गुम सुम सी बैठी रहती हूँ

"गुम सुम सी बैठी रहती हूँ "

गुम सुम सी बैठी रहती हूँ।
ख़्वाबों को ख्यालों को ,
नयनों मे बसाती रहती हूँ ।
थक जाते हैं मेरे ये नयन ,
पर मैं तो कभी नहीं थकती ।
गुम सुम ........................ ।
कानों को कभी लगे आहट ,
आते हैं होठों पर ये हँसी ।
पल भर की ये उम्मीदें थीं ,
दूसरे क्षण ही विलीन हुए ।
गुम सुम सी ................... ।
फिर आया एक झोंका ऐसा ,
सब लेकर दूर चला गया ।
अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।
-कुसुम ठाकुर -

19 comments:

M VERMA said...

फिर आया एक झोंका ऐसा ,
सब लेकर दूर चला गया ।
झोके तो आते रहते हैं. ख्वाबो खयालो को फिर भी जिन्दा रखना ही होगा.
सुन्दर खयाल

Sadhana Vaid said...

सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना ! अति उत्तम !

http://sudhinama.blogspot.com
http://sadhanavaid.blogspot.com

दिलीप said...

कानों को कभी लगे आहट ,
आते हैं होठों पर ये हँसी ।
पल भर की ये उम्मीदें थीं ,
दूसरे क्षण ही विलीन हुए ।

ye panktiyan bahut khoob lagi..
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

दिलीप said...
This comment has been removed by the author.
Jandunia said...

बहुत सुंदर रचना।

kunwarji's said...

"अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।"


खूब जिया है ऐसे पलो को हमने भी बताऊँ कैसे,
जिन पलो में मृत थे हम वो पल अब दोहराऊं कैसे,

KUNWAR JI,

पी.सी.गोदियाल said...

फिर आया एक झोंका ऐसा ,
सब लेकर दूर चला गया ।
अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।

Bahut khoob !

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुंदर रचना...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह कुसुम जी बहुत सुंदर.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर भावपूण रचना !!

संजय भास्कर said...

कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

परमजीत बाली said...

सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना !

वन्दना said...

फिर आया एक झोंका ऐसा ,
सब लेकर दूर चला गया ।
अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।
atyant gahan abhivyakti.

neelima garg said...

at one point , we feel it..

Mrs. Asha Joglekar said...

"अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।"
कई बार होता है ऐसा । पर ख्वाब है तो जीवन जीने की इच्छा है । सुंदर रचना ।

rashmi ravija said...

फिर आया एक झोंका ऐसा ,
सब लेकर दूर चला गया ।
अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।
ओह !!..कितने ही मन की बातें उजागर कर गयीं ये पंक्तियाँ

http://abebedorespgondufo.blogs.sapo.pt/ said...

Very Good.

tulsibhai said...

पल भर की ये उम्मीदें थीं ,
दूसरे क्षण ही विलीन हुए ।
गुम सुम सी ................... ।
फिर आया एक झोंका ऐसा ,
सब लेकर दूर चला गया ।
अब बैठी हूँ चुप चाप मगर ,
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।

" umda "

----eksacchai {aawaz}

http://eksacchai.blogspot.com

Kusum Thakur said...

प्रतिक्रिया के लिए आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद !!