
बिछड़ कर ही समझ आता,
क्या है मोल साथी का ।
जब तक साथ रहे उसका,
क्यों अनमोल न उसे समझें ।
अच्छाइयाँ अगर धर्म है,
क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।
सराहने मे अहँ आड़े,
अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।
ज्यों अहँ को गहन न होने दें,
तो परिलक्षित होवे क्यों ।
क्यों साथी के हर एक इच्छा,
को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।
सामंजस्य की कमी जो नहीं,
कटुता का स्थान भी न हो ।
कहने को नेह बहुत,
तो फ़िर क्यों न वारे हम ।
खुशियों को सहेजें तो,
आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।
दुःख भी तो रहे न सदा,
आपस में न बाटें क्यों ।
जो समर्पण को लगा लें गले,
क्यों अधिकार न त्यागे हम ।
यह जीवन तो है क्षण भंगुर,
विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।
-कुसुम ठाकुर -
मेरा साथी
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Kusum Thakur
on Tuesday, March 15, 2011
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"मेरा साथी"
मुझे मिला एक साथी
जिस पर थी न्योछावर
रात दिन मैं उसकी
सपनों मे रहती थी डूबी
एक तो वो विद्वान
और मैं अनपढ़ नादान
दूजे मैं ऐसी प्रतिभा
न देखी फिर
सुनी तो फिर भी कभी कभी
पर जब तक उसके मोल को
मैं समझ और सहेज पाती
वह देकर धोखा मुझे
चला गया किसी और देश
जहाँ से न कोई लौटा है
और ख़बर ही भेजा है ।
-कुसुम ठाकुर -
अपना सा आभास तो लगता
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Kusum Thakur
on Wednesday, February 23, 2011
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"अपना सा आभास तो लगता"
समझूं कैसे क्या है रिश्ता,
बिन देखे क्यूँ स्नेह पनपता।
है क्या उलझन समझ न पाऊँ,
होंठ हिले, न शब्द निकलता।
राह तकूँ मैं प्रतिपल जिसकी,
उस तक न सन्देश पहुँचता।
वह न समझे कैसे कह दूँ,
अपना सा आभास तो लगता।
यही कुसुम जीवन की उलझन
ह्रदय प्रेम की यही विकलता
अपना सा आभास तो लगता।
यही कुसुम जीवन की उलझन
ह्रदय प्रेम की यही विकलता
- कुसुम ठाकुर -













