होली

( कई दिनों से अस्वस्थता के कारण मैं कुछ नहीं लिख पाई हूँ, न ही पढ़ पाई हूँ, पर आज बिना लिखे न रह पाई और कुछ पंक्तियाँ लिख ही डाली )

" होली "


दिन हो होली या कि दिवाली ,
रहता था न दिल भी खाली ।
चटक रंग तो बसत ह्रदय में ,
उसे उतारूँ कैसे नयनन में ।


देखि ज्यों मैं सरसों पीली ,
याद दिला गई बरसों की होली ।
बसंत बयार न लागे मुझको ,
कूक कोयल भी न भाये अब तो ।


नींद खुली बस आहट पाकर ,
कहा कोई कानों में गाकर ।
फागुन में मैं चातक बनकर ,
आया हूँ सजनी के दर पर ।।

-कुसुम ठाकुर -


रोना भी क्या एक कला है


" रोना भी तो एक कला है "

रोना क्यों कर दुर्बलता है ?
यह तो नयनों की भाषा है

सुख देखे तो छलक जाता है
दुःख में फिर भी सहज आता है

लाख संभालो , न तब रुकता है
न निकट हो कोई आहत करता है

उमड़ घुमड़ जो बस जाता है
श्रांत ह्रदय वह कर देता है

रोना भी तो एक कला है
फिर क्यों लगे यह भरमाता है ?

- कुसुम ठाकुर -


कवि कोकिल विद्यापति


कवि कोकिल विद्यापति

"कवि कोकिल विद्यापति" का पूरा नाम "विद्यापति ठाकुर था। धन्य है उनकी माता "हाँसिनी देवी"जिन्होंने ऐसे पुत्र रत्न को जन्म दिया, धन्य है विसपी गाँव जहाँ कवि कोकिल ने जन्म लिया।"श्री गणपति ठाकुर" ने कपिलेश्वर महादेव की अराधना कर ऐसे पुत्र रत्न को प्राप्त किया था। कहा जाता है कि स्वयं भोले नाथ ने कवि विद्यापति के यहाँ उगना(नौकर का नाम ) बनकर चाकरी की थी। ऐसा अनुमान है कि "कवि कोकिल विद्यापति" का जन्म विसपी गाँव में सन १३५० . में हुआ अंत निकट देख वे गंगा लाभ को चले गए और बनारस में उनका देहावसान कार्तिक धवल त्रयोदसी को सन १४४० . में हुआ

यह उन्हीं की इन पंक्तियों से पता चलता है। :

विद्यापतिक आयु अवसान।
कार्तिक धवल त्रयोदसी जान।।

यों तो कवि विद्यापति मथिली के कवि हैं परन्तु उनकी आरंभिक कुछ रचनाएँ अवहटट्ठ(भाषा) में पायी गयी हैं अवहटट्ठ संस्कृत प्राकृत मिश्रित मैथिली है। कीर्तिलता इनकी पहली रचना राजा कीर्ति सिंह के नाम पर है जो अवहटट्ठ (भाषा) में ही है। कीर्तिलता के प्रथम पल्लव में कवि ने स्वयं लिखा है। :

देसिल बयना सब जन मिट्ठा।
ते तैसन जम्पओ अवहटट्ठा । ।

अर्थात : "अपने देश या अपनी भाषा सबको मीठी लगती है। ,यही जानकर मैंने इसकी रचना की है"।

मिथिला में इनके लिखे पदों को घर घर में हर मौके पर, हर शुभ कार्यों में गाई जाती है, चाहे उपनयन संस्कार हों या विवाह। शिव स्तुति और भगवती स्तुति तो मिथिला के हर घर में बड़े ही भाव भक्ति से गायी जाती है। :

जय जय भैरवी असुर-भयाउनी
पशुपति- भामिनी माया
सहज सुमति बर दिय हे गोसाउनी
अनुगति गति तुअ पाया। ।
बासर रैन सबासन सोभित
चरन चंद्रमनि चूडा।
कतओक दैत्य मारि मुँह मेलल,
कतौउ उगलि केलि कूडा । ।
सामर बरन, नयन अनुरंजित,
जलद जोग फुल कोका।
कट कट विकट ओठ पुट पाँडरि
लिधुर- फेन उठी फोका। ।
घन घन घनन घुघुरू कत बाजय,
हन हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
पुत्र बिसरू जुनि माता। ।

इन पंक्तियों में कवि ने माँ के भैरवी रूप का वर्णन किया है।

कुष्ठ रोग आश्रम में एक दिन


कुष्ठ रोग आश्रम में एक दिन

मेरा मन 5 फरवरी से अबतक विचलित है । कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा है , न खाने में मन लग रहा है, न ही लिखने का मन हो रहा है और न ही किसी और काम में । कल मेरे एक दोस्त ने यह सुन मुझसे बातें कर मेरा मन बहलाने की कोशिश करता रहा, पर आज सभी अपने परिवार और दोस्तों में व्यस्त होंगे ।

5 फरवरी को मेरे पति का जन्मदिन रहता है और मेरी कोशिश होती है मैं उस रोज़ कुछ मंदों के बीच बिताऊं । जमशेदपुर के ऐसे ही एक बस्ती की तलाश कर मैं इस बार 5 फरवरी को गई थी । यहाँ छोटे छोटे कई बस्तियां हैं जिनमें करीब 3000 - 4000 कुष्ठ रोगी रहते हैं । बाहर से देखने पर लगा कि यहाँ सरकार इनका काफी ख्याल रखती है । साफ़ सुथरी बस्ती और घर छोटे मगर रहने लायक थे। मुझे देख अच्छा लगा क्यों कि लिखा हुआ था भवन झारखण्ड सरकार द्वारा निर्मित ।

मैं अपने डॉक्टरों, कुछ मित्र और सहयोगियों के साथ जब वहाँ पहुँची उस समय तक वहाँ खाना बनना शुरू हो चुका था । जिन लोगों को उस कार्य का भार दी थी वे वहाँ मौजूद थे और खाना बन रहा था। वहाँ पहुँचते के साथ मरीज़ भी आ गए और पंक्ति में खड़े हो गए । एक एक की जाँच डॉक्टरों ने शुरू की और दवाई वितरण भी वहीँ एक तरफ होने लगा ।

मेरी आदत है जब भी मेडिकल कैंप में जाती हूँ डॉक्टर के बगल में बैठ डॉक्टर और मरीज़ की बातों को ध्यान से सुनती हूँ । एक एक मरीज़ को गौर से देखती और उनकी बातें सुन रही थी । बहुत कम लोग उस कैंप में थे जिन्हें कुष्ठ रोग नहीं था और किसी और रोग से ग्रसित थे ।



दवाई लेते रोगी

एक बच्चा जो कि मात्र 5 साल का था उसकी बारी आई तो उसकी माँ भी साथ में थी। उसने एक डॉक्टर की पर्ची दिखाई और कहने लगी " डॉक्टर साहब इस दवाई से मेरे बेटे को कोई फायदा नहीं हो रहा है "डॉक्टर साहब ने उससे पर्ची लेकर देखा और कहा डॉक्टर ने दबाई तो बिल्कुल ठीक लिखा है यही दबाई चलेगी । पाँच साल के बच्चे को एक तो कुष्ठ रोग उसपर दम्मा । खैर उसे हमने 6 महीने की दबाई दी और शायद आगे भी उसकी मदद कर सकूँ ।

तरह तरह के रोगियों को अलग अलग परिस्थिति में देख बहुत से प्रश्न मेरे मन में उठने लगे । उसी समय एक छोटी बच्ची आई । उसे सर्दी बुखार था ऐसा उसकी माँ ने कहा । डॉक्टर साहब ने उसकी गाल के तरफ दिखाकर कहा मुझे यहाँ कुछ fungus लग रहा है । उसकी माँ से पूछा " डॉक्टर ने कभी इसकी जांच किया है ? " उसकी माँ ने कहा नहीं । यह सुन डॉक्टर ने पूछा " यहाँ कभी कोई जांच के लिए आता है?" तब भी उस औरत ने कहा नहीं । यह सुन डॉक्टर साहब के साथ मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ।

बच्ची के जाने के बाद एक वृद्ध मरीज़ आया । उसके दोनों हाथों में एक भी उंगली नहीं थे । डॉक्टर साहब ने जांच के बाद दवाई लिखी और वहाँ ही दम्मे से ग्रसित उस व्यक्ति को ढेर सारे inhaler दे दवाई लेने को कहा । वह जैसे ही आगे बढ़ा अचानक डॉक्टर साहब को ध्यान आया और उन्होंने अपने सहायक को बुला बोला पहले उससे पूछो क्या उसके परिवार में कोई है जो उसे inhale करवा सके । मेरे मन में अनेकों प्रश्न बार बार उठ रहे थे मैं वहाँ से उठकर पंक्ति में लोगों को वस्त्र बांटने चली गयी । ध्येय यही था कि उनसे कुछ बात चित करूँ ।

कपड़े बाँटते हुए उनसे मैं तरह तरह के प्रश्न पूछती और वे जवाब दे रहे थे । मैं वहाँ के मुखिया को इशारे से बुलाई और सोची कुछ जानकारी इनसे भी ले लूँ । पर उससे जो जानकारी मिली उससे अबतक मैं आहत हूँ । मैं पूछी यह घर तो सरकार ने बनवाया है तो यहाँ इस रोग की जाँच ख़ास कर बच्चों में यह बीमारी न फैले, या उसकी जांच के लिए सरकार की ओर से कोई सुविधा मिलती है या नहीं ? उस मुखिया ने जो कहा वह इस प्रकार है : " दीदी यह रघुवर दास जी की बस्ती है और ये लोग आते ही हैं " मुझे यह सुन बहुत ख़ुशी हुई और मैं तुरंत बोली " यह तो अच्छा है चलो वे एक अच्छा कम कर रहे हैं , पर उन्हें क्यों नहीं बताते यहाँ बच्चों या जिन्हें यह बीमारी नहीं है उसकी जाँच करने कोई नहीं आता । " वह हँसने लगा ...बोला " दीदी वे हमारा हाल पूछने नहीं आते , वे तो सिर्फ वोट के समय आते है और हाथ हिला हिला कर पूछते है सब ठीक ठाक है न और उनके चमचे कहते हैं इस बार इसपर मुहर लगाना । कभी कभी कुछ खाना हमें मिल जाता है ।

एक दो दिनों में मैं यहाँ के कलक्टर से मिलकर उन्हें स्थिति कि जानकारी दूंगी । शायद वे उस बस्ती में डॉक्टरों को या उस विभाग के लोगों को भेजें ताकि उन छोटे छोटे बच्चों की जाँच समय पर हो पाए और रोग के फ़ैलने से पहले इलाज हो पाए ।


कहूँ याद करती !!

आज एक ऐसे व्यक्ति का जन्मदिन है जिसके साथ का एहसास मेरे जीवन में बहुत महत्व रखता है । जो मुझे १५ वर्ष की उम्र में मिला और २३ वर्षों में जन्मों का स्नेह दिया ।

एक अद्भुत कलाकार , एक हंसमुख इंसान , मातृ -भक्त , एक सफल पिता और पति । ऐसा व्यक्ति जो हर रिश्ते की अहमियत जानता हो और उसे बखूबी निभाए, बहुत कम देखने को मिलते हैं।

एक प्रश्न का जवाब मुझे आज तक नहीं मिल पाया है । किसी का जन्मदिन या शादी की वर्षगाँठ उसके नही रहने पर से ख़ुशी क्यों नहीं मनाते ? क्या उस दिन दुखी होना लाजमी है ? वह व्यक्ति यदि आपका प्रिय है तो वह व्यक्ति रहे न वह दिन आपके लिए शुभ ही होगा । क्यों न उस शुभ दिन को ख़ुशी से मनाया जाय ? उसकी यादों को यादगार बनाया जाय ।

मेरी आज की रचना मेरे पति श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को समर्पित है जिनका आज जन्मदिन है। जो कहने को तो मेरे पास नहीं हैं, पर उन्हें मैं सदा अपने पास ही महसूस करती हूँ ।



" कहूँ याद करती "

सारी रस्में निभाने की चाहत गज़ब थी ।
तुमको मगर मैं तो भूली ही कब थी ?

है बाहर समझ से करूँ याद क्यों मैं ?
उन यादों के मंज़र से निकली ही कब थी ?

बंद आँखों से देखूं तो मिलता सुकूँ है ।
मिला जो मुझे उसकी चाहत ही कब थी ?

तेरी परछाइयों से भी उल्फत है मुझको ।
यूँ भी बेज़ार तुमसे हुई मैं ही कब थी ?

याद तेरी जो दिल में इनायत से कम क्या ?
याद करती कुसुम जिसे भूली ही कब थी ?

- कुसुम ठाकुर -