मन का भेद पपीहा खोले


"मन का भेद पपीहा खोले"

जिस माली ने सींचा अबतक सुबक सुबक वह रोता है
पाल पोसकर बड़ा किया हो उसको एक दिन खोता है  

धूप हवा का जो ख़याल रख पंखुड़ियाँ है नित गिनता
उस उपवन में चाहत से क्या पतझड़ में कुछ होता है  

नेमत उसकी है प्रकृति फिर छेड़ छाड़ क्यों है करता
फूल खिले काँटों में रहकर फिर कांटे तू क्यों बोता है  

शुष्क टहनियों पर नव पल्लव, कलियाँ भी हैं मुस्काती
मधुमास के आते ही मधुप फूलों से अमृत ढ़ोता है  

कुहू कुहू कोयल जब बोले मन का भेद पपीहा खोले
हर्षित कुसुम भंवरों का गुन गुन भी सुहावना होता है  

-कुसुम ठाकुर-


6 comments:

kuldeep thakur said...

आप को होली की हार्दिक शुभकामनाएं...
आप की ये रचना 29-03-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचलपर लिंक की जा रही है। आप भी इस हलचल में अवश्य शामिल होना।
सूचनार्थ।

vandan gupta said...

होली की महिमा न्यारी
सब पर की है रंगदारी
खट्टे मीठे रिश्तों में
मारी रंग भरी पिचकारी
होली की शुभकामनायें

Shalini kaushik said...

बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति आपको होली की हार्दिक शुभकामनायें होली की शुभकामनायें तभी जब होली ऐसे मनाएं .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

Rajendra kumar said...

बहुत सुन्दर भावनात्मक रचना. आपको होली की हार्दिक शुभकामनायें!

Onkar said...

सुन्दर रचना

Unknown said...

सुंदर पंक्तिया
कृपया अपने विचार शेयर करें।
http://authorehsaas.blogspot.in/
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