कहती है नैना हसूँ अब मैं कैसे.


"कहती है नैना, हसूँ अब मैं कैसे"

बयाँ हाले दिल का करूँ अब मैं कैसे
खलिश को छुपाकर रहूँ अब मैं कैसे 

बुझी कब ख्वाहिश नहीं इल्म मुझको
है तन्हाइयाँ भी सहूँ अब मैं कैसे 

चिलमन से देखी बहारों को जाते
हिले होठ मेरे कहूँ अब मैं कैसे 

हो उल्फत की चाहत ये मुमकिन नहीं
जो दूर चेहरा पढूँ अब मैं कैसे 

 शोखी कुसुम की है पहले से कम क्यूँ 
  कहती है नैना, हसूँ अब मैं कैसे 

-कुसुम ठाकुर-

13 comments:

Shanti Garg said...

बहुत ही सुंदर समीक्षा ...
हार्दिक बधाई !!

महेन्द्र मिश्र said...

हो उल्फत की चाहत ये मुमकिन नहीं
जो दूर चेहरा पढूँ अब मैं कैसे

बहुत सुन्दर ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

खुबसूरत गजल...
सादर.

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक अग्रिम शुभकामनाएँ!!


इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

Reena Maurya said...

बहुत ही खुबसूरत गजल..
बेहतरीन:-)

शिवनाथ कुमार said...

चिलमन से देखी बहारों को जाते
हिले होठ मेरे कहूँ अब मैं कैसे

क्या खूब लिखा है आपने
बहुत खूब !

expression said...

सुन्दर....
बहुत सुन्दर रचना...

अनु

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आज 30/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

Swati Vallabha Raj said...

वाह...बहुत ही सुन्दर....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर

Anita said...

खूबसूरत..... :)

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर भाव लिए रचना