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" रोटरी के एक प्रेसिडेंट की व्यथा "

  " एक प्रेसिडेंट की व्यथा "

सन् 2012 में मैंने रोटरी की सदस्यता ली और उसका एकमात्र कारण यह था कि मैं बड़े स्तर पर सामाजिक कार्य करना चाहती थी और ज्यादा से ज्यादा जरूरत मंदो के काम आ सकूं इसी ध्येय के साथ मैंने 12 जुलाई 2012 को अपने जन्मदिन के दिन रोटरी क्लब ऑफ जमशेदपुर मिड टाउन की सदस्यता ली. मैं रोटरी में शामिल होने से पहले भी सामाजिक कार्यों से जुड़ी थी और गांव बस्तियों की खाक छानती रहती थी . आज भी उन गांव और बस्तियों के लोग मुझे जानते हैं और याद करते हैं. 

मेरी आदत है, जिस काम का जिम्मा मैं लेती; मेरी कोशिश होती कि उसकी जिम्मेदारी मैं अच्छे से निभाऊं और  रोटरी में तो काम करने के लिए ही शामिल हुई थी.  मेरी कोशिश होती कि मैं सारे मीटिंग, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस  में भाग लूं ताकि मुझे सीखने को मिले और बहुत कुछ सीखा भी मैंने।  हर मीटिंग, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस में रोटरी के एक से एक वक्ता होते; जिनसे सीखने के लिए बहुत कुछ होता। मैं हर वक्ता के वक्तव्य को बड़े ही ध्यान से सुनती और वापस आकर अपने क्लब के सदस्यों से उनकी तारीफ और बखान भी करती। पर एक बात जो हर मीटिंग में आम तौर पर समझ में आता वो यह कि प्रेसिडेंट के लिए 365 दिन बहुत अहम होता है और उन 365 दिन का बॉस प्रेसिडेंट होता है. 

क्लब में शामिल होने के शुरू के दिनों में तो नहीं पर कुछ सालों के बाद जब मुझे भी प्रेसिडेंट के लायक क्लब के सदस्य समझने लगे तब मैं भी आम इंसानों की तरह, प्रेसिडेंट बनने के मंसूबे देखने लगी. मुझे लगने लगा प्रेसिडेंट बनकर मैं कुछ विशिष्ट बन जाऊंगी और विशिष्ट बनने  की  इच्छा किसे नहीं होती। विशिष्ट बनने पर कुछ कर्तव्य भी होते और उन कर्तव्यों में एक कर्तव्य होता, सारे मीटिंग, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस में शामिल होना। विशिष्ट होने पर दूसरे क्लब वाले भी अपने अपने इंस्टॉलेशन में और विशिष्ट अवसरों पर निमंत्रण देंगें ही; वहां भी तो जाना जरूरी हो जाएगा। आखिर 365 दिनों की बॉस जो रहूंगी। यह सब सोच मैंने अपनी तैयारी शुरू कर दी कहां कहां जाना होगा यह सब  मन ही मन  मैंने  तय कर लिया और वहां के कार्यक्रम के अनुसार कपड़े वगैरह की तैयारी भी शुरू कर दी खासकर इंस्टॉलेशन और कॉन्फ्रेंस की मैंने बहुत जोर-शोर से तैयारी की थी. या यूं कहें तो इंस्टॉलेशन और कॉन्फ्रेंस की तैयारी तो मैंने उसी दिन से शुरू कर दी थी जिस दिन क्लब सदस्यों ने मुझे प्रेसिडेंट बनाने का निर्णय लिया जिसके लिए मैंने तुरंत सहमति भी दे दी थी.  इंस्टॉलेशन कहां और कैसे करना है वह तो उसी दिन से सोचना शुरू कर दी थी जिस दिन मेरा प्रेसिडेंट बनना तय हुआ. 

एक साल व्यस्तता रहेगी यह सोच होली में अपने बड़े बेटे के पास पूना गई और मेरे लौटने की तारीख से पहले ही लॉक डाउन लग गया.  किस्मत तो देखो इंस्टॉलेशन की सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई. आठ क्लबों का इंस्टॉलेशन एक साथ वो भी ऑनलाइन होना तय हुआ. तैयारी में एक साथ आठ बॉस को इकठ्ठा निर्णय लेना था साथ ही कुछ सुपर बॉस भी थे. कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पास जिन रंगो की अच्छी अच्छी साड़ियां पूना में थीं वो सारी की सारी रिजेक्ट कर दी गई .......... एक रंग जो हम सारी प्रेसिडेंट को पहनने का निर्णय लिया गया उस रंग  की बहुत ही साधारण सी साड़ी मेरे पास थी. लॉकडाउन के कारण न ही ऐसी परिस्थिति थी कि साड़ी खरीदी जाए न समय था बस उसी साड़ी को पहन मैंने ऑनलाइन ही प्रेसिडेंट की शपथ ली. उस दिन मायूस तो हुई पर मन को सांत्वना देते हुए सोची कॉन्फ्रेंस में सारी कसर निकाल लूंगी पर मेरी किस्मत में वो भी दिन नहीं आया। कॉन्फ्रेंस के साथ सारे के सारे कार्यक्रम रद्द हो गए और उन्हें ऑनलाइन ही कर दिया गया. हर कार्यक्रम के बाद आपस के विचार विमर्श से और मीटिंग के बाद उम्मीद जगती कि अगला कार्यक्रम में हम मिल सकते हैं; पर वह दिन नहीं आया और हमारा स्वर्णिम 365 दिन भी खत्म हो गए। मेरी सारी की सारी तैयारी धरी की धरी रह गई। हमारे इनकमिंग गवर्नर ने इंस्टॉलेशन का वोडियो शूट का बहुत ही अच्छा निर्णय लिया, जैसे ही पता चला कॉलर एक्सचेंज प्रोग्राम की वीडियो शूट होगी मेरी संजोए हुए साड़ियों में से एक साड़ी पहनने की उम्मीद जगी; यह सोच मैं खुशी से फूली नहीं समाई। "चलो उतनी साड़ियों  में से एक साड़ी तो पहनने  को मिलेगी "। मन में आया अब तो "मैं बॉस भी नहीं हूं, मात्र बॉस को कॉलर सुपुर्द करना है", पर कोई एक साड़ी पहनने का मौका तो मिलेगा। चूंकि एक भी आउटगोइंग प्रेसिडेंट कॉलर एक्सचेंज शूट वाली मीटिंग में नहीं थे अतः मेसेज मिला बस एक ही रंग बचा है आउटगोइंग प्रेसिडेंट के लिए, बाकी सब तय हो गया है. आज भी जब मैं अपनी आलमारी खोलती हूं लगता है साड़ियां मुझे चिढ़ा रही हैं.  

नारी व्यापकता का द्योतक है ,एक दिन ही क्यों ?

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1908 ई. में अमेरिका की 15000 कामकाजी महिलाएं अपने शोषण के विरुद्ध और अपने अधिकारों की मांग को लेकर सडकों पर उतर आईं। उनका मुख्य मुद्दा महिला और पुरुष के तनख्वाह  में असमानता की थी । 1909 ई. में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने उनकी मांगों के साथ-साथ राष्ट्रीय महिला दिवस की भी घोषणा कर दी । 1911 ई. में इसे ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का रूप दे दिया गया। ८ मार्च 1975 को अमेरिका में पहली बार अंतराष्ट्रीय महिला दिवस का  आयोजन हुआ और तब से  अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाई जा रही है। परन्तु कुछ वर्षों से " हर संस्थान में महिला दिवस मनाने की होड़ सी लगी  रहती है 

परंतु कुछ वर्षों से सभी संस्थानों की कोशिश होती है वे अच्छे से इस दिन को मनाएं और अपने आस पास की विशिष्ट महिलाओं को सम्मानित करें ।  ऐसा नहीं है कि किसी को विशेष दिन पर याद करना या उसे उस दिन सम्मान देना बुरी बात है। बुरा तो तब लगता है जब विशेष दिनों पर ही मात्र आडंबर के साथ कई उपाधि, सम्मान दी जाती है  सम्मान बोलकर देने की भी जरूरत नहीं है सम्मान तो मन से होता है क्रिया कलाप में होता है। क्या एक दिन महिला दिवस मना लेने से महिलाओं का सम्मान हो जाता है ? यह मेरा प्रश्न उन सभी लोगों से है जो महिला दिवस के पक्षधर हैं ?  किस महिला की क्या उपलब्धि है यह हम महिला दिवस के अवसर पर खोज तो लेते हैं पर साल के बाकी दिन ? क्या कभी अपने घर की महिलाओं पर ध्यान दिया है, उनके योगदान पर कभी दो शब्द सराहना के बोला है ? मेरा घर से तात्पर्य केवल अपने घर से ही नही है , अपने संस्थान अपने दफ्तरों से भी है एक बार घर की महिलाओं की सराहना करके भी देखिए ।  
 
कहने को तो आज सभी कहते हैं "नारी पुरुषों से किसी भी चीज़ में कम नहीं हैं". परन्तु नारी पुरुष से कम बेसी की चर्चा जबतक होती रहेगी तबतक नारी की स्थिति में बदलाव नहीं आ सकता।  बचपन में समानार्थक शब्द जब भी पढ़ती थी बस नारी के पर्यायवाची  शब्द "अबला " पर आकर अटक जाती थी। मेरे मन में एक प्रश्न बराबर उठता -"इतने शब्द हैं नारी के फिर अबला क्यों कहते हैं"? अबला से मुझे निरीह प्राणी का एहसास होता है। सोचती थी जो त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाती है वह अबला कैसे हो सकती ? एक तरफ हमारे पुरानों में नारी शक्ति का जिक्र है दूसरी तरफ हमारे व्याकरण में उसी नारी के लिए अबला शब्द का प्रयोग क्यों ? पर मुझे उत्तर मिल नहीं मिल पाता । मैं अबला शब्द का प्रयोग कभी नहीं करती थी बल्कि अपनी सहपाठियों को भी उसके बदले कोई और शब्द लिखने का सुझाव देती  थी।

जब मैं अपने बच्चों को पढ़ाने लगी उस समय भी बच्चों को नारी के समानार्थक शब्दों में "अबला" शब्द लिखने पढ़ने नहीं देती थी और बड़े ही प्यार और चालाकी से नारी के दूसरे-दूसरे शब्द लिखवा देती । मालूम नहीं क्यों अबला शब्द मुझे गाली सा लगता था और अब भी लगता है।  आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ । इन सबके बावजूद उसके स्वाभाविक रूप में कोई बदलाव नहीं आया है ।  आज भी हमारे यहां लोग विधवा और परित्यक्ता  को बेचारी अलंकार के बिना नहीं कहते । क्या मात्र पति के न रहने या साथ न रहने से वह बेचारी हो जाती है । यदि औरतें  पति के नही रहने पर बेचारी हो जाती हैं तो मर्द के विदुर होने पर बेचारा अलंकार क्यों नही लगाया जाता, यह आज  के समाज से मेरा प्रश्न है ?

ऐसा नहीं है कि नारी की दशा में औरतों का कोई दोष नही आज की नारी कुंठा ग्रसित हैं, जो उन्हें ऊपर उठाने में बाधक हो सकता है । हमारे साथ कल क्या हुआ उस विषय में सोचने के बदले यदि हम अपने आज के बारे में सोचें तो हमारा आत्म विश्वास और अधिक बढेगा । बीता हुआ कल तो हमें कमजोर बनाता है , हमारे मन में आक्रोश ,कुंठा , बदले की भावना को जन्म देता है । फिर क्यों हम अपने अच्छे बुरे की तुलना कल से करें और बात बात में नीचा दिखाने की कोशिश करें। जरूरी नहीं कि उंगली उठाने से ही गल्ती का एहसास हो । हमरा ह्रदय हमारे हर अच्छे बुरे की गवाही देता है, धैर्य भी तो नारी का एक रूप है। 


हर महिला दिवस पर महिलाओं के लिए सरकार के द्वारा भी आरक्षण की बात होती है कुछेक सम्मान का आयोजन भी । साल के बाक़ी दिनो में हर क्षेत्र में अब भी न वह सम्मान न वह बराबरी मिल पाता है जिसकी वह हकदार है या जो महिला दिवस मनाते वक्त कही जाती है। आज की हर नारी से मेरा एक प्रश्न,  मेरे हिसाब से जिसपर सोचने की जरूरत है एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है । यहाँ भी अबला का एहसास होता है । क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे ? क्या "कोटा" का ताना बंद हो जायेगा ? हममें  क्षमता है जिसके बल पर हम किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं । जरूरत है तो बस हमें कमतर न समझा जाए कमजोर न समझा जाए  


महिला दिवस, नारी दिवस के औचित्य  पर मेरा व्यक्तिगत विचार :  नारी तो व्यापकता का द्योतक है, क्या मात्र एक दिन ही महिलाओं के लिए काफी है ? एक दिन  ढोल पीट-पीटकर महिला दिवस मना लेने से जिम्मेदारी ख़त्म हो जाती है या महिलाओं के हिस्से की इज्जत और सम्मान बस वहीँ तक सिमित है?  नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी । यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी अबला शब्द व्याकरण से नहीं निकल पाया है और तब तक नहीं निकल पायेगा जबतक हम नीचा दिखाने की कोशिश करते रहेंगे ,आरक्षण की मांग करते रहेंगे । हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की और तब "नारी" शब्द का पर्यायवाची "अबला" हमारे व्याकरण से निकल पायेगा और उस दिन के बाद से हर दिन महिला दिवस होगा 

कन्यादान महादान क्यों ?

 कहते हैं कन्यादान महा दान अर्थात इससे बड़ा दान नहीं होता है. बेटियों को दान में क्यों दिया जाता है यह आजतक मेरी समझ से परे है. दान में तो वस्तु दी जाती है, तो क्या बेटियाँ वस्तु हैं ? कहते हैं जो वस्तु दान में दे दी जाती है  उस पर न कोई अधिकार होता है न ही उसके बारे में सोचना चाहिए. तो क्या बेटियों पर भी यही लागू होता है ? कन्यादान कब कैसे और क्यों हमारे विवाह पद्धति में जुड़ा यह अभी चर्चा का विषय नहीं है पर उसका दुष्परिणाम आज भी हमारे समाज में लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है. 

कहते हैं सीता जी की अग्नि परीक्षा, वनवास और लव कुश की कहानी अर्थात उत्तरकाण्ड राम चरित मानस का अंश नहीं है, इसे बाल्मीकि ने नहीं लिखा है, इसे बाद में विद्वानों ने जोड़ा है. हमारे धर्म ग्रंथों पर चर्चा करें तो यह विवाद का विषय हो जाएगा. पर हम उसी ग्रन्थ के आधार पर गर्व से कहते हैं मर्यादा पुरषोत्तम राम ने एक धोबन के कहने पर अपनी सीता जैसी पत्नी तक का त्याग कर दिया. यहाँ भी पुरुष की प्रधानता दर्शाता है. क्या यह पौरुषता का विषय है? एक गर्भवती पत्नी का त्याग करना क्या पौरूषता है ? यहाँ भी सीता को अबला नारी का दर्जा मिला . दिव्य शक्ति प्राप्त सीता अबला नारी बन गई. 

पहले हम कहते थे बेटियाँ घर की शोभा होती हैं, सच उसी घर की शोभा को दान में देकर हम खुश हो जाते है और उम्मीद करते हैं कि हमारे घर की शोभा अपने ससुराल जहां वह दान स्वरुप भेजी जा रही है उस घर की शोभा बनकर तो रहे ही, साथ ही उस घर की जिम्मेदारियों की भी अच्छी तरह पालन करे, उसे कितना भी कष्ट हो दोनों घरों की इज्जत पर आंच न आने दे, लड़कियों और लड़कों के लिए परिभाषा अलग अलग है.

आजकल लडकियां घर की शोभा तो नहीं कहलाती हाँ, लड़के लड़की में क्या फर्क है ? लोग यह जरूर कहते हैं. जब ही यह कहा जाता लड़के लड़की में क्या फर्क है मतलब स्पष्ट है फर्क तो है हम कोशिश कर रहे हैं फर्क कम करने की. आज भी बहुत कम लोग हैं जो शादी के बाद बेटी के बारे में भी उतना ही सोचते हैं जितना बेटे के बारे में सोचते हैं. आज भी बेटी शादी के बाद परायी हो जाती है. हा, सांत्वना और दिखावा के लिए यह जरूर कहते हैं बेटियाँ बेटों से ज्यादा माँ बाप के बारे में सोचती हैं. केवल बेटों के लिए धन उपार्जन और पैतृक संपत्ति का रिवाज अभी भी बरकरार है. 

कन्यादान जैसे महादान को हटा देना चाहिए , तब ही हम कह सकते है लडके लड़कियों में कोई फर्क नहीं, वर्ना सदियों से चली आ रही लडके लड़की में फर्क रहेगा ही. जबतक हम कन्या का दान करते रहेंगे उसके साथ अबला शब्द जोड़ा जाता रहेगा और माता पिता बेटा बेटी में भेद करते रहेगे. 

मानवता के मूल्य को समझें यही हमारी संस्कृति रही है

एक बार एक प्रसिद्ध फिल्म नेर्देशक से बातें हो रही थी और उन्होंने कहा था "एक दिन मैं बम्बई में एक फिल्म शूटिंग देख रहा था उस दिन मेरे मन में आया सिनेमा सबसे अच्छा माध्यम है लोगों तक अपने विचारों को पहुंचाने का."  उसके बाद ही हमने  पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने का निर्णय लिया और निर्देशन को चुना.

सच सिनेमा वह शसक्त माध्यम है जिसके जरिए निर्देशक अपनी बातें आम लोगों तक पहुंचा सकता है, समाज को नई दिशा दिखा सकता है. जिन छोटी छोटी बातों पर हम गौर नहीं करते उनका आईना हमें निर्देशक सिनेमा के माध्यम से दिखा सकता है. परन्तु आज हमारे यहाँ हर जगह राजनीति इतनी हावी हो गई है, लोगों की भावनाएं इतनी कलुषित हो गई हैं कि समाज सदा दो भागों में बंट जाती है, लोग आपस में उलझकर रह जाते है, विषय के मतलब ही बदल जाते हैं. जिस उद्देश्य से निर्देशक ने अपनी बात रखी वह तो बेमानी हो जाती है. सिनेमा मनोरंजन के लिए बनाई जाती है........देश के नेता उसे धर्म, देवी देवता पर आक्रमण कह चिंगारी भड़काने का काम करते हैं, उसे धर्म और कौम से जोड़ देते हैं. 

हम इक्कीसवीं सदी में में कहने को तो जी रहे हैं लेकिन आज भी हमारे विचारों में ईश्वर का खौफ विद्यमान है. जो जितना पाप करता है वह उतना ज्यादा पूजा पाठ धर्म का आडम्बर करता है. मैं नहीं कहती पूजा नहीं करनी चाहिए. पूजा करना या किसी विशेष धर्म का अनुयायी होने का मतलब यह नहीं होता कि हम दूसरों को भी उसके विचारों को मानने के लिए बाध्य करें और सहमत न होने पर उसे भला बुरा कहें, धर्म हमें दूसरों का आदर करना सिखाता है, हमें अनुशासित बनाता है न कि उद्दंड.

ईश्वर हैं या नहीं इसपर बात करूँ इतनी विदूषी मैं नहीं पर इतना जरूर कहूँगी कि आज के युग में, धर्म के ठेकेदार बाबा और संत हो ही नहीं सकते. संत की परिभाषा क्या होती है यह भी आज के बाबाओं और संतों को मालुम नहीं होगा. हाँ लोगों में आगे बढ़ने की जल्दबाजी और डर ने आज व्यावसायिक बाबाओं, संतों को जन्म दिया है जो धर्म के नाम पर लोगों को ठगते हैं और लोगों के मन में बसे डर और लालच उन्हें ठगने का मौका देती है. उन्हें धर्म की जानकारी हो या न हो इतना अवश्य मालूम है कि धर्म के नाम पर देश को बांटा जा सकता है.

पंडित, पुजारी,मौला, पादरी या बाबाओं को हम भगवान का प्रतिनिधि मानते हैं और हमारी इसी कमजोरी का फायदा आजके ये प्रतिनिधि उठाते हैं. एक प्रश्न मैं करना चाहूंगी अगर सच में ईश्वर हैं.....और अगर  हम इन प्रतिनिधियों का वहिष्कार कर खुद से अपने ईश्वर या ईष्ट की पूजा करें तो क्या हमारे ईश्वर हमारी नहीं सुनेंगे और यदि नहीं सुनेंगे तो फिर ईश्वर कैसे ?

हमारे यहाँ एक सिनेमा आज देश के प्रबुद्ध वर्ग से कहना चाहूंगी कि वे जागें और अपने विचारों पर किसी को हावी न होने दें. धर्म के आधार पर किसी को अपनी भावना पर अधिकार न करने दें . मानवता के मूल्य को समझें यही हमारी संस्कृति रही है उसे विलुप्त न होने दें.

बेटियों को अधिकार कब मिलेगा, कब तक वो पराई कहलाएंगी ?

कर्म के आधार पर वर्ण बनाया गया परन्तु कालान्तर में वर्ण ही  छूआछूत भेदभाव को जन्म दिया और पराकाष्ठा पर पहुँच गया.उसी प्रकार ईश्वर ने स्त्री को मात्र शारीरिक तौर पर पुरुषों से कमजोर बनाया. उन्हें शारीरिक श्रम वाले काम से दूर रखने के लिए घर के काम काज उनके जिम्मे दिया गया. कालान्तर में उन्हें कमजोर समझ घर हो या बाहर शोषण होने लगा. 

1908 ई. में अमेरिका की कामकाजी महिलाएं अपने अधिकार की मांग को लेकर सडकों पर उतर आईं।1909 ई. में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने उनकी मांगों के साथ राष्ट्रीय महिला दिवस की भी घोषणा की। 1911 ई. में इसे ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का रूप दे दिया गया और तब से ८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाई जा रही है। 

कुछ वर्षों से "दिवस" मनाना फैशन बन गया है। क्या साल में एक दिन याद कर लेना लम्बी लम्बी घोषणा और वादे करना ही सम्मान होता है ? किसी को विशेष दिन पर याद करना या उसे उस दिन सम्मान देना बुरी बात नहीं है। बुरा तो तब लगता है जब विशेष दिनों पर ही मात्र आडंबर के साथ सम्मान देने का ढोंग किया जाता हो।  सम्मान बोलकर देने की वस्तु नहीं है सम्मान तो मन से होता है क्रिया कलाप में होता है। 

एक तरफ महिला दिवस मनाई जाती है दूसरी तरफ नारी का शोषण बलात्कार दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. आज भी हमारे देश में नारी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. कहने के लिए लोग कहते हैं हम बेटे बेटी में फर्क नहीं करते परन्तु कितने लोग हैं जो आज अपनी बेटी को वही अधिकार देते हैं जो अपने बेटे को. पहले भी बेटी पराई थी आज भी पराई ही कहलाती है. माता पिता आज भी बेटी की जिम्मेदारी शादी तक ही समझते हैं जब कि बेटे के लिए उनकी जिम्मेदारी कभी ख़त्म नही होती. कहने के लिए कहते हैं अब मेरी जिम्मेदारी ख़त्म हुई अब बेटा अपना समझेगा पर अपने बेटा क्या बेटे के बेटे यानि पोते के लिए भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं. मेरी समझ में यह नहीं आता कि एक ही माता पिता की संतान में इतना अंतर क्यों ?  बेटी पराई क्यों कहलाती है ? पहले जमाने में तो फिर भी ठीक था बेटा घर, संपत्ति संभालता था बेटी ससुराल चली जाती थी. 

आज महिला दिवस है पर चुनाव और आचार संहिता लग जाने की वजह से सभी पार्टी और नेता इतने व्यस्त हैं कि इसबार महिला दिवस पर महिलाओं के लिए होने वाले झूठे आरक्षण के वादे सुर्ख़ियों में नहीं है. हर महिला दिवस पर महिलाओं के लिए आरक्षण की बात होती है कुछेक सम्मान का आयोजन। साल के बाक़ी दिन अब भी न वह सम्मान है न वह बराबरी मिल पाता है, जिसकी वह हकदार है या जो दिवस मनाते वक्त कही जाती है। कहने को तो आज सभी कहते हैं "नारी पुरुषों से किसी भी चीज़ में कम नहीं हैं". परन्तु नारी पुरुष से कम बेसी की चर्चा जबतक होती रहेगी तबतक नारी की स्थिति में बदलाव नहीं आ सकता।  

नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी। यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी आरक्षण की जरूरत क्यों ? आरक्षण शब्द ही कमजोरी का एहसास दिलाता है आज एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है। क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे?  हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की। 

आज भी हमारे यहाँ यदि कोई बेटी अपने माता पिता या परिवार में अपने अधिकार की बात करती है तो परिवार उसे पसंद नही करता. कानून तो बन गया है पर कितने लोग उसपर अमल करते हैं यह सोचनीय है. दहेज़ जैसे दानव  के जन्म का एक यह भी कारण है. कब हर बात में कहना बंद होगा बेटियाँ पराई होती हैं. हम सरकार से आरक्षण तो मंगाते हैं पर अपने परिवार में अपने माता पिता से अपना अधिकार कब मांगेंगे ? 

  

गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय.


लोग कहते हैं कि आजकल के बच्चे बड़ों की इज्जत करना नहीं जानते खासकर शिक्षकों का गुरुजनों का। पर यह कहना गलत है। मैं भी कभी शिक्षक थी और मैंने जो महसूस किया वह इसके विपरीत है। आजकल वैसे शिक्षक ही विरले मिलते हैं जिनके लिए ये पंक्तियाँ हैं :
गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय ,
बलिहारी गुरु आपनो गोबिंद दियो बताय।। 

आजकल शिक्षा सबसे बड़ा व्यापार हो गया है और शिक्षक सबसे बड़े व्यापारी। शिक्षकों में अब विद्या दान वाली भावना ही नहीं रही जिनके वशीभूत हो विद्यार्थी खुद ब खुद उनके व्यवहार और व्यक्तित्व को कब पूजने लगते वह उन्हें भी पता नहीं चलता।  जीवन भर ऐसे गुरु की छवि बच्चों के मन पर छाप छोड़ जाती है। यदि विद्या अर्जन करना तपस्या है तो विद्या दान देना शिक्षकों का कर्तव्य। यदि शिक्षक अपना कर्तव्य बखूबी निभायेंगे तो उन्हें भी विद्यार्थियों से कभी निराशा नहीं होगी। विद्यार्थी इज्जत नहीं देते का राग नहीं अलापेंगे। वैसे अपवाद तो हर जगह होता है।  

आज भी मैं बच्चों के उस प्यार को नहीं भूल पाती जो मुझे एक शिक्षिका के रूप में मिली। यही वह दिन है जब मुझे स्कूल छोड़ने का अफ़सोस होता है । प्रत्येक वर्ष हमारे स्कूल में शिक्षक दिवस मनाई जाती थी। बच्चे बड़े ही मन से हमारे लिए कार्यक्रम तैयार करते और हर वर्ष मैं अपने कक्षा के बच्चों को हिदायत देती कि किसी को कोई उपहार नहीं लाना है, न मेरे लिए न ही किसी और शिक्षक या शिक्षिका के लिए । वे बड़े ही मायूस होकर पूछते "क्यूँ " और मैं उन्हें समझाते हुए कहती बस अपने बागीचे से "एक फूल" ले आना जिसके घर में हो । जिसके घर न हो वे बाज़ार से नहीं लायेंगे। पर मैं उन बच्चों के स्नेह को देखकर दंग रह जाती । सुबह सुबह ज्यों ही मैं अपनी कक्षा पहुँचती एक एक कर बच्चे मेरे सामने आते और अपने हाथों से बनाये हुए कार्ड और अपने बगीचे से लाये हुए फूल मुझे देते।

उनके स्नेह को देख मैं तो भाव विभोर हो जाती । जो बच्चे फूल नहीं भी लाते वे भी औरों के साथ आकर मुझे शिक्षक दिवस की बधाई देते । वे बच्चे मेरी भावनाओं की जो क़द्र करते और सम्मान देते वह मेरे लिए अनमोल उपहार होता । उस कार्ड में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते जिसे पढ़ मैं आह्लादित हो जाती। आज भी मैं उनमे से कुछ कार्ड रखी हुई हूँ जो बच्चों ने मुझे दिए थे।

आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं उन सभी बच्चों को , हार्दिक शुभकामनाएँ एवं आर्शीवाद देती हूँ एवं सभी गुरुजनों को नमन करती हूँ। 

उन सैनिकों को शत-शत नमन.

कई दिनों से उतराखंड की आपदा से लोग जूझ रहे हैं टीवी में देख मन द्रवित हो जाता है। और तब अचानक समाचार में आया राहत बचाव कार्य में लगे हेलिकोप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उफ़…….  कैसी विडम्बना है। हे  ईश्वर ! उन सैनिकों को किस बात की सजा मिली जो सच में जान जोखिम में डालकर आपदा में फंसे लोगों को बाहर निकाल रहे थे उनके साथ ऐसा अन्याय क्यों? उन सैनिकों को शत-शत नमन। 

एक तरफ हमारे देश की सेना बहादुरी एवं तत्परता के साथ जान जोखिम में डालकर उत्तराखंड त्रासदी से लोगों को बचाने में जुटी हुई है दूसरी तरफ हमारे देश के नेता. उन्हें तो यहाँ भी अपना स्वार्थ अपना नाम एवं अपने वोट की पड़ी है . नाम एवं सहानुभूति के चक्कर में आपस में खुलेआम मारपीट कर रहे हैं। 

कम से कम तीन-चार वर्षों तक केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंट साहब जैसे पवित्र स्थलों पर लोग नहीं जा पाएँगे। वहां के वासिंदे जिनकी रोजी रोटी पर्यटकों, तीर्थयात्रियों पर निर्भर थी, वे अब क्या करेंगे जैसी गंभीर समस्या जहाँ हो वहां के नेता यह चर्चा कर रहे हैं कि भावी प्रधानमंत्री या वह नेता अबतक प्रभावित क्षेत्र नही पहुंचा। उस नेता की हेलीकाप्टर क्यों उतरी, उसकी क्यों नहीं उतरी .......वगैरह वगैरह। बैंड बाजे गाजे के साथ राहत सामग्री भेजी जा रही है क्या उनके कानों में आपदा में फंसे लोगों की चीख सुनाई नहीं देती। 

वाह रे हमारे देश के नेता इनमे अदमीयता नाम की चीज लेस मात्र भी नहीं रही। ऐसे नेता को चुनकर हम देश इनके हाथो मे सौंपते हैं ? जिस देश में ऐसे नेता हों वहां अब भी हम दम भरते हैं कि हम सभ्य और सुसंस्कृत है।  सदियों से चली आ रही देश की सभ्यता और संस्कृति क्या यही थी? इसी के नाम पर हम पाश्चात्य सभ्यता को कोसते हैं?  

आज के युवा वर्ग से हमारी अपील है वे जागें, एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाएं। वे जहां कहीं भी हैं भेद भाव जाति पांति से ऊपर उठकर अपने देश को इन स्वार्थी गद्दार नेताओं से बचाएं, न कि पार्टी, क्षेत्र, जाति के नाम पर आपस में लड़ें। वे चाहें तो आज हमारे देश को बचा सकते हैं।

सही मायने में "महिला दिवस".कब मनेगा ?


करीब ढाई महीने से अमेरिका में हू, इन ढाई महीने में काफी कम लिख पाई हूँ। सच कहूँ तो पोते को छोड़कर कुछ करने का मन ही नहीं होता। उसके साथ एक एक पल मेरे लिए अनमोल हैं। होता है किसी और काम में लग गई तो कुछ अनमोल घड़ियाँ छूट न जाए। पर जब वह सो जाता है उस समय कुछ लिख लेती हूँ या समाचार पढ़ने लिखने का काम कर लेती हूँ। आज अंतरजाल पर गई तो पाई पूरा अंतरजाल "अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस" पर आलेख कवितायें शुभकामनाओं से भरा था। मन में तरह तरह की बातें आने लगी। 

अपने स्वभाव वश मैं छोटी सी छोटी बातों को गहराई से सोचती हूँ और कई बार ऐसा होता है कि मैं उसमे उलझकर रह जाती हूँ । क्यों कि बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिसमे सब की राय मुझसे बिल्कुल ही अलग होती है। मैं तर्क ज्यादा नहीं कर सकती इसलिए चुप रहकर मूक दर्शक बन जाती हूँ, परन्तु मेरा मन बिचलित रहता है। हाँ अनुशासन हीनता और अन्याय मैं कदापि बर्दाश्त नहीं कर सकती उस समय मैं बिल्कुल चुप नहीं रहती, चाहे वह कोई हो और किसी के साथ हो रहा हो।   

बचपन में समानार्थक शब्द जब भी पढ़ती थी बस "नारी" पर आकर अटक जाती थी। मेरे मन में एक प्रश्न बराबर उठता -"इतने शब्द हैं नारी के फिर अबला क्यों कहते हैं"? अबला से मुझे निरीह प्राणी का एहसास होता। सोचती, जो त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाती है वह अबला कैसे हो सकती ? एक तरफ हमारे पुरानों में नारी शक्ति का जिक्र है दूसरी तरफ हमारे व्याकरण में उसी नारी के लिए अबला शब्द का प्रयोग क्यों ? पर मुझे उत्तर मिल नहीं मिल पाता । मैं अबला शब्द का प्रयोग कभी नहीं करती बल्कि अपनी सहपाठियों को भी उसके बदले कोई और शब्द लिखने का सुझाव देती ।

जब बच्चों को पढ़ाने लगी उस समय भी बच्चों को नारी के समानार्थक  शब्द में "अबला" शब्द लिखने पढ़ने नहीं देती और बड़े ही प्यार और चालाकी से नारी के दूसरे दूसरे शब्द लिखवा देती । मालूम नहीं क्यों अबला शब्द मुझे गाली सा लगता था और अब भी लगता है।

1908 ई. में अमेरिका की कामकाजी महिलाएं अपने अधिकार की मांग को लेकर सडकों पर उतर आईं। 1909 ई. में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने उनकी मांगों के साथ राष्ट्रीय महिला दिवस की भी घोषणा की। 1911 ई. में इसे ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का रूप दे दिया गया और तब से ८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाई जा रही है। परन्तु कुछ वर्षों से "दिवस" मनाना फैशन बन गया है। क्या साल में एक दिन याद कर लेना लम्बी लम्बी घोषणा करना ही सम्मान होता है ? किसी को विशेष दिन पर याद करना या उसे उस दिन सम्मान देना बुरी बात नहीं है। बुरा तो तब लगता है जब विशेष दिनों पर ही मात्र आडंबर के साथ सम्मान देने का ढोंग किया जाता हो।  सम्मान बोलकर देने की वस्तु नहीं है सम्मान तो मन से होता है क्रिया कलाप में होता है। क्या एक दिन महिला दिवस मना लेने से महिलाओं का सम्मान हो जाता है ? 

हर महिला दिवस पर महिलाओं के लिए आरक्षण की बात होती है कुछेक सम्मान का आयोजन। साल के बाक़ी दिन हर क्षेत्र में अब भी न वह सम्मान न वह बराबरी मिल पाता है जिसकी वह हकदार है या जो दिवस मनाते वक्त कही जाती है। कहने को तो आज सभी कहते हैं "नारी पुरुषों से किसी भी चीज़ में कम नहीं हैं". परन्तु नारी पुरुष से कम बेसी की चर्चा जबतक होती रहेगी तबतक नारी की स्थिति में बदलाव नहीं आ सकता।  

नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी। यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी आरक्षण की जरूरत क्यों ? आरक्षण शब्द ही कमजोरी का एहसास दिलाता है आज एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है। क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे?  हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की। जिस दिन हमें आरक्षण की जरूरत महसूस होना बंद हो जाएगा  वही दिन महिला दिवस होगा। 

बर्फानी तूफ़ान नीमो के बाद जन जीवन.

 बर्फ से ढके पेड़ पौधे 
 प्राकृतिक आपदा पर तो किसी का वश नहीं होता। परन्तु जब बच्चे या प्रिय जन साथ में न होकर हजारों मील दूर या दूसरे देश में हों तो किसी भी तरह के आपदा के आने पर चिंता होना स्वाभाविक है। अमेरिका के न्यू जर्सी में मेरा छोटा बेटा रहता है जहाँ  से मैनहैटन (न्यू यार्क) जाने में आधे घंटा लगता है। वैसे मैं साल में एकबार 3-4 महीने के लिए अमेरिका आती हूँ। जब भारत में रहती हूँ तो अमेरिका में होने वाले आपदा आने पर चिंतित हो उठती हूँ। हर पल फोन और नेट से बेटे से समाचार लेती रहती हूँ। तूफ़ान सैंडी में मुझे छोड़ मेरा पूरा परिवार ही न्यू यार्क में ही था मेरा पोता तो उस समय मात्र 3 महीने का था। 

न्यू यार्क शहर काम पर जाने वाले हजारों लोगों के यातायात का मुख्य साधन ट्रेन है। सैंडी ने ऐसी तबाही मचाई कि सारे स्टेशनों में पानी घुस गया। स्थिति फिर से सामान्य होने में कई दिन लग गए। मौसम विभाग के अग्रिम सूचना के बावजूद तूफ़ान सैंडी ने अमेरिका के कुछ भागों को भारी क्षति पहुंचाई थी। खासकर तटीय इलाके में तो कई लोगों के पूरा का पूरा घर ही तबाह हो गया। जहाँ तहाँ पेड़ गिर जाने की वजह से बिजली की आपूर्ति में काफी दिक्कत हुई। उस समय मैं हर पल की खबर लेने के लिए या तो नेट पर रहती थी या फिर फ़ोन से बातें कर मन को ढाढस मिलता। 

आजकल मैं अमेरिका में हूँ गुरूवार रात से शुक्रवार सारा दिन और रात बर्फानी तूफ़ान ने अमेरिका के उत्तरी भाग में तबाही मचाई। अमेरिका के मौसम विभाग ने ज्यों ही बर्फानी तूफ़ान नीमो के आने की अग्रिम सूचना देना शुरू किया  रोड आइलैंड , कनेक्टिकट, मैसाचुसेट्स, न्यू हम्शायर  एवं न्यू यॉर्क में शुक्रवार को आपात स्थिति घोषित कर दिया गया। लोगों को अपने अपने जरूरत के सामान रखने और घरों से बाहर न निकालने की हिदायत भी दे दी गई। समाचार एवं नेट पर हर जगह चेतावनी आने लगी। बर्फबारी शुरू होने से पहले ही एहतियात के तौर पर करीब 4700 उड़ाने रद्द कर दी गई। 

घर के पीछे का जंगल 
कई वर्षों से मेरा अमेरिका आना जाना होता रहा है अब मैं भी यहाँ आकर मैं रम जाती हूँ। जैसे ही सुनी बर्फानी तूफ़ान नीमो आने वाला है मैं भी यहाँ के लोगों की तरह नेट और समाचार से जुड़ गयी और पल पल की जानकारी लेती रही। न्यू यार्क और न्यू जर्सी के लिए भी बार बार चेतावनी आ रही थी कि 1,5 फीट से 2 फीट तक बर्फबारी हो सकती है और शुक्रवार रात 9 बजे से बर्फ़बारी बर्फीली तूफ़ान का रूप ले लेगा। मेरे बेटे ने भी जरूरत का सामान समय पर ले आया और हम सभी सामान्य दिनों की तरह अपने अपने कामो में लग गए परन्तु मौसम विभाग के समाचार एवं चेतावनी देखते रहे। अचानक समाचार आने लगा कि अब तूफ़ान "नीमो" न्यू जर्सी के बगल से चला जायेगा यानि बर्फबारी तो होगी पर तूफ़ान का खतरा टल गया हम सभी को थोड़ी राहत तो मिली। 

मैं भी अमेरिका के मौसम का मिजाज थोड़ा बहुत समझने लगी हूँ। गुरूवार को सुबह से ही बिलकुल शांत वातावरण देखकर अनुमान हो गया कि बर्फबारी होना ही होना है। शाम होते होते बर्फ़बारी शुरू हो गई। सुबह तक कम से कम 3 इंच तक बर्फ जमा हो गया शुक्रवार सारा दिन बर्फ़बारी होती रही शाम को काफी तेज हवा की वजह से तापमान काफी कम हो गया। सुबह 4 बजे एक प्रकार की मशीन की आवाज से नींद खुली। खिड़की से बाहर झांकी तो  तो करीब 2 फुट बर्फ की चादर चारों और बिछी थी। चारों और बर्फ ही बर्फ था। मैं भी पहली बार इतनी बर्फबारी देखी थी। मैं एक बार बर्फ से बिछी अद्भुत दृश्य को देखती और एक बार बड़ा सा बर्फ काटने की मशीन सडक के एक छोड़ से दूसरे छोड़ आ जा रही थी उसे। पर वह भी प्रतीत होता था मानो बर्फ के ऊपर ही ऊपर जा रहा हो। कई घंटे के बाद सड़क नजर आने लगा। मैं अपने कमरे से उतरकर नीचे गई, घर के पीछे जंगल है। जंगल देख मैं वहीँ खडी हो देखती रह गई क्या दृश्य था , पूरे जंगल में बर्फ की मोई परत और बीच बीच में पत्ता विहीन पेड़ जिनपर बर्फ गिरे हुए थे।  

बर्फ हटाने के बाद सड़क 

आम दिनों की तरह हम फिरसे नेट पर एवं टीवी में समाचार देखने लगे।  बोस्टन और एक दो शहर और पर तूफ़ान का सबसे ज्यादा असर था। कुछ इलाके की बिजली ऐतिहात के तौर पर काट दी गयी थी। आपदा पर किसी का वश नही होता है। वश में होता है सतर्कता और आपदा के बाद एक दूसरे या पीड़ितों की सहायता करना। यहाँ आपात की घोषणा होते ही  मौलिक सुविधाओं से सम्बंधित विभाग और तंत्र  की  सतर्कता एवं तत्परता सच में प्रशंसनीय है। बर्फ के अम्बार लगे हैं जिन्हें गलने में कम से कम महीना दिन तो लगेगा ही, परन्तु सड़कें पूर्ववत साफ़ सुथरी। जन जीवन सामान्य होने में बिलकुल ही समय नहीं लगा। 

आजादी हमें खैरात में नहीं मिली है!!


 "आजादी हमें खैरात में नहीं मिली है उसके लिए हमारे देश के अनेको देश भक्तों ने जान की बाजी लगाकर देश पर मर मिटने की कसम खाई और शहीद हुए. उनके वर्षों की तपस्या और बलिदान से हमने आजादी पाई है ". झंडा के सामने यह हर वर्ष ऐसे बोला जाता है मानो हम प्रतिज्ञा कर रहे हों कि इस देश की खातिर हम भी अपने उन शहीदों की तरह मर मिट सकते हैं जिन्होंने कई सौ वर्षों की गुलामी से हमें आजादी दिलाई है. पर वह भी मात्र औपचारिकता ही होती है. क्या ये वाक्य बोलते समय उनके ह्रदय में जरा भी देश पर मर मिटने की चाहत होती है ?  हर वर्ष जो भी झंडोत्तोलन करने आता है, पर उन्हें  यह औपचारिकता निभाना होता है इसलिए कह देते हैं.

हम कहते हैं अंग्रेजों कि नीति थी "divide and rule" पर क्या आजके हमारे नेताओं की भी यही नीति नहीं है? वे चाहते हैं कि हमारे युवा वर्ग दिग्भ्रमित रहें और जाति, राज्य, धर्म,भाषा लेकर इतना ज्यादा आपस में उलझे रहें कि उन्हें यह समझने की फुर्सत ही न हो कि वे सोचें कि हमारे देश के नेता क्या कर रहे हैं. सही मायने में हमारा भला कौन कर सकता है देश का भला कौन चाहता है? वैसे मेरी नज़र में एक भी नेता या पार्टी आजके दिन में ऐसा नहीं है जो खुद की भलाई से ऊपर उठकर हमरा, हमारे बच्चों का या देश का भला चाहे. 

आज आज़ादी के ६५ साल बाद भी क्या हम आजाद हैं ? और यदि नहीं हैं तो उसका जिम्मेदार कौन है ? क्या हम खुद उसके जिम्मेदार नहीं हैं ? यों तो लोग कहते हैं हमारे चौथे खम्भे की अहम भूमिका होती है पर मेरे हिसाब से हमरा चौथा खम्भा हमारे देश के युवा हैं . जिन्हें उनकी जिम्मेदारियों का एहसास दिलाना होगा देश के प्रति उनकी अहम भूमिका देश को आज भी हर क्षेत्र में उंचाईयों पर ले जा सकती है. अगर वे दिग्भ्रमित न हों तो उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है. उन्हें समझना होगा कि आज के नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों उनका उद्देश्य मात्र होता है गद्दी पर बने रहें चाहे देश को बेच ही क्यों न दें. आज भी हमारा घाव भरा नहीं है और कहते हैं अंग्रेज जाते जाते हमें बांटकर चले गए. 

हमारे देश में एक बहुत बड़ी क्रान्ति आई है जिसमे युवाओं का बहुत बड़ा योगदान है या हम कह सकते हैं कि उनकी सोच का ही नतीजा है कि आज वे राज्य, जाति, धर्म भूलकर शादी कर रहे हैं. यही सोच ऐसी ही क्रांति एकबार उनके मन में आ जाए तो हमारे देश से ऐसे नेताओं का सफाया हो जायेगा जो हमें बाँटकर देश पर राज्य करना चाहते हैं. उसके लिए देश के युवाओं को एकजुट होकर क्रान्ति लाना होगा. देश को बचाने के लिए राज्य, भाषा, जाति, धर्म के भेद भाव को छोड़ एक जुट होकर कृतसंकल्प होना होगा. पर आज जब हम राज्य, भाषा, धर्म, जाति के नाम पर टुकड़े टुकड़े हो चुके हैं उसके बावजूद भी हम यदि नहीं चेते तो हमारी आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ़ नहीं करेगी. हमारे इतिहास से सभ्यता और संस्कृति का नामो निशान मिट जायेगा. 

हम कबतक क़ानून और न्यायपालिका को पूजते रहेंगे ?


हमारे देश की न्याय पालिका कितनी निकम्मी है वह हम सबको मालूम है.  पैसा और ताकत के बलपर यहाँ कितने भी बड़े जुर्म से बाहर निकला जा सकता है.  बड़े से बड़ा जुर्म करके भी गुनहगार आराम से बरी हो जाते हैं . वहीँ बिना किसी गुनाह के किसी को सज़ा मिल जाती है. हमारा न्याय प्रणाली ऐसा है कि गुनहगार पैसे और शक्ति के बल पर या तो बच निकलता है या साबित जबतक हो पाए उसके पहले ही वह मर जाता है।

हमारे यहाँ सरकारी नौकरी में प्रावधान है कि सरकारी अधिकारी को चुनाव के समय  निर्वाचन अधिकारी बना दिया जाता है . कई ऐसे मामले होते हैं जब अधिकारियों को मांग पर तहकीकात के समय भी जाना पड़ता है. यह भी सरकारी नौकरी का एक हिस्सा होता है . अधिकारी उस समय मना नहीं कर सकते . यहाँ भी जिनकी पहुँच होती है वह तो इन सब झंझटों में नहीं पड़ते क्यों कि झंझट सिर्फ  जाने का नहीं है उसके बाद सालों साल पिसते रहो बिना किसी गलती के गवाही देते रहो. 

ऐसी ही कहानी एक  ईमानदार केन्द्रीय सरकारी अफसर श्री एस एन झा की है . जिन्होंने अपनी पूरी उम्र ईमानदारी से नौकरी की . समय का पाबंद, पांच दस  मिनट भी देरी से दफ्तर जाना उनके सिद्धांत के खिलाफ था. जहाँ भी सरकार ने भेजा सभी जगह बिना किसी शिकवा शिकायत के परिवार ले चले जाते कोई पैरवी का तो सवाल ही नहीं था. आज  82 की उम्र में उन्हें सिर्फ इसलिए अदालत के चक्कर लगाने पड़  रहे हैं क्योंकि वो एक सरकारी तहकीकात में सरकारी मांग पर सीबीआई के एक छापे में मौजूद थे. 

यह मामला सन 1986 की है, धनबाद में  बीसीसीएल के किसी कर्मचारी ने शिकायत की थी. एक  बीसीसीएल का डॉक्टर उससे ऑपरेशन करने का पैसा मांग रहा था. सीबीआई ने छापा मारा और रंगे हाथ  बीसीसीएल कर्मचारी से डॉक्टर को घूस लेते पकड़ लिया. उस  तहकीकात में झा साहब भी सरकार की मांग पर मौजूद थे. डॉक्टर पर मामला दर्ज हुआ  और पहली बार उस मामले की सुनवाई 2009 में हुई. उस समय तक झा साहब को अवकाश प्राप्त किये 21-22 वर्ष हो गए थे. उस दिन से आजतक  बेचारे अदालत की चक्कर गवाही देने के लिए लगा रहे हैं. इतना ही नहीं हर बार अदालत ही नहीं शहर भी बदल जाता है. बेचारे 82 की उम्र में हर बार ईमानदारी से अदालत समय पर पहुँच जाते हैं पर अभी तक मात्र एक बार ही गवाही दर्ज हुआ है. हर बार सम्मन  आता है तो यही कहते हैं इस बार यह मामला ख़त्म हो जायेगा . मैंने कोई गलती तो नहीं की बस वहां मौजूद था इसलिए सरकार की और से गवाही तो देनी होगी मेरी जिम्मेदारी होती है। उनके बेटे बेटियां उन्हें समझाकर थक गए पर वो मानते ही नहीं, कहते हैं यह भी सरकार और देश के प्रति जिम्मेदारी है निभाना तो पड़ेगा. अब उन्हें दिखता भी कम है सुनाई कम पड़ता है . पर सरकार की निति और न्यायपालिका मालूम नहीं उन्हें उनकी इमानदारी की यह कैसी सजा दे रही है .

यह एक ऐसी कहानी है जो हमारे देश के लिए नयी बात तो नहीं परन्तु मैं जब सुनी तो मुझे इस देश की जनता पर खुद पर तरस आने लगी कि आखिर हम कबतक ऐसी कानून और न्याय पालिका को पूजते रहेंगे. क्या कभी वह दिन आएगा जब हमारे देश में भी सच्चा न्याय मिलेगा और बेकसूरों को परेशान  नहीं किया जायेगा . 


हमारे देश की जनता कब जागेगी !


 जमशेदपुर भी अब बाकी शहरों की तरह असुरक्षित हो गया है. आये दिन हत्या, अपहरण की वारदातें सुनने को मिलती है. कभी डॉक्टरों की हत्या तो कभी बैंक अधिकारी का अपहरण.

अभी हाल में ही एक बैंक के अधिकारी का अपहरण हो गया, जिसे अपहरणकर्ता ने बाद में फिरौती की रकम वसूल कर छोड़ दिया.

बैंक अधिकारी घर जाने के लिए निकले ही थे कि किसी ने गाड़ी रोक जबरदस्ती गाड़ी में सवार हो गया और उन्हें जंगल की और ले गया. जंगल में ले जाने के बाद अपहरणकर्ता ने ५० हज़ार रकम की मांग रखी और कहा उसी समय मंगवाकर दे. पत्नी से फ़ोन द्वारा पैसे मंगवाने की जिद्द की तो अधिकारी को उस सुनसान जंगल में कुछ नहीं सूझा और उसने पत्नी को फ़ोन कर दी कि उसे ५० हज़ार की अभी तुरंत जरूरत है किसी से मांगकर भेजे. पत्नी के पूछने पर कि पैसा कौन ले जायेगा .....अपहरण कर्ताओं ने उस अधिकारी से कह्वाया उसके बैंक का एक आदमी जाकर ले आयेगा. पर पत्नी से ५० हज़ार का इंतजाम नहीं हो पाया. अब उस अधिकारी को अपहरणकर्ता ने जबरदस्ती अपने दोस्तों और परिचितों को फ़ोन द्वारा रुपैये मंगवाने की धमकी दी.

अधिकारी क्या करता उन्होंने बारी बारी अपने दोस्तों और सहकर्मियों को फ़ोन से पैसे का इंतजाम करने कहता. अंत में एक सहकर्मी ने इंतज़ाम किया और उसे उनके खाते में डाल दिया. जिसकी पुष्टि हो गयी तो अपहरणकर्ता अधिकारी को ले गया और ATM से रुपैये निकलवाकर ले लेने के पश्चात अधिकारी को घर जाने की अनुमति दे दी. कुछ दिनों बाद फिर उसका फ़ोन आया और ५० हज़ार की मांग फिर उस अपहरणकर्ता ने रखी और साथ में धमकी भी कि अगर पुलिस को बताया तो बीवी बचे को उठवा लेगा. कोई चारा नहीं देख उस अधिकारी ने फिर ५० हज़ार उसे दे दिया, पर इस बार अपहरण कर्ता को अपने इलाके में ही बुलाकर पैसे दी. साथ ही पैसे देने के बाद पुलिस में खबर कर दी और एफआईआर भी दर्ज करवा दिया.

दरअसल अपहरणकर्ता को बैंक अधिकारी पहचानता है. वह कभी बैंक से क़र्ज़ लेने के सिलसिले में अधिकारी के पास आया था. क़र्ज़ के नियमो के अनुसार उसे क़र्ज़ नहीं मिल पाया था. इस वारदात के बाद अधिकारी ने पुलिस को सारी बातें बता दी थी और पुलिस ने आश्वासन भी दिया था कि अपराधी अवश्य पकड़ा जायेगा. परन्तु एक महीने से ऊपर हो गया है अबतक अपराधी नहीं पकड़ाया है. पुलिस अधिकारी आश्वासन तो देते हैं.... पर अपहरणकर्ता अब फिर से पैसे कि मांग कर रहा है. पुलिस कहती है वह अपराधी फरार है...पुलिस उसे ढूंढ रही है.

दहशत में पूरा परिवार है... अब उनके पास विकल्प क्या है ? क्या हमारी निकम्मी पुलिस सक्षम नहीं है कि अपराधी को ढूढ़ निकाले या यहाँ भी अपराधी ने पैसे से मुंह बंद कर दिया है? कुछ वर्ष पहले जिस शहर की शांति से प्रभावित होकर कई लोग यहीं बस जाते थे आज वही शहर बिलकुल असुरक्षित होता जा रहा है.

एक तरफ अतिक्रमण को हटाया जा रहा है दूसरी तरफ नेताओं के इशारे पर उनके आदमी अतिक्रमण कर रहे हैं. हमारे देश की जनता कब जागेगी ?

अबला

इस बीच अस्वस्थता काम की व्यस्तता और मानसिक तनाव की वजह से काफी कम लिख  पाई हूँ  हाँ, समाचार से दूरी नहीं बना पाई। अपने स्वभाव वश मैं छोटी सी छोटी बातों को गहराई से सोचती हूँ और कई बार ऐसा होता है कि मैं उसमे उलझकर रह जाती हूँ  क्यों कि बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिसमे सब की राय मुझसे बिल्कुल ही अलग होता है। मैं तर्क ज्यादा नहीं कर सकती इसलिए चुप रहकर मूक दर्शक बन जाती हूँ, परन्तु मेरा मन बिचलित रहता है हाँ अनुशासन हीनता और अन्याय मैं कदापि बर्दाश्त नहीं कर सकती उस समय मैं बिल्कुल चुप नहीं रहती, चाहे वह कोई हो और किसी के साथ हो रहा हो।   


बचपन में समानार्थक शब्द जब भी पढ़ती थी बस "नारी" पर आकर अटक जाती थी। मेरे मन में एक प्रश्न बराबर उठता -"इतने शब्द हैं नारी के फिर अबला क्यों कहते हैं"? अबला से मुझे निरीह प्राणी का एहसास होता। सोचती, जो त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाती है वह अबला कैसे हो सकती ? एक तरफ हमारे पुरानों में नारी शक्ति का जिक्र है दूसरी तरफ हमारे व्याकरण में उसी नारी के लिए अबला शब्द का प्रयोग क्यों ? पर मुझे उत्तर मिल नहीं मिल पाता । मैं अबला शब्द का प्रयोग कभी नहीं करती बल्कि अपनी सहपाठियों को भी उसके बदले कोई और शब्द लिखने का सुझाव देती ।


जब बच्चों को पढ़ाने लगी उस समय भी बच्चों को नारी के समानार्थक  शब्द में "अबला" शब्द लिखने पढ़ने नहीं देती और बड़े ही प्यार और चालाकी से नारी के दूसरे दूसरे शब्द लिखवा देती । मालूम नहीं क्यों अबला शब्द मुझे गाली सा लगता था और अब भी लगता है।  


आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ । इन सबके बावजूद उसके स्वाभाविक रूप में कोई बदलाव नहीं आया है । पर आज की नारी कुंठा ग्रसित हैं, जो उन्हें ऊपर उठाने में बाधक हो सकता है । हमारे साथ कल क्या हुआ उस विषय में सोचने के बदले यदि हम अपने आज के बारे में सोचें तो हमारा आत्म विश्वास और अधिक बढेगा । बीता हुआ कल तो हमें कमजोर बनाता है , हमारे मन में आक्रोश ,कुंठा , बदले की भावना को जन्म देता है । फिर क्यों हम अपने अच्छे बुरे की तुलना कल से करें और बात बात में नीचा दिखाने की कोशिश करें। जरूरी नहीं कि उंगली उठाने से ही गल्ती का एहसास हो । हमरा ह्रदय हमारे हर अच्छे बुरे की गवाही देता है , धैर्य भी नारी का एक रूप है। 


आज एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है । यहाँ भी अबला का एहसास होता है । क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे? 

नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी  यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी अबला शब्द व्याकरण से नहीं निकल पाया है और तब तक नहीं निकल पायेगा जबतक हम नीचा दिखाने की कोशिश करते रहेंगे ,आरक्षण की मांग करते रहेंगे । हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की और तब "नारी" शब्द का पर्यायवाची "अबला" हमारे व्याकरण से निकल पायेगा ।