सावन आज बहुत तड़पाया


"सावन आज बहुत तड़पाया"

फिर बदरा ने याद दिलाया 
पिया मिलन की आस जगाया 

तड़पाती है विरह वेदना 
सोये दिल की प्यास बढ़ाया

कट पाये क्या सफ़र अकेला 
बस जीने की राह दिखाया

पतझड़ बीता और वसंत भी
सावन आज बहुत तड़पाया

आदत काँटों में जीने की
जहाँ कुसुम हरदम मुस्काया

-कुसुम ठाकुर- 

दर्द की सौगात दूँ मैं


"दर्द की सौगात दूँ मैं"

 है इबादत इश्क तो संगीत से पूजा करूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं

तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं

भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं

कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं

प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं

-कुसुम ठाकुर-

इबादत - ईश्वर की उपासना, पूजा 
मुकम्मल - पूर्ण, पूरा
तिश्नगी - प्यास, पिपासा 
संजीदगी - गंभीरता 

रास्ते मुश्किल पड़ी है


"रास्ते मुश्किल पड़ी है"

 याद आए जो घडी अब, वो घडी मुश्किल बड़ी है
देख जिसको मुस्कुराऊँ, क्या कोई मुमकिन कड़ी है

हो के विह्वल कह दूँ सारी, बातें दिल की सोचती
बेड़ियाँ भी कम नहीं है, रास्ते मुश्किल पड़ी है

नैन समझे सब इशारे, दर्द सहकर कह न पाए
हो किनारे कह सकूँ पर, वो बहुत नाजुक घड़ी है

तोड़ के बंधन सभी गर, कह सकूँ जज्बात दिल के
क्यूँ लगे आघात दिल को, आंसुओं की ये लड़ी है

है कुसुम की कामना, हर स्वप्न ही तुमसे सजेंगे
मुस्कुराऊँ याद में फिर, भाव की ऐसी लड़ी है

-कुसुम ठाकुर- 

मन जाने क्या क्या कहता है


"मन जाने क्या क्या कहता है"

मन तो प्रतिपल ही बहता है 
पर बंधन का दुःख सहता है 

उठ तरंग जब छू ले मन को 
तब तब मन चंचल रहता है 

जब तरणी में बैठकर डोले 
मन जाने क्या क्या कहता है  

जब अपनों से चोट लगे तो 
बना खंडहर मन ढहता है 

सफल कुसुम जीवन है उसका 
सच्चे प्रेमी संग रहता है

- कुसुम ठाकुर-  

नैन बहुत कुछ कह जाते हैं


"नैन बहुत कुछ कह जाते हैं"

नैन बहुत कुछ कह जाते हैं, कितना भी इन्कार करो 
मगर समर्पण मूल प्रेम का, यह भी तो इकरार करो 

प्रेम की सीमा उम्र नहीं है जानो, मत अनजान बनो 
भले ह्रदय में द्वन्द के कारण, चाहो तो इज़हार करो 

बनो नहीं नादान कभी तुम, समझो सभी इशारों को 
और समेटो हर पल खुशियाँ, कभी नहीं तकरार करो 

चार दिनों का यह जीवन है,प्रेम फुहारें हों सुरभित 
कहीं वेदना अगर विरह की, उस पल को भी प्यार करो 

काँटों में रहकर जीने की, कला कुसुम ने सीख लिया 
देर हुई है मत कहना फिर, आकर के स्वीकार करो 

-कुसुम ठाकुर- 

नहीं समझे?


"नहीं समझे"


दुखी करना नहीं जानूँ, मगर दुःख तुम नहीं समझे
उलझना क्यों है शब्दों में, अभी तक तुम नहीं समझे  


मेरी उलझन मेरी बातें, न खुद समझी यही गम है
मैं चाहूँ पर मेरी चाहत, अभी तक तुम नहीं समझे


इशारे भी चिढाते हैं, करूँ फिर व्यक्त मैं कैसे 
है जीना मूक बनकर क्यों, न सोचा जो वही समझे 


है कहने को बहुत कुछ पर, यहाँ बंदिश नहीं कम है 
हिलोरें दिल की समझूँ पर, थपेड़ों को नहीं समझे 


निगाहें तुम न फेरोगे, सदा विश्वास है मुझको
अहम तेरी सदा खुशियाँ, ये उलझन भी नहीं समझे


जुदाई हो तो रूठे रब, कठिन होता बहुत सहना
मिलन में सुख तो होता है, तड़प को क्यों नही समझे


दिशा का ज्ञान मिलते ही, रहूँ संज्ञान मैं हरदम
इशारों से कहूँ कैसे कुसुम को भी नहीं समझे


 -कुसुम ठाकुर- 

हमारे देश की जनता कब जागेगी !


 जमशेदपुर भी अब बाकी शहरों की तरह असुरक्षित हो गया है. आये दिन हत्या, अपहरण की वारदातें सुनने को मिलती है. कभी डॉक्टरों की हत्या तो कभी बैंक अधिकारी का अपहरण.

अभी हाल में ही एक बैंक के अधिकारी का अपहरण हो गया, जिसे अपहरणकर्ता ने बाद में फिरौती की रकम वसूल कर छोड़ दिया.

बैंक अधिकारी घर जाने के लिए निकले ही थे कि किसी ने गाड़ी रोक जबरदस्ती गाड़ी में सवार हो गया और उन्हें जंगल की और ले गया. जंगल में ले जाने के बाद अपहरणकर्ता ने ५० हज़ार रकम की मांग रखी और कहा उसी समय मंगवाकर दे. पत्नी से फ़ोन द्वारा पैसे मंगवाने की जिद्द की तो अधिकारी को उस सुनसान जंगल में कुछ नहीं सूझा और उसने पत्नी को फ़ोन कर दी कि उसे ५० हज़ार की अभी तुरंत जरूरत है किसी से मांगकर भेजे. पत्नी के पूछने पर कि पैसा कौन ले जायेगा .....अपहरण कर्ताओं ने उस अधिकारी से कह्वाया उसके बैंक का एक आदमी जाकर ले आयेगा. पर पत्नी से ५० हज़ार का इंतजाम नहीं हो पाया. अब उस अधिकारी को अपहरणकर्ता ने जबरदस्ती अपने दोस्तों और परिचितों को फ़ोन द्वारा रुपैये मंगवाने की धमकी दी.

अधिकारी क्या करता उन्होंने बारी बारी अपने दोस्तों और सहकर्मियों को फ़ोन से पैसे का इंतजाम करने कहता. अंत में एक सहकर्मी ने इंतज़ाम किया और उसे उनके खाते में डाल दिया. जिसकी पुष्टि हो गयी तो अपहरणकर्ता अधिकारी को ले गया और ATM से रुपैये निकलवाकर ले लेने के पश्चात अधिकारी को घर जाने की अनुमति दे दी. कुछ दिनों बाद फिर उसका फ़ोन आया और ५० हज़ार की मांग फिर उस अपहरणकर्ता ने रखी और साथ में धमकी भी कि अगर पुलिस को बताया तो बीवी बचे को उठवा लेगा. कोई चारा नहीं देख उस अधिकारी ने फिर ५० हज़ार उसे दे दिया, पर इस बार अपहरण कर्ता को अपने इलाके में ही बुलाकर पैसे दी. साथ ही पैसे देने के बाद पुलिस में खबर कर दी और एफआईआर भी दर्ज करवा दिया.

दरअसल अपहरणकर्ता को बैंक अधिकारी पहचानता है. वह कभी बैंक से क़र्ज़ लेने के सिलसिले में अधिकारी के पास आया था. क़र्ज़ के नियमो के अनुसार उसे क़र्ज़ नहीं मिल पाया था. इस वारदात के बाद अधिकारी ने पुलिस को सारी बातें बता दी थी और पुलिस ने आश्वासन भी दिया था कि अपराधी अवश्य पकड़ा जायेगा. परन्तु एक महीने से ऊपर हो गया है अबतक अपराधी नहीं पकड़ाया है. पुलिस अधिकारी आश्वासन तो देते हैं.... पर अपहरणकर्ता अब फिर से पैसे कि मांग कर रहा है. पुलिस कहती है वह अपराधी फरार है...पुलिस उसे ढूंढ रही है.

दहशत में पूरा परिवार है... अब उनके पास विकल्प क्या है ? क्या हमारी निकम्मी पुलिस सक्षम नहीं है कि अपराधी को ढूढ़ निकाले या यहाँ भी अपराधी ने पैसे से मुंह बंद कर दिया है? कुछ वर्ष पहले जिस शहर की शांति से प्रभावित होकर कई लोग यहीं बस जाते थे आज वही शहर बिलकुल असुरक्षित होता जा रहा है.

एक तरफ अतिक्रमण को हटाया जा रहा है दूसरी तरफ नेताओं के इशारे पर उनके आदमी अतिक्रमण कर रहे हैं. हमारे देश की जनता कब जागेगी ?

उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं


"उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं"

जब भूली ना उन लम्हों को, याद आए कहूँ तो ठीक नहीं
कह दूँ कैसे तुम रूठ गए, बेवफा कहूँ तो ठीक नहीं

डूबी रहती हूँ  खयालों में , ख़्वाबों को संजोया है दिल में
जब होश में आती हूँ सचमुच, उल्फत न कहूँ तो ठीक नहीं

क्या करूँ जो दिल ये माने ना, मजबूरी को भी जाने ना
जब तुम बसते हो साँसों में, दर्मियाँ कहूँ तो ठीक नहीं

जीवन के भाव नहीं वश में,गम खुशियों का ही संगम है
यादों के साये  में जी कर, तन्हाई कहूँ तो ठीक नहीं

कुसुम ने जीवन से सीखा, भाए ना शब्दों की बंदिश
न मिलन बिछोह समझ पाई, मजबूरी कहूँ तो ठीक नहीं


-कुसुम ठाकुर-

विद्यापति पर्व समारोह मात्र औपचारिकता !!


आज अचानक लल्लन जी लिखी हुई एकांकी "विद्यापतिक दुर्दशा" याद आ गई. आज से २० साल पहले लल्लन जी ने मैथिलि में लिखी अपनी रचना के माध्यम से समाज को एक सन्देश देने की कोशिश की थी. 

लल्लन जी अपने हर नाटक के मंचन से पहले अपनी ही लिखी हुई एकांकी का मंचन बच्चों से करवाते थे. "विद्यापतिक दुर्दशा" के माध्यम से उन्होंने जो कहना चाहा था वह आज अचानक "मिथिला सांस्कृतिक परिषद्"  द्वारा आयोजित विद्यापति पर्व समारोह को देख मुझे याद आ गई. 

मिथिला के सर्वश्रेष्ठ कवि " कवि कोकिल विद्यापति " एक ऐसे कवि श्रेष्ठ हैं जिनकी भक्ति से प्रसन्न हो स्वयं भगवान शिव उनके घर चाकर बन वर्षों तक उनकी सेवा की थी. ऐसे कवि को याद करने के लिए पर्व मानाने का प्रचलन है. प्रचलन इसलिए कह रही हूँ क्यों कि अपनी यादाश्त में मैं ३५ वर्षों से जमशेदपुर में विद्यापति पर्व समारोह मानते हुए देखती आ रही हूँ. इन ३५ वर्षों में यदि बदलाव की ओर देखती हूँ तो लगता है मैं कई पीढ़ी पहले की हूँ परन्तु यदि "विद्यापति पर्व समारोह" जो की प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है...... के कार्यक्रम की समीक्षा करती हूँ तो पाती हूँ आज भी उसके आयोजन में कोई बदलाव नहीं आया है. 

अपने संस्कार, अपने कवि अपनी विभूतियों को याद करने के नाम पर, अपने समाज का कल्याण करने के नाम पर, उद्धार करने के नाम पर संस्था का क्या औचित्य है कितना औचित्य है यह मेरी समझ के बाहर है. हाँ एक मंच अवश्य जरूरी होता है जहाँ अपनी भावनाएँ अपने विचार रखा जा सके, समाज को सन्देश दिया जा सके, जरूरत मंदों की सहायता की जा सके, कला एवं संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा सके. 

कहने को तो "विद्यापति पर्व" मनाया जाता है....परन्तु एक कोने में विद्यापति के चित्र रख बड़े बड़े नेताओं से जिन्हें यह भी मालुम नहीं होता कि विद्यापति कौन थे, न ही बताने की कोशिश की जाती है, उनसे  दीप प्रज्वलित करवा उसे पर्व नाम देने की कोशिश तो की जाती है, परन्तु उस विभूति, उस कवि श्रेष्ठ के बारे में कम से कम संक्षिप्त परिचय देने की किसी को सुध कहाँ ? आयोजक को चिंता रहती है आयोजन सफल कैसे हो. आयोजन के सफलता की भी परिभाषा मेरी समझ में तो नहीं आती. जिस बार जितने बड़े बड़े नेता और जितने ज्यादा पत्रकार आएं उस बार का आयोजन उतना सफल माना जाता है. चाहे दर्शक उन नेताओं और आयोजक के भाषण ही सुनकर वापस क्यों न चले जाएँ. इसके लिए आयोजक साल भर एड़ी चोटी लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.  आखिर एड़ी चोटी क्यों न लगाएँ ? साल भर इंतज़ार जो करते हैं उस पल का,  नेताओं के साथ मंच पर बैठ गौरवान्वित होने का, नेताओं के मुख से अपने नाम और अच्छे कार्यक्रम की तारीफ़ सुनने का. 

यह विद्यापति की दुर्दशा नहीं तो और क्या है ? 

धडकनों को तो अबतक जाना नहीं

"धडकनों को तो अबतक जाना नहीं"

दिल की ख्वाहिश सही, फिकर क्यूँ नहीं  
यूँ तसव्वुर कहूँ, यह सिफर तो नहीं

मैं दिल का कहा अब भी सुनता कहाँ 
क्या  कहूँ कब कहूँ यह फिकर ही नहीं 

 दिल की बेताबियाँ, क्या कहूँ खूबियाँ 
 बस सफ़र रह गई, वह भी माना नहीं 

है तलबगार फिर क्यों मैं आहें भरूँ 
तरन्नुम तो अब वो मुमकिन नहीं

अलविदा तुमने कह दी मेरे हमसफ़र
धडकनों को तो अबतक जाना नहीं 

-कुसुम ठाकुर- 

शब्दार्थ : 

तसव्वुर - ध्यान, ख्याल, कल्पना, विचार 
सिफर - अवकाश, शून्य, खाली होने का भाव, सुन्ना, बिंदी
तलबगार - चाहने वाला 
तरन्नुम - स्वर , माधुर्य





भारत चीन युद्ध के 49 वर्ष.


१९६२ का भारत चीन युद्ध को करीब ४९ वर्ष बीत गए, पर इन ४९ वर्षों में "सेवेन सिस्टर स्टेट्स" कहा जाने वाला अरुणाचल, सिक्किम, असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और मिजोरम यानि भारत का उत्तर पूर्व अब भी उपेक्षित राज्य हैं . आज भी यहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी है. 

७० के दशक में अरुणाचल से सटे भारत चीन सीमा रेखा बनाने के लिए भारत सरकार के कर्मचारी कई कई दिनों तक पैदल चलकर उस स्थान पर पहुँचते थे जहाँ उन्हें भारत और चीन की सीमा पर खम्भा डालना होता था. उनके साथ उनका सामान, सीमेंट, बालू इत्यादि ...और साथ में कारीगर होते थे. कई कई दिनों तक तम्बू में रहकर सीमा स्तम्भ (boarder pillar) बनाई जाती और तब वे वापस घर आते. इन ४० वर्षों में भी उस राज्य की स्थिति में कोई अंतर हो यह नहीं कहा जा सकता. भारत चीन सीमा को जाने वाली सड़क आज भी पूरी तरह तैयार नहीं है. जब कि आज के विकास को देखते हुए वहाँ सड़क और रेल दोनों की सुविधा होना चाहिए था. स्थिति ऐसी है कि यदि चीन आज हमला कर दे तो भारतीय सेना को वहाँ पहुँचने में कम से कम सात दिन लग जाएगा.

चहु दिशा में तरक्की करने वाला चीन की नीति है "राष्ट्र ने तय कर लिया तो देश हर कीमत देने को तैयार है ." और ऐसी नीति रखने वाला देश भारतीय सीमा को ध्यान में रखते हुए अपने "पीपल्स लिबरेशन आर्मी" यानि चीन की सेना को जाने के लिए हर तरफ से तैयार है. उन्होंने सड़क और रेल मार्ग तैयार कर रखा है साथ ही अब अपने सैनिकों को भी. चीनी सेना जिनका तीन नारा है ......"चुप रहकर काम करो, अपनी क्षमता बढाओ और अनुकूल समय देखकर वार करो ".


चीन ने अपनी सेना न सिर्फ भारत चीन सीमा पर बढ़ा दिया है बल्कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से लगे भारत की सीमा पर और भारत पाकिस्तान की सीमा से सटे सीमा नियंत्रण रेखा पर भी तैनात कर दी है. देश के वरिष्ठ सेना अधिकारी की चेतावनी और चिंता से यह अवश्य स्पष्ट है कि विषय गंभीर है और इस ओर ध्यान देने की जरूरत है. देश की स्थिति ऐसी है कि यहाँ नेताओं को भ्रष्टाचार और अपने विपक्ष की छवि बिगड़ने की चिंता से फुर्सत ही नहीं है कि वे इस गंभीर विषय की ओर ध्यान दें. भारत चीन युद्ध को करीब पचास वर्ष हो गए. चीनी चीनी भाई भाई का नारा अब भी हम नहीं भूले हैं तो यह किसकी गलती है ? चिंता इस बात की है कि कहीं आज के भ्रष्ट नेताओं के स्वार्थ की बलि बेदी अरुणाचल और कश्मीर न चढ़ जाए.

जीवन तो है क्षण भंगुर

"जीवन तो है क्षण भंगुर"

बिछड़ कर ही समझ आता,
क्या है मोल साथी का ।

जब तक साथ रहे उसका,
क्यों अनमोल न उसे समझें ।

अच्छाइयाँ अगर धर्म है,
क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।

सराहने मे अहँ आड़े,
अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।

ज्यों अहँ को गहन न होने दें,
तो परिलक्षित होवे क्यों ।

क्यों साथी के हर एक इच्छा,
को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।

सामंजस्य की कमी जो नहीं,
कटुता का स्थान भी न हो ।

कहने को नेह बहुत,
तो फ़िर क्यों न वारे हम ।

खुशियों को सहेजें तो,
आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।

दुःख भी तो रहे न सदा,
आपस में न बाटें क्यों ।

जो समर्पण को लगा लें गले,
क्यों अधिकार न त्यागे हम ।

यह जीवन तो है क्षण भंगुर,
विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।

-कुसुम ठाकुर - 




साथ रंग न छूटे


"साथ रंग न छूटे"

रंगों की बहार 
प्रेम की फुहार 
फागुन की बयार 
होली का त्यौहार 

छोड़ो मन के द्वेष 
लगो एक ही भेष 
फिर काहे का क्लेश
छोड़ो कल पर शेष

साथ रंग न छूटे
और न छूटे अपने 
सपने भी रंग लाए
जीवन में अपने 

जीवन का हर गीत 
सजे तुम्ही से मीत 
न छोड़ूँ मैं रीत 
कहूँ किसे यह जीत

-कुसुम ठाकुर-     
  

मेरा साथी


"मेरा साथी"

 मुझे मिला एक साथी
जिस पर थी न्योछावर
रात दिन मैं उसकी
सपनों मे रहती थी डूबी
एक तो वो विद्वान
और मैं अनपढ़ नादान
दूजे मैं ऐसी प्रतिभा
न देखी फिर
सुनी तो फिर भी कभी कभी
पर जब तक उसके मोल को
मैं समझ और सहेज पाती
वह देकर धोखा मुझे
चला गया किसी और देश
जहाँ से न कोई लौटा है
और ख़बर ही भेजा है ।

 -कुसुम ठाकुर -

अपना सा आभास तो लगता

"अपना सा आभास तो लगता"

समझूं कैसे क्या है रिश्ता,
बिन देखे क्यूँ स्नेह पनपता।

है क्या उलझन समझ न पाऊँ,
होंठ हिले, न शब्द निकलता।

राह तकूँ मैं प्रतिपल जिसकी,
उस तक न सन्देश पहुँचता।

वह न समझे कैसे कह दूँ,
अपना सा आभास तो लगता।

यही  कुसुम जीवन की उलझन
ह्रदय प्रेम की यही विकलता

- कुसुम ठाकुर - 


क्या कहूँ,कब कहूँ ?

क्या कहूँ, कब कहूँ,चुप रहूँ या कहूँ ?
अपने दिल की सही दास्ताँ मैं कहूँ ?

मुद्दतों से कभी, दिल की माना नहीं,
अब मैं आहें भरूँ या तकब्बुर कहूँ .

टूटा अब तो वहम, याद आए कसम,
जब मैं तनहा रहूँ, अपने दिल से कहूँ.

आरज़ू थी मेरी, अंजुमन में सही,
बस मैं दीदार करूँ, चाहे कुछ न कहूँ.

- कुसुम ठाकुर-

शब्दार्थ :
 तकब्बुर - अभिमान, घमंड 
अंजुमन -मजलिस, सभा 

हुआ है सवेरा

"हुआ है सवेरा"

 बह चली ऐसी आँधी, छाया नभ में अँधेरा,
चहु दिशा कुछ न सूझे, उड़ गया है बसेरा 


दिन हो गया है काला, रात घनघोर अँधेरा,
लगता है अब न होगा, इस अंधियारे का सवेरा 

टहनियों पर काँपते खग, हैं बच्चों को समेटे ,
आस किरणों का बचा है जाने कब हो सवेरा

पौ फटते चहक उठे खग, देख उषा मुस्कुराती,
प्रलय के संताप से न रुके,जब हुआ हो सवेरा

खोज में चल पड़े खग, क्यों हो उत्साह कम,  
नीड़ निर्माण का सुख, क्यों न हो हुआ है सवेरा। 


- कुसुम ठाकुर-



लेखन एक अनवरत यात्रा है

किसी ने सच ही कहा है :"लेखन एक अनवरत यात्रा है  - जिसका न कोई अंत है न मंजिल ", और यह सच भी है निरंतर अपने भावों को कलम बद्ध करना ही इस यात्रा की नियति होती है। अपने भावों को कलम बद्ध कर व्यक्ति को संतुष्टि के साथ ख़ुशी का अनुभव भी प्राप्त होता है। यह एक ऐसी यात्रा है जहाँ हर रचना एक पड़ाव होता है और पड़ाव पर आ व्यक्ति कभी तो अपने आप को तरोताजा महसूस करता है और अपनी अगली यात्रा को और दूने उत्साह के साथ तय करता है। कभी कभी उस रचना के शब्द जालों में उलझ व्यक्ति थकान का अनुभव भी करता है, फिर भी यात्रा पर निकल पड़ता है। कभी वह इतना खुश होता है कि ख़ुशी से आत्म विभोर हो अपनी अगली यात्रा को ही भूल जाता है पर कभी तो उसे ऐसा महसूस होता है मानो सारे शब्द ही ख़त्म हो गए ऐसी स्थिति में वह अपनी पिछली यात्रा को कामयाबी मान खुश होता है और ख़ुशी की उस धूरी पर घूमता रहता है। यों तो लेखन से आत्म तुष्टि कभी नहीं होती पर इस यात्रा में कभी कभी ऐसे मोड़ भी आते हैं जब व्यक्ति आत्म मुग्ध हो उठता है। 
 
लेखन एक कला है और अपने भावों को शब्दों द्वारा जिवंत बनाना ही लेखकीय कला कहलाता है, जो पाठक के मन में छाप छोड़ जाए, वही सार्थक लेखन कहलाता है लेखक, कवि अपनी रचनाओं में अपने अनुभव अपनी ज़िन्दगी अपने भावों को व्यक्त करते हैं। वह किसी न किसी रूप में उनके इर्द गिर्द घूमती है। उन्हें यह छूट रहती है कि वह कल्पना की उड़ान में, अपने पात्र के माध्यम से अपने मन में आने वाले ज्वार भांटा, अपने अनुभव, विचार, हर्ष, उल्लास, सपने, अपनी इच्छाओं को चाहे तो काट छांटकर या फिर बढ़ा चढ़ाकर लोगों तक पहुंचा सके पात्र  तो निमित्त मात्र होते हैं जिसे अपनी कल्पना, अनुभव से व्यापक दायरा प्रदान करना और लोगों का अनुभव बनने की कोशिश ही लेखक का उद्देश्य होता है। परन्तु इसके विपरीत आत्म कथा में यह गुंजाइश नहीं होती .......यहाँ पात्र ही उदेश्य होता है और लक्ष्य भी। यहाँ कल्पना की उड़ान में नहीं उड़ा जा सकता, जो कुछ देखा सुना और जो घटित हुआ उसी का वर्णन "अपनी कहानी" का उदेश्य होता है। अपने बारे में लिखना बहुत ही कठिन होता है। यहाँ न कल्पना की उड़ान में उड़ा जा सकता है न ही किसी से ताल मेल बिठाने की जरूरत होती है। बस अपने इर्द गिर्द  घटित घटनाओं को, अपने अनुभव, अपने मन के भावों को लिखना ही इसका लक्ष्य होता है 


मैं कभी यह नहीं सोची थी कि मैं कुछ लिखूंगी मैं तो बस हमसफ़र थी एक ऐसे व्यक्तित्व की जिसने अपने जीवन के चंद वर्षों में उतार चढ़ाव भरी जिंदगी को भी बड़े ही सहज, स्वाभाविक ढंग से सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए बिताया। एक बार मुझे किसी पत्रिका के लिए कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं.....मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।  मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था ।

अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।

यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।

उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।

एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।

वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पड़े तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।

मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।

लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा की थी, वह भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पड़ा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पड़ा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई सालों तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नहीं है तो साथ। 

क्रमशः ...........

जिद्द भी करूँ क्यूँ न वादा करो

"जिद्द भी करूँ क्यूँ न वादा करो"

 गुम सुम रहो और न बातें करो,
कहूँ मैं क्या जो यकीं मुझपर करो 

पल पल की यादें हूँ मैं कितनी दूर,
विरह वेदना है बेताबी हरो 

नाराज़ जीवन, छुपे मुझसे क्यूँ ,
गिले शिकवे क्यों अब न मुझसे करो

मेरी भावनाएँ हुई कबसे गौण,
हो पहचान मेरी न आहें भरो 

अदाएँ भी मेरी रहे मुझसे दूर,
जिद्द भी करुँ क्यूँ न वादा करो 

लम्हें बची ना करो तुम यकीन,
  नजदीकियाँ हैं न चैन वरो  

- कुसुम ठाकुर -  

भगवान निरीह बनाकर क्यों भेजते


बाल विहार मूक वधिर स्कूल, जमशेदपुर


हमारी बातों को समझने की कोशिश करते हुए बाल विहार के मासूम बच्चे


बाल विहार के बच्चों को लिखकर अपनी बातें बताती हुई सरिता 

आज बहुत दिनों के बाद  बाल विहार गई थी. दरअसल अमेरिका से आने के बाद गई ही नहीं थी. मूक वधिर के इस स्कूल में जाती तो हूँ उनके साथ समय बिताने और उन्हें खुशियाँ देने पर मुझे जो खुशियाँ मिलती है वह कहीं उनकी खुशियों से अधिक है. उनके साथ कब समय बीत जाता है पता ही नहीं चलता. 

इस बार जबसे आई हूँ तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है इसलिए मेरा कहीं भी जाना आना कम हो रहा है या यों कह सकती हूँ नहीं के बराबर . आज अचानक बाल विहार से एक बच्चे ने किसी से फ़ोन करवाया तो अपने आप को नहीं रोक पाई और अपनी एक सहेली के साथ वहाँ पहुँच गई. 

बच्चों की ख़ुशी देखने लायक थी. उन्हें तो उम्मीद ही नहीं थी हम अचानक पहुँच जाएँगे. हमें देख सभी अपनी अपनी जगह छोड़ हॉल में जो उनकी कक्षा भी है, पहुँच गए. ख़ुशी से कई कई बार नमस्ते करते, देखते देखते कुछ ही पलों में पूरी कक्षा में कुर्सियों को करीने से रख सारे बच्चे अपनी अपनी जगह बैठ गए . ऐसी अनुशासन तो मैंने अच्छे अच्छे स्कूलों में भी नहीं देखी, जो इस बाल विहार के बच्चों में है. 

हमने करीब एक डेढ़ घंटे उनके साथ बिताई, पर उनके चहरे की ख़ुशी देख प्रतीत होता था मानो उन्हें दुनिया की सारी खुशियाँ मिल गई हो और उनको खुश देख हमें संतुष्टि. हम जब चलने लगे एक बच्चे ने हाथ पकड़ रुकने को कहा और जल्दी से बोर्ड पर कुछ लिखने लगा, मैं मुड़ी तो बोर्ड पर वह कुछ लिख रहा था. उसने लिखी थी "Kusum mam tommorow". मैं समझ गई , वह पूछ रहा था मैं कल आऊँगी या नहीं. मैंने उसे कहा हाँ आऊंगी. वह समझ गया और सभी ताली बजा बजाकर उछलने लगे. चलते समय सभी हमारी गाड़ी तक आ हाथ हिला हिलाकर फिर से आने का इशारा कर रहे थे. 

रास्ते भर मैं सोचती रही भगवान जन्म देते हैं तो उन्हें निरीह बनाकर क्यों भेजते. अपनी बातों को समझाने के लिए ही उन्हें कितनी मेहनत करनी होती है. इतने मासूम बच्चे और अपने मन की सारी बातें सबसे नहीं कर पाते, लिखकर और इशारों से ही समझाना पड़ता है उन्हें . खैर, आज फिर जाने की तीव्र इच्छा है ............