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संस्मरण (पंचम कड़ी)
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Kusum Thakur
on Tuesday, May 4, 2010
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संस्मरण
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बाबुजी की बदली "भूटान " से "गया" हो गई और हम "गया" आ गए । हमारे आते ही बाबुजी हम दोनों भाई बहनों को स्कूल में दाखिला के लिए तैयारी करवाने लगे। बाबुजी को हम दोनों के पीछे काफी मेहनत करनी पड़ी और तब जाकर नाज़रथ अकादमी (स्कूल ) में हमारा दाखिला हो पाया । दाखिला के लिए हम दोनों भाई बहन बाबूजी के साथ स्कूल पहुँचे । स्कूल का बड़ा सा गेट देखकर मैं तो दंग रह गई । गेट के अन्दर पहुंचाते ही ख़ुशी और उत्सुकता मिश्रित मुस्कान दोनों के चहरे पर अनायास ही छलक गए। कहाँ गाँव का वह छोटा सा स्कूल जिसमे गिने हुए कमरे मात्र और एक छोटा सा खेलने की जगह और कहाँ यह, जहाँ खेलने के लिए हर तरह के झूले वगैरह , बड़ा सा खेलने का मैदान , टिफिन खाने के लिए अलग से बड़ा सा हौल जहाँ टेबल और बेंच लगे हुए थे, और फैली हुई चार मंजिला इमारत। ऑफिस में दाखिल हुई तो सिस्टर को देख और भी आश्चर्य हुआ। सिस्टर हम दोनों से इंटरव्यू में बहुत सारे प्रश्न पूछीं और कुछ लिखने के लिए भी। इंटरव्यू के बाद उन्होंने बाबुजी से कहा दोनों पहली कक्षा के लायक ही हैं।
इंटरव्यू में बौआ ने तो सारे प्रश्नों के जवाब दे दिए, पर मैं आते हुए प्रश्नों का जवाब भी नहीं दे पाई । हमारा दाखिला पहली कक्षा में हो गया । हमें सिस्टर ने कहा स्कूल के कपड़े स्कूल का दर्जी ही सिलता है, अतः नाप देना पड़ेगा। दर्जी ने हमारा नाप ले लिया और हम घर आ गए ।
घर पहुँचने के साथ ही बौआ ने माँ को सारी बातें बता दिया साथ ही यह भी कि " दीदी ने जवाब नहीं दिया इसलिए हम दोनों का नाम एक ही कक्षा में लिखाया है " । माँ को स्कूल की तैयारी करते देख हम खुश होते ।
आज तो स्कूल जाने के लिए कई साधन हैं , पर उस जमाने में रिक्शा ही स्कूल आने जाने का साधन होता था , या फिर जिनके पास गाडी थी वे गाड़ी से स्कूल जाते थे। हम भी रिक्शा से प्रतिदिन स्कूल आना जाना करते थे।
बौआ स्वभाव से चंचल था , और छुट्टी के समय प्रतिदिन रिक्शा वाले से आगे के लोहे वाले रौड पर बैठने कि जिद्द करता पर रिक्शा वाला मना कर देता । इसी तरह से करीब छः महीने स्कूल जाते हुए हो गया एक दिन रिक्शा वाला भी तंग आकर उसे घर से कुछ ही दूर पहले सामने बैठा लिय़ा । उस समय उसकी ख़ुशी देखने लायक थी । ऐसा प्रतीत होता था मानो उसने जंग जीत ली हो । मुझसे और रिक्शा वाले से हँस हँसकर बातें करते हुए वह फूले नहीं समा रहा था । अचानक वह चुप हो गया और उसी समय तीन चार लोग सामने से दौड़कर आते हुए दिखे जो रिक्शावाले को रुकने का इशारा कर रहे थे । रिक्शावाला उनकी इशारों पर बिना ध्यान दिए लगातार आगे कि और बढ़ रहा था , पर उसे रिक्शा चलने में दिक्कत महसूस हो रही थी । अचानक एक व्यक्ति "अरे बच्चे का पैर रिक्शा में फंसा हुआ है " कहते हुए रिक्शा को पकड़कर रोक दिया और उसे काफी डांट लगाईं , साथ ही वहाँ भीड़ जमा हो गई । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रही थी । पर लोगों ने रिक्शा वाले से घर का पता पूछा और बौआ को गोद में लेकर दौड़ते हुए घर पहुँच गए । रिक्शा वाला मुझे लिए हुए घर पहुँचा । बौआ को देखकर मुझे भी रुलाई छूट गई । उसके दाहिने पैर का करीब करीब पूरा चमड़ा निकल चुका था और खून से लथ पथ ।
मुझे ठीक से याद तो नहीं है कैसे, पर बौआ को अस्पताल ले जाना पड़ा । करीब एक डेढ़ महीने वह स्कूल नहीं जा सका । डॉक्टर ने उसे स्कूल जाने की अनुमति दे भी दी तब भी चलने में उसे काफी तकलीफ होती।
हमारे स्कूल में स्पेशल पहली कक्षा थी , उसमे जो भी बच्चे रहते उन्हें तरक्की मिलती थी और सीधा तीसरी कक्षा में पहुँच जाते, उन्हें दूसरी कक्षा नहीं पढ़ना पड़ता । बौआ स्कूल जाने लगा उसके कुछ ही दिनों बाद मुझे तरक्की मिल गई , मैं स्पेशल पहली कक्षा में चली गई और बौआ उसी कक्षा में रह गया । अगर वह दुर्घटना नहीं हुई होती तो शायद वह भी मेरे साथ स्पेशल पहली कक्षा में चला जाता।
क्रमशः ...............
संस्मरण(चतुर्थ कड़ी )
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Kusum Thakur
on Wednesday, August 5, 2009
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टाटा स्टील के पदाधिकारी एवं कर्मचारियों मे सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाने के लिए टाटा स्टील प्रतिवर्ष एक अन्तर विभागीय नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करती थी। अपने अपने विभाग के पदाधिकारी और कर्मचारी इसमें भाग लेते थे परन्तु इस पर बहुत ही कम खर्च किया जाता था और यह बिल्कुल ही नीरस होता था जो मात्र संदेश के लिए होता था । इस नाटक में मात्र अपने विभागीय पदाधिकारी और कुछ दूसरे विभाग के लोग होते थे। टाटा स्टील में पद भर संभालने के कुछ ही महीने बाद श्री ठाकुर ने अपने विभाग के सुरक्षा नाटक में भाग लिया और उस नाटक के संवाद को कुछ अपने तरीके से फेर बदल कर उस नाटक में श्रेष्ठ कलाकार का पुरस्कार प्राप्त किया।
दूसरे वर्ष जब श्री ठाकुर को नाटक के लिए बोला गया तो उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया वे नाटक रविन्द्र भवन , जो कि जमशेदपुर का सबसे अच्छा प्रेक्षागृह था, में ही मंचित करेंगे। उस वर्ष नाटक रविन्द्र भवन में ही हुआ और उस नीरस विषय पर मंचित नाटक की प्रशंसा श्री ठाकुर जी को मिली साथ ही यहीं से उनके नाट्य यात्रा की शुरुआत भी हुई।
सुरक्षा नाटक की सफलता के बाद सदा श्री ठाकुर जी के मन में रहता था कि हिन्दी एवं अपनी मात्रृ भाषा मैथिली की सेवा अपने कलम से करें साथ ही उन्हें लगा कि अपने विचारों को आम जनता तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम भी यही है।यह उस समय की बात है जिस समय मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल आन्दोलन चल रहा था और निर्णय लिया गया था कि प्रत्येक शहर और गाँव से पोस्टकार्ड पर मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल करने का अनुरोध लिखकर प्रधानमन्त्री तक पहुंचाई जाय। जमशेदपुर से भी पोस्टकार्ड भेजने का निर्णय लिया गया और साथ ही एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन का भी निर्णय लिया गया जिसका भार श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दी गयी। समय कम था पर उन्होंने कुछ अलग सा कार्यक्रम करने की सोची।
उन्होंने एक संगीत संध्या करने की सोची और उस कार्यक्रम का नाम "संकल्प दिवस" दिया। पूरे कार्यक्रम के लिए मैथिली में गीत स्वयं लिख सारे गीतोंके धुन भी दी तथा मुख्य गायक भी स्वयं ही थे। उस कार्यक्रम के उद्घाटन गीत का नाम " संकल्प गीत" रखा। यह कार्यक्रम अत्यन्त ही सफल रहा ओर श्री ठाकुर जी के कला का परिचय जमशेदपुर के कलाकार और दर्शकों से हुआ।
"संकल्प दिवस" कार्यक्रम की सफलता ने श्री ठाकुर जी को नाटक मंचित करने को प्रेरित किया। उसी समय जमशेदपुर की मिथिला सांस्कृतिक परिषद् ने अपने महिला शाखा की स्थापना की थी और महिला शाखा की सदस्यों ने श्री ठाकुर जी से एक कार्यक्रम करने का अनुरोध किया जिसे उनहोंने स्वीकार भी कर ली और तय हुआ कि नाटक का मंचन होगा। श्री ठाकुर का पहला नाटक "बड़का साहब" उसी की देन है। उस नाटक की रचना के समय की एक एक बातें अब भी मुझे याद हैं।उन्होंने इतने सरल और सामान्य भाव से नाटक लिखा कि मालुम ही नहीं हुआ कि नाटक लिखना भी किसी के लिए कठिन काम हो सकता है। उसके एक एक संवाद मुझे कई कई बार सुनना पडा था। पूर्वाभ्यास से पहले ही मुझे नाटक के सारे संवाद याद हो गए
बड़का साहब का पूर्वाभ्यास महिला शाखा की एक सदस्य के घर पर ही होता था। कलाकार के चुनाव में ही अंदाजा हो गया कि जितने भी इच्छुक कलाकार थे सभी नए थे। कलाकार के आभाव में मुख्य भूमिका श्री ठाकुर को स्वयं ही करना पड़ा। हम चारों प्रतिदिन पूर्वाभ्यास में जाते थे। विक्की को तो उस नाटक में बाल कलाकार की भूमिका निभानी थी। मुझे नाटक सम्बंधित अनेको कार्य बता दिया था और उन सब के लिए प्रतिदिन नाटक का पूर्वाभ्यास देखना जरूरी था । न जाने क्यों, शायद महिला शाखा की सदस्यों को इनके कार्य करने का ठंग पसंद नहीं था या उन्हें यह विशवास नहीं था कि नाटक अच्छा होगा, पर वे प्रतिदिन पूर्वाभ्यास के दौरान कुछ न कुछ नाटक किया करती थीं। कुछ को तो होता था कि उन्हें नाटक का अधिक ज्ञान था पर असलियत यही होता है कि हर निर्देशक की अपनी सोच होती है और वह उसी के अनुसार निर्देशन करता है । एक तो कलाकार अच्छे नहीं थे दूसरा बिल्कुल नए, व्यवस्थापक ऐसे कि हर बात में टांग अड़ाने की तो जैसे उन्होंने ठान ली थी। हर दिन श्री ठाकुर जी उन व्यवस्थापक को समझाते कि वे निश्चिंत रहें नाटक अच्छा होगा ही पर वे नहीं समझतीं । पूर्वाभ्यास के बाद प्रतिदिन मैं और बालमुकुन्द जी श्री ठाकुर जी को समझाती । एक तो अच्छे कलाकार का अभाव दूसरा व्यवस्थापकों का हस्तक्षेप उसी नाटक में श्री ठाकुर जी ने सोच लिया कि दूसरों या दूसरी संस्था के लिए नाटक नहीं करेंगे, वह भी महिलाओं के लिए तो बिल्कुल ही नहीं।
नाटक मंचन की तारीख से तीन चार दिन पहले श्री मति इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी और प्रशासन की ओर से सारे कार्यक्रम रद्द करने का आदेश आ गया । नाटक के मंचन की दूसरी तारीख तय करने में देरी नहीं की गयी और सभी समाचार पत्रों में भी दे दी गई पर नाटक मंचन की पूर्व तारीख के दिन कुछ लोगों और कलाकारों को साथ लेकर खुद भी रविन्द्र भवन के सामने खड़े हो गए जिससे आम लोगों को तकलीफ न हो।
२० नवम्बर को जमशेदपुर में बड़का साहब नाटक का सफल मंचन हुआ जिसे देख जमशेदपुर वासी अचम्भित रह गए। पहली बार किसी मैथिली नाटक का मंचन टिकट पर हुआ था । "बड़का साहब" नाटक की सफलता और अनुभव ने श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दूसरा नाटक लिखने और मंचित करने पर बाध्य कर दिया ।
दूसरे वर्ष जब श्री ठाकुर को नाटक के लिए बोला गया तो उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया वे नाटक रविन्द्र भवन , जो कि जमशेदपुर का सबसे अच्छा प्रेक्षागृह था, में ही मंचित करेंगे। उस वर्ष नाटक रविन्द्र भवन में ही हुआ और उस नीरस विषय पर मंचित नाटक की प्रशंसा श्री ठाकुर जी को मिली साथ ही यहीं से उनके नाट्य यात्रा की शुरुआत भी हुई।
सुरक्षा नाटक की सफलता के बाद सदा श्री ठाकुर जी के मन में रहता था कि हिन्दी एवं अपनी मात्रृ भाषा मैथिली की सेवा अपने कलम से करें साथ ही उन्हें लगा कि अपने विचारों को आम जनता तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम भी यही है।यह उस समय की बात है जिस समय मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल आन्दोलन चल रहा था और निर्णय लिया गया था कि प्रत्येक शहर और गाँव से पोस्टकार्ड पर मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल करने का अनुरोध लिखकर प्रधानमन्त्री तक पहुंचाई जाय। जमशेदपुर से भी पोस्टकार्ड भेजने का निर्णय लिया गया और साथ ही एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन का भी निर्णय लिया गया जिसका भार श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दी गयी। समय कम था पर उन्होंने कुछ अलग सा कार्यक्रम करने की सोची।
उन्होंने एक संगीत संध्या करने की सोची और उस कार्यक्रम का नाम "संकल्प दिवस" दिया। पूरे कार्यक्रम के लिए मैथिली में गीत स्वयं लिख सारे गीतोंके धुन भी दी तथा मुख्य गायक भी स्वयं ही थे। उस कार्यक्रम के उद्घाटन गीत का नाम " संकल्प गीत" रखा। यह कार्यक्रम अत्यन्त ही सफल रहा ओर श्री ठाकुर जी के कला का परिचय जमशेदपुर के कलाकार और दर्शकों से हुआ।
"संकल्प दिवस" कार्यक्रम की सफलता ने श्री ठाकुर जी को नाटक मंचित करने को प्रेरित किया। उसी समय जमशेदपुर की मिथिला सांस्कृतिक परिषद् ने अपने महिला शाखा की स्थापना की थी और महिला शाखा की सदस्यों ने श्री ठाकुर जी से एक कार्यक्रम करने का अनुरोध किया जिसे उनहोंने स्वीकार भी कर ली और तय हुआ कि नाटक का मंचन होगा। श्री ठाकुर का पहला नाटक "बड़का साहब" उसी की देन है। उस नाटक की रचना के समय की एक एक बातें अब भी मुझे याद हैं।उन्होंने इतने सरल और सामान्य भाव से नाटक लिखा कि मालुम ही नहीं हुआ कि नाटक लिखना भी किसी के लिए कठिन काम हो सकता है। उसके एक एक संवाद मुझे कई कई बार सुनना पडा था। पूर्वाभ्यास से पहले ही मुझे नाटक के सारे संवाद याद हो गए
बड़का साहब का पूर्वाभ्यास महिला शाखा की एक सदस्य के घर पर ही होता था। कलाकार के चुनाव में ही अंदाजा हो गया कि जितने भी इच्छुक कलाकार थे सभी नए थे। कलाकार के आभाव में मुख्य भूमिका श्री ठाकुर को स्वयं ही करना पड़ा। हम चारों प्रतिदिन पूर्वाभ्यास में जाते थे। विक्की को तो उस नाटक में बाल कलाकार की भूमिका निभानी थी। मुझे नाटक सम्बंधित अनेको कार्य बता दिया था और उन सब के लिए प्रतिदिन नाटक का पूर्वाभ्यास देखना जरूरी था । न जाने क्यों, शायद महिला शाखा की सदस्यों को इनके कार्य करने का ठंग पसंद नहीं था या उन्हें यह विशवास नहीं था कि नाटक अच्छा होगा, पर वे प्रतिदिन पूर्वाभ्यास के दौरान कुछ न कुछ नाटक किया करती थीं। कुछ को तो होता था कि उन्हें नाटक का अधिक ज्ञान था पर असलियत यही होता है कि हर निर्देशक की अपनी सोच होती है और वह उसी के अनुसार निर्देशन करता है । एक तो कलाकार अच्छे नहीं थे दूसरा बिल्कुल नए, व्यवस्थापक ऐसे कि हर बात में टांग अड़ाने की तो जैसे उन्होंने ठान ली थी। हर दिन श्री ठाकुर जी उन व्यवस्थापक को समझाते कि वे निश्चिंत रहें नाटक अच्छा होगा ही पर वे नहीं समझतीं । पूर्वाभ्यास के बाद प्रतिदिन मैं और बालमुकुन्द जी श्री ठाकुर जी को समझाती । एक तो अच्छे कलाकार का अभाव दूसरा व्यवस्थापकों का हस्तक्षेप उसी नाटक में श्री ठाकुर जी ने सोच लिया कि दूसरों या दूसरी संस्था के लिए नाटक नहीं करेंगे, वह भी महिलाओं के लिए तो बिल्कुल ही नहीं।
नाटक मंचन की तारीख से तीन चार दिन पहले श्री मति इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी और प्रशासन की ओर से सारे कार्यक्रम रद्द करने का आदेश आ गया । नाटक के मंचन की दूसरी तारीख तय करने में देरी नहीं की गयी और सभी समाचार पत्रों में भी दे दी गई पर नाटक मंचन की पूर्व तारीख के दिन कुछ लोगों और कलाकारों को साथ लेकर खुद भी रविन्द्र भवन के सामने खड़े हो गए जिससे आम लोगों को तकलीफ न हो।
२० नवम्बर को जमशेदपुर में बड़का साहब नाटक का सफल मंचन हुआ जिसे देख जमशेदपुर वासी अचम्भित रह गए। पहली बार किसी मैथिली नाटक का मंचन टिकट पर हुआ था । "बड़का साहब" नाटक की सफलता और अनुभव ने श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दूसरा नाटक लिखने और मंचित करने पर बाध्य कर दिया ।
संस्मरण (तीसरी कड़ी )
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Kusum Thakur
on Wednesday, July 29, 2009
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मालुम नहीं मैं इसे क्या कहूँ लगाव या बंधन। शादी के एक वर्ष बाद जब मैं जमशेदपुर आयी थी उस समय सोची भी नहीं थी कि जमशेदपुर से इतनी सारी यादें जुड़ जाएँगी। कुछ ऐसी यादें जो मुझे खुशियाँ देंगीं कुछ दर्द का एहसास कराएंगी और कुछ तो जीवन भर सालती रहेंगी। जीवन का सबसे ज्यादा समय इस लौह नगरी में बिताउंगी यह भी तो नहीं जानती थी। पर होता वही है जो उसको मंज़ूर हो। किसके नसीब में कहाँ की मिट्टी है यह तो किसी को नहीं पता पर आज जो बंधन या लगाव मुझे जमशेदपुर से है वह मैं भी नहीं जानती क्यों?
शादी के एक वर्ष बाद जब मैं अपने बाबुजी के साथ जमशेदपुर आयी थी उस समय समय मेरे पति पढ़ रहे थे। सोची कुछ महीने बाद द्विरागमन (गौना ) हो जाएगा और तब मैं अतिथि की तरह कभी कभी आउंगी वह भी जब तक बाबुजी की बदली कहीं और नहीं हो जाती। यह किसको पता था कि बाबुजी की तो बदली हो जायेगी, मैं ही यहाँ रह जाउंगी। यहाँ तक कि मेरे दोनों बच्चों का जन्म भी यहीं होगा।
बाबुजी की बदली होने से कुछ महीने पहले मेरे पति श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को, जो पहले गंगा ब्रिज पटना में कार्यरत थे, टाटा स्टील में नौकरी मिल गयी। उसी वर्ष मेरे छोटे बेटे का जन्म हुआ था। बाबुजी तो राँची चले गए, हम जमशेदपुर ही रह गए। पहली बार अकेले वह भी दो दो बच्चों को लेकर रहने का मौका मिला। उसके पहले एक बार कुछ दिनों के लिए मैं पटना में अपने पति के साथ रही थी। मेरा बड़ा बेटा उस समय बहुत छोटा था।
कैसे समय बीते, पता ही नहीं चला। बड़ा बेटा पुत्तु (भास्कर)स्कूल जाने लगा मुझे उसके स्कूल का पहला दिन अब भी वैसे ही याद है। पास के ही एक नर्सरी स्कूल में उसका नाम लिखवाई थी । प्रतिदिन मेरे पति ऑफिस जाते समय उसे स्कूल छोड़ आते ओर मैं छुट्टी समय उसे लेने जाती थी। एक दिन संयोग से मेरा एवं मेरे पति, दोनों की घड़ी खरब हो गयी। मैं हर दिन सुबह नहलाने के बाद विक्की (छोटे बेटे)को सुला देती और जब पुत्तु के छुट्टी का समय होता तब तक वह उठ जाता था। उस दिन विक्की कुछ देरी से सोया, मैं काम में व्यस्त थी समय का भान ही नहीं हुआ। अचानक ध्यान आया और विक्की को गोद में लेकर जल्दी जल्दी स्कूल की ओर चल पड़ी। मैं जैसे ही स्कूल की ओर जाने के लिए मुड़ी अचानक मेरे कानों में पुत्तु के रोने की आवाज आयी और मेरी नजर सामने वाली सड़क पर गयी। उस सड़क से पुत्तु रोता हुआ दौडा चला आ रहा था साथ में उसकी अध्यापिका थीं। मैं अपने स्थान पर ही खड़ी हो गयी। पुत्तु दौड़ता हुआ मेरे पास आकर मुझसे बिल्कुल लिपट गया। मै उसे लेकर घर आ गयी और कुछ देर बाद उससे पूछी" तुम रो क्यों रहे थे? " उसने बड़े ही भोलेपन से जवाब दिया " मैं तो सोचा तुम मुझे छोड़, विक्की के साथ कहीं जा रही थी। लेने क्यों नहीं आयी"? मुझे भीतर से अपने आप पर बहुत ही गुस्सा आया। उस बाल बोध की कही बातें आज भी मुझे याद हैं और जब भी अकेली होती हूँ बच्चों द्वारा कही गयीं इस तरह की बातें सोच सोच कर अपने आप ही खुश होती हूँ। ऐसा लगता है मानो आज की ही घटना हो।
समय की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि पता ही नहीं चला कब विक्की भी स्कूल जाने लायक हो गया। बचपन से ही मेरे पति को लिखने एवं नाटक का शौक था और स्कूल कॉलेज की सारी नाट्य एवं कला की गतिविधियों में सक्रीय रहे। जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो कलाकार मन ज्यादा दिनों तक चुप न बैठ पाया और वे अपनी नाट्य गतिविधियों में जुट गए। शुरुआत तो उन्होंने की "टाटा स्टील" के सुरक्षा नाटक से पर वह शौक सिनेमा तक पहुँच गया।
शादी के एक वर्ष बाद जब मैं अपने बाबुजी के साथ जमशेदपुर आयी थी उस समय समय मेरे पति पढ़ रहे थे। सोची कुछ महीने बाद द्विरागमन (गौना ) हो जाएगा और तब मैं अतिथि की तरह कभी कभी आउंगी वह भी जब तक बाबुजी की बदली कहीं और नहीं हो जाती। यह किसको पता था कि बाबुजी की तो बदली हो जायेगी, मैं ही यहाँ रह जाउंगी। यहाँ तक कि मेरे दोनों बच्चों का जन्म भी यहीं होगा।
बाबुजी की बदली होने से कुछ महीने पहले मेरे पति श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को, जो पहले गंगा ब्रिज पटना में कार्यरत थे, टाटा स्टील में नौकरी मिल गयी। उसी वर्ष मेरे छोटे बेटे का जन्म हुआ था। बाबुजी तो राँची चले गए, हम जमशेदपुर ही रह गए। पहली बार अकेले वह भी दो दो बच्चों को लेकर रहने का मौका मिला। उसके पहले एक बार कुछ दिनों के लिए मैं पटना में अपने पति के साथ रही थी। मेरा बड़ा बेटा उस समय बहुत छोटा था।
कैसे समय बीते, पता ही नहीं चला। बड़ा बेटा पुत्तु (भास्कर)स्कूल जाने लगा मुझे उसके स्कूल का पहला दिन अब भी वैसे ही याद है। पास के ही एक नर्सरी स्कूल में उसका नाम लिखवाई थी । प्रतिदिन मेरे पति ऑफिस जाते समय उसे स्कूल छोड़ आते ओर मैं छुट्टी समय उसे लेने जाती थी। एक दिन संयोग से मेरा एवं मेरे पति, दोनों की घड़ी खरब हो गयी। मैं हर दिन सुबह नहलाने के बाद विक्की (छोटे बेटे)को सुला देती और जब पुत्तु के छुट्टी का समय होता तब तक वह उठ जाता था। उस दिन विक्की कुछ देरी से सोया, मैं काम में व्यस्त थी समय का भान ही नहीं हुआ। अचानक ध्यान आया और विक्की को गोद में लेकर जल्दी जल्दी स्कूल की ओर चल पड़ी। मैं जैसे ही स्कूल की ओर जाने के लिए मुड़ी अचानक मेरे कानों में पुत्तु के रोने की आवाज आयी और मेरी नजर सामने वाली सड़क पर गयी। उस सड़क से पुत्तु रोता हुआ दौडा चला आ रहा था साथ में उसकी अध्यापिका थीं। मैं अपने स्थान पर ही खड़ी हो गयी। पुत्तु दौड़ता हुआ मेरे पास आकर मुझसे बिल्कुल लिपट गया। मै उसे लेकर घर आ गयी और कुछ देर बाद उससे पूछी" तुम रो क्यों रहे थे? " उसने बड़े ही भोलेपन से जवाब दिया " मैं तो सोचा तुम मुझे छोड़, विक्की के साथ कहीं जा रही थी। लेने क्यों नहीं आयी"? मुझे भीतर से अपने आप पर बहुत ही गुस्सा आया। उस बाल बोध की कही बातें आज भी मुझे याद हैं और जब भी अकेली होती हूँ बच्चों द्वारा कही गयीं इस तरह की बातें सोच सोच कर अपने आप ही खुश होती हूँ। ऐसा लगता है मानो आज की ही घटना हो।
समय की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि पता ही नहीं चला कब विक्की भी स्कूल जाने लायक हो गया। बचपन से ही मेरे पति को लिखने एवं नाटक का शौक था और स्कूल कॉलेज की सारी नाट्य एवं कला की गतिविधियों में सक्रीय रहे। जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो कलाकार मन ज्यादा दिनों तक चुप न बैठ पाया और वे अपनी नाट्य गतिविधियों में जुट गए। शुरुआत तो उन्होंने की "टाटा स्टील" के सुरक्षा नाटक से पर वह शौक सिनेमा तक पहुँच गया।
संस्मरण(दूसरी कड़ी)
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Kusum Thakur
on Thursday, July 16, 2009
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मैं जिस दिन पन्द्रह साल की हुई उसके ठीक दूसरे दिन मेरी शादी हो गयी। शादी का मतलब क्या होता है यह भी तो मैं नहीं जानती थी। मुझे तो यह यह भी पता नहीं था कि दीदी की शादी के तुंरत बाद मेरी भी शादी हो जायेगी। मैं तो मैट्रिक की परीक्षा देकर खुशी खुशी अपनी दोस्तों को यह कह कर गाँव गयी थी कि अपने चाचा की बेटी यानि अपनी बड़ी बहन बहन की शादी में जा रही हूँ खूब मस्ती करूंगी। मैं उससे पहले कभी शादी नहीं देखी थी। मैं अपने सारे भाई बहनों में सबसे बड़ी हूँ पर मुझे बचपन में बड़ी बहन का बहुत शौक था। जब भी मेरी सहेलियां अपनी बड़ी बहन की बातें करतीं तो मैं दुखी हो जाती जो मेरी बड़ी बहन नहीं हैं।
मेरे चाचा की शादी मेरी मौसी से हुई है। मैं उन्ही के पास रह कर राँची में पढ़ रही थी, कारण मेरे बाबुजी उस समय अरुणाचल में पदासीन थे और वहां केवल छोटे बच्चों के लिए ही स्कूल थी। हम छः भाई बहनों में से मैं और मेरा बड़ा भाई चाचा के पास राँची रह गए और बाकी तीन बहनें और सबसे छोटा भाई बाबुजी माँ के साथ अरुणाचल चले गए।
दीदी की शादी में मैं अपने चाचा मौसी के साथ गयी थी और माँ बाबुजी अरुणाचल से आए थे। मुझे इस बात की बहुत खुशी थी कि पहली बार किसी की शादी वह भी अपने घर में देखूंगी, साथ ही अपने माँ बाबुजी और सभी भाई बहनों से मिलूंगी यह सोचकर खुशी और दुगनी हो रही थी। शादी के तुंरत बाद बाबुजी और चाचा कहीं चले गए। कहाँ वह तो मुझे किसी ने बताया भी नहीं और मैं अपने भाई बहनों और सहेलियों में इतना व्यस्त थी कि जानने की इच्छा भी नही हुई। खूब आम खाती और खूब खेलती थी।
वैसे तो हम जब भी जाते तो दादी हमे बहुत मानतीं थीं पर इस बार मुझे कुछ ज्यादा ही मानतीं थी। एक दिन सुबह जब मेरी नींद खुली और अपने कमरे से बाहर आयी तो कुछ अजीब ही लगा। घर में सभी व्यस्त थे दादी सब को डांट कर कह रही थीं जल्दी जल्दी सब काम करो अब समय नहीं है। मुझे देखते ही बोल पड़ीं यह देखो अभी तक मेरी पोती फ्राक में ही घूम रही है। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। मैं धत बोल कर वहां से चली गयी। मुझे लगा शायद कल मेरा जन्मदिन है और दादी पहले से ही मुझे चिढाने के लिय कह रही थीं जन्मदिन के दिन इस बार साड़ी पहनना पड़ेगा इसलिए ऐसा कह रहीं हैं।
अचानक चाचा को बाबा के साथ आँगन में घुसते हुए देखी। चाचा की नज़र ज्यों ही मुझपर पड़ी तुंरत कह उठे अरे मिठाई खिलाओ तुम्हारी शादी ठीक करके आया हूँ। मैं तो बिल्कुल आवाक रह गयी। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था क्या कहूँ ? कुछ कहना भी चाहिए या नहीं? यह खुशी की बात है या........? हाँ एक बात अवश्य दिमाग में आया और मैं दुखी हो गयी। मैं तो अपनी दोस्तों को कह कर आयी थी कि मैं अपनी बहन की शादी में जा रही हूँ। वह भी इतराते हुए कही थी क्यों कि अक्सर किसी न किसी सहेली को अपने भाई बहनों की शादी में जाना होता था और जब वे मुझे सुनातीं तो बहुत बुरा लगता था। मैं शादी के विषय में क्या सोचूंगी, सोचने लगी अपनी सहेलियों को क्या कहूँगी। वे तो मेरा मजाक बना देंगीं कि अपनी बहन की शादी का कह कर गयी और अपनी ही शादी कर आ गयी। मैं सारी रात यही सोचती रह गयी। माँ को भी मैं खुश नहीं देखी।
चाचा सिर्फ़ ख़बर करने आए थे शादी की तैयारी तो यहाँ दादी बाबा को ही करना था। चाचा दिन में खाने के बाद चले गए। दूसरे दिन सुबह बाबुजी आए और उनको चाय वगैरह देने के बाद माँ को पूछते सुनी लड़का क्या करता है। बाबुजी ने और क्या कहा वह तो नहीं सुनी पर यह सुनी कि लड़का इंजीनियरिंग में पढ़ता है। बाबुजी से बात करने के बाद से माँ भी खुश दिखीं।जन्मदिन के दिन दादी की ही बात रही और मुझे शाम में थोडी देर के लिए साड़ी पहनना पडा। जन्मदिन के दिन सुबह सुबह बाबुजी भी आ गए। बाबुजी जिस दिन आए उसके दूसरे दिन मेरी शादी खूब धूम धाम से हो गयी। मेरे पति उस समय इंजीनियरिंग में पढ़ते थे।
क्रमशः ........
मेरे चाचा की शादी मेरी मौसी से हुई है। मैं उन्ही के पास रह कर राँची में पढ़ रही थी, कारण मेरे बाबुजी उस समय अरुणाचल में पदासीन थे और वहां केवल छोटे बच्चों के लिए ही स्कूल थी। हम छः भाई बहनों में से मैं और मेरा बड़ा भाई चाचा के पास राँची रह गए और बाकी तीन बहनें और सबसे छोटा भाई बाबुजी माँ के साथ अरुणाचल चले गए।
दीदी की शादी में मैं अपने चाचा मौसी के साथ गयी थी और माँ बाबुजी अरुणाचल से आए थे। मुझे इस बात की बहुत खुशी थी कि पहली बार किसी की शादी वह भी अपने घर में देखूंगी, साथ ही अपने माँ बाबुजी और सभी भाई बहनों से मिलूंगी यह सोचकर खुशी और दुगनी हो रही थी। शादी के तुंरत बाद बाबुजी और चाचा कहीं चले गए। कहाँ वह तो मुझे किसी ने बताया भी नहीं और मैं अपने भाई बहनों और सहेलियों में इतना व्यस्त थी कि जानने की इच्छा भी नही हुई। खूब आम खाती और खूब खेलती थी।
वैसे तो हम जब भी जाते तो दादी हमे बहुत मानतीं थीं पर इस बार मुझे कुछ ज्यादा ही मानतीं थी। एक दिन सुबह जब मेरी नींद खुली और अपने कमरे से बाहर आयी तो कुछ अजीब ही लगा। घर में सभी व्यस्त थे दादी सब को डांट कर कह रही थीं जल्दी जल्दी सब काम करो अब समय नहीं है। मुझे देखते ही बोल पड़ीं यह देखो अभी तक मेरी पोती फ्राक में ही घूम रही है। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। मैं धत बोल कर वहां से चली गयी। मुझे लगा शायद कल मेरा जन्मदिन है और दादी पहले से ही मुझे चिढाने के लिय कह रही थीं जन्मदिन के दिन इस बार साड़ी पहनना पड़ेगा इसलिए ऐसा कह रहीं हैं।
अचानक चाचा को बाबा के साथ आँगन में घुसते हुए देखी। चाचा की नज़र ज्यों ही मुझपर पड़ी तुंरत कह उठे अरे मिठाई खिलाओ तुम्हारी शादी ठीक करके आया हूँ। मैं तो बिल्कुल आवाक रह गयी। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था क्या कहूँ ? कुछ कहना भी चाहिए या नहीं? यह खुशी की बात है या........? हाँ एक बात अवश्य दिमाग में आया और मैं दुखी हो गयी। मैं तो अपनी दोस्तों को कह कर आयी थी कि मैं अपनी बहन की शादी में जा रही हूँ। वह भी इतराते हुए कही थी क्यों कि अक्सर किसी न किसी सहेली को अपने भाई बहनों की शादी में जाना होता था और जब वे मुझे सुनातीं तो बहुत बुरा लगता था। मैं शादी के विषय में क्या सोचूंगी, सोचने लगी अपनी सहेलियों को क्या कहूँगी। वे तो मेरा मजाक बना देंगीं कि अपनी बहन की शादी का कह कर गयी और अपनी ही शादी कर आ गयी। मैं सारी रात यही सोचती रह गयी। माँ को भी मैं खुश नहीं देखी।
चाचा सिर्फ़ ख़बर करने आए थे शादी की तैयारी तो यहाँ दादी बाबा को ही करना था। चाचा दिन में खाने के बाद चले गए। दूसरे दिन सुबह बाबुजी आए और उनको चाय वगैरह देने के बाद माँ को पूछते सुनी लड़का क्या करता है। बाबुजी ने और क्या कहा वह तो नहीं सुनी पर यह सुनी कि लड़का इंजीनियरिंग में पढ़ता है। बाबुजी से बात करने के बाद से माँ भी खुश दिखीं।जन्मदिन के दिन दादी की ही बात रही और मुझे शाम में थोडी देर के लिए साड़ी पहनना पडा। जन्मदिन के दिन सुबह सुबह बाबुजी भी आ गए। बाबुजी जिस दिन आए उसके दूसरे दिन मेरी शादी खूब धूम धाम से हो गयी। मेरे पति उस समय इंजीनियरिंग में पढ़ते थे।
क्रमशः ........
संस्मरण
Posted by
Kusum Thakur
on Tuesday, June 23, 2009
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एक बार एक पत्रिका के लिए मुझे कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।
मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था।
अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।
यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।
उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।
एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।
वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पडे तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।
मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।
लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा कि थी वो भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पडा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पडा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई साल तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नही है तो मन की शान्ति, नहीं है तो साथ।