रुख हवा का न बदले यही चाहती हूँ


" रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँ "

रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँ
और ज़फा से रहूँ दूर यही चाहती हूँ

दूरियाँ तो न चाही सिफर ही मिला
यादों को बसा लूँ यही चाहती हूँ

तबस्सुम तो है पर शिकन कम नहीं
बस आँसू न निकले यही चाहती हूँ

जिन्दगी के सफ़र से तो दहशत नहीं
पर तन्हा न रहूँ बस यही चाहती हूँ

क्या यादों के मंज़र से निकलूँ कभी
उसे अपना बना लूँ यही चाहती हूँ

- कुसुम ठाकुर -

10 comments:

Amitraghat said...

"अच्छी भावाभिव्यक्ति........."
amitraghat.blogspot.com

वन्दना said...

bahut sundar bhaav.

ललित शर्मा said...

दूरियाँ तो न चाही सिफर ही मिला
यादों को बसा लूँ यही चाहती हूँ


सुंदर भावो को अभिव्यक्त करती हुई रचना

आभार

Rakesh said...

जिन्दगी के सफ़र से तो दहशत नहीं
पर तन्हा रहूँ बस यही चाहती हू
kusm aap ki tanhai aapko tanha nahi kerti magar padhne wale apni apni tanhaeyon mein kho jatehai ...wah khoob doobker likhii aapne ye kavita

Kulwant Happy said...

बहुत खूब।

श्याम कोरी 'उदय' said...

...सुन्दर रचना,बधाई!!!!

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

संजय भास्कर said...

सुंदर भावो को अभिव्यक्त करती हुई रचना

आभार

Nikhil kumar said...

nice..................

manoj dixit said...

बहुत बढिया लिखा है....कहते है जितना यादों को भलाना चाहो, उतना ही यादें सताती है....
पास बुलाओं तो दुर जाती है...
दूर जाओ तो पास बुलाती है....