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झलक दिखाने आ जाओ

'झलक दिखाने आ जाओ'

पलभर को कहीं गफलत ही सही, चेहरा तो दिखाने आ जाओ
तुम बुझे हुए नयनों के इन पलकों में समाने आ जाओ

प्रिय रुठे क्यों हो तुम अब तक बोलो कैसी है मजबूरी
ये  बेचैनी मैं कासे कहूँ एहसास जगाने आ जाओ

हो दूर मगर तुम जुदा नहीं आंसूं का साथ हुआ अपना
तन्हाई संग-संग रहती है पल भर को सताने आ जाओ

इस पार हैं हम उस पार हो तुम फिर मिलना कैसे हो संभव
सपनों में यकीं है मुझको तुम इक झलक दिखाने आ जाओ

दिन भर तो प्रतीक्षा कुसुम करे फिर शाम ढले वो मुरझाए
भंवरों की गुंजन यही कहे सपनों को सजाने आ जाओ

-कुसुम ठाकर-

वह रात मुझे डराती है

"वह रात मुझे डराती है "

वह रात मुझे डराती है 
जब याद तुम्हारी आती है 

दुःख की बातें याद नहीं
सुख सोच बहुत तडपाती है

व्याकुल हो जब भी ढूढूँ मैं
लगता मुझे चिढाती है

जीवन हो जीने की कला
यह सोच मुझे भरमाती है

साथी मुझसे छूटा जबसे
सपनो में सहलाती है

-कुसुम ठाकुर-

चलने का बहाना ढूँढ लिया

"चलने का बहाना ढूँढ लिया"

चलने की हो ख्वाहिश साथ अगर 
चलने का बहाना ढूंढ लिया 

यूं रहते थे दिल के पास मगर 
तसरीह का बहाना ढूंढ लिया

मुड़कर भी जो देखूं मुमकिन नहीं
आरज़ू थी जो मुद्दत से ढूंढ लिया

तसव्वुर में बैठे थे शिद्दत सही 
खलिश को छुपाना ढूंढ लिया 

कहने को मुझे हर ख़ुशी है मिली 
हँसने का बहाना ढूंढ लिया 

- कुसुम ठाकुर -

दर्द इस कदर दिया

"दर्द इस कदर दिया "

यूँ नसीब ने तो प्यारा हमसफ़र दिया 
मेरी जिंदगी में ऐतवार भर दिया

दर्द पाया फिर भी लगता खुश नसीब हूँ 
जाने जादू क्या उसने ऐसा कर दिया

वैसे जिन्दगी में कम कहाँ है उलझनें 
जाते जाते भी न चैन इक पहर दिया

ये तो जाना हमसफ़र का भी सफ़र वहीं
वो हसीन पल भी सपनों में है भर दिया  

कहना चाहा जो कुसुम ने आज कह दिया 
अपनी पंखुड़ी भी दर्द इस कदर दिया 

-कुसुम ठाकुर-

मन में झंझावात


मन में झंझावात"

दिल के तहखाने में बीता तनहा सारी रात 
कहती क्यों सावन हरजाई लाई है सौगात

स्नेह का सागर भरा हुआ है, क्यूँ मन में अवसाद 
किसको बोलूँ, रूठूं कैसे,  मन में झंझावात 

तिल-तिल दीपक सा जलता मन, लिए स्नेह की आस 
गुजरी यादें, धुमिल हो गईं, इतनी रही बिसात 

समझूं कैसे देगा निशि-दिन, दिल में चोट हजार
प्रेम की भाषा वे बोले पर, ना समझे जज्बात  

आता मौसम जाता मौसम, जीवन में सौ बार 
कुसुम मौसमी होता क्यूँ, है, समझ न आयी बात 

-कुसुम ठाकुर-

चाहत तुम्हारी फिर से


(कुछ दिन कुछ पल ऐसे होते हैं जो चाहकर भी भूला नहीं जा सकता, उसी दिन की याद में मेरी यह रचना जिसे लोगों ने भुला दिया।)

"चाहत तुम्हारी फिर से"

चाहत तुम्हारी फिर से मुझको सजा दिया  
सोई हुई थी आशा उसको जगा दिया

कहने को जब नहीं थे, सोहबत नसीब थी 
खोजा जहाँ मैं दिल से, चेहरा दिखा दिया 

ढूँढ़े जिसे निगाहें उजडा वही चमन था 
देखा गुलाब सूखा लगता चिढ़ा दिया 

चाहत किसे कहेंगे, तबतक समझ नही थी 
जब चाहने लगे तो उसने रुला दिया 

नव कोपलों के संग में कलियाँ खिले कुसुम की
खुशबू, पराग सब कुछ तुम पर लुटा दिया 

-कुसुम ठाकुर-

यूँ मुहब्बत कहूँ हो इबादत मगर


"यूँ मुहब्बत कहूँ हो इबादत मगर"

है कठिन फिर भी सच को कहोगे अगर 
जिंदगी का सफ़र ना सिफर हो डगर  

दिल की बेताबियाँ और ऐसी तड़प  
यूँ मुहब्बत कहूँ हो इबादत मगर 

आज कहने को जब, तुम नहीं पास में 
क्या है उलझन कहूँ जाने सारा नगर

भाग्य रूठे हों तुमसे तो फिर क्या कहें 
ये इनायत कहो हमसफ़र हो अगर

सारी खुशियाँ मिले याद आए कुसुम 
रूठा कैसे कहूं दूर हो भी मगर 

-कुसुम ठाकुर-

मन का भेद पपीहा खोले


"मन का भेद पपीहा खोले"

जिस माली ने सींचा अबतक सुबक सुबक वह रोता है
पाल पोसकर बड़ा किया हो उसको एक दिन खोता है  

धूप हवा का जो ख़याल रख पंखुड़ियाँ है नित गिनता
उस उपवन में चाहत से क्या पतझड़ में कुछ होता है  

नेमत उसकी है प्रकृति फिर छेड़ छाड़ क्यों है करता
फूल खिले काँटों में रहकर फिर कांटे तू क्यों बोता है  

शुष्क टहनियों पर नव पल्लव, कलियाँ भी हैं मुस्काती
मधुमास के आते ही मधुप फूलों से अमृत ढ़ोता है  

कुहू कुहू कोयल जब बोले मन का भेद पपीहा खोले
हर्षित कुसुम भंवरों का गुन गुन भी सुहावना होता है  

-कुसुम ठाकुर-


सह सको मुमकिन नहीं.


"सह सको मुमकिन नहीं"

 है नशा ऐसी कहो क्या सह सको मुमकिन नहीं
सो रहे क्यों अब तो जागो सह सको मुमकिन नहीं

हाथ अब कुर्सी जो आई, धुन अरजने की लगी
मृग मरीचिका जो कहें , सह सको मुमकिन नहीं

 सच दिखा सकते मगर आँखें वो मूंदे हैं विवस
बिखर गए सपने अधूरे, सह सको मुमकिन नहीं

कर(टैक्स) पसीने से दिया जो रह गया हो वह ठगा
अपनी मनमानी करे तुम सह सको मुमकिन नहीं

नहीं खून मांगे देश तुमसे बात अपने दिल की सुनो
 बेड़ियों में कुसुम सपना, सह सको मुमकिन नहीं

-कुसुम ठाकुर- 

कहती है नैना हसूँ अब मैं कैसे.


"कहती है नैना, हसूँ अब मैं कैसे"

बयाँ हाले दिल का करूँ अब मैं कैसे
खलिश को छुपाकर रहूँ अब मैं कैसे 

बुझी कब ख्वाहिश नहीं इल्म मुझको
है तन्हाइयाँ भी सहूँ अब मैं कैसे 

चिलमन से देखी बहारों को जाते
हिले होठ मेरे कहूँ अब मैं कैसे 

हो उल्फत की चाहत ये मुमकिन नहीं
जो दूर चेहरा पढूँ अब मैं कैसे 

 शोखी कुसुम की है पहले से कम क्यूँ 
  कहती है नैना, हसूँ अब मैं कैसे 

-कुसुम ठाकुर-

और एक प्यास है मन


मेरी आज की रचना उस ख़ास व्यक्ति के लिए जिसने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं मन में आये भावों को आज शब्दों में अभिव्यक्त कर सकूँ .

"और एक प्यास है मन"

ऐ चाँद तुमसे पूछूं, फिर क्यूँ उदास है मन
कहने को दूर तन से, पर उनके पास है मन

किस हाल में है प्रीतम, सन्देश कैसे भेजूं
दिल में तड़प मिलन की, और एक प्यास है मन

पूनम की लम्बी रातें, यादों में उनकी बातें
छू जातीं उनकी नज़्में, मेरा जो ख़ास है मन

अब रागनी कहाँ वो, जो गीत गुनगुनाऊं
यादों में उनका आना, मुखरित सुहास है मन

आँखें छलक रहीं हैं, पर मुस्कुराता चेहरा
कुम्हलाये ना कुसुम का, हरदम सुवास है मन

-कुसुम ठाकुर-

धोखा सगा दिया


"धोखा सगा दिया"

कसूर था क्या मेरा, फिर क्यूँ  सजा दिया
सोई थी आस क्यों फिर, उसको जगा दिया 

कहने को कुछ न था, सोहबत नसीब थी 
जब साथ ढूँढती हूँ तनहा बना दिया 

जो ढूँढती निगाहें, उजड़ा हुआ चमन है
सूखा हुआ गुलाब जैसे, मुझको चिढ़ा दिया 

चाहत किसे कहें हम, समझी नही थी तब 
चाहत जगी तो यारों, किस्मत दगा दिया 

मझधार में कुसुम है, पतवार थामकर 
अब जाऊँगी किधर को , धोखा सगा दिया

- कुसुम ठाकुर- 



वक्त भी कब वक्त देता


"वक्त भी कब वक्त देता" 

आज कहने को बहुत, जो अश्क में ही बह गए 
अपनी खुशियाँ कह न पाऊँ, उलझनों में रह गए  

गम को सींचें क्यों भला, जब दूर थीं खुशियाँ खड़ीं 
वक्त तो अब है मेरा जो, सारे गम को सह गए 

वक्त भी कब वक्त देता, मात दो उस वक्त को 
तिश्नगी ऐसी कि अरमां, वक्त के संग ढह गए  

डूबना हो याद में या फिर किनारे बैठकर 
स्निग्ध-सी मुस्कान में ही भाव सारे कह गए

इक समर्पण प्यार है, या खेल फिर शह मात का 
दूर ये न हो कुसुम से, जैसे कह कर वह गए

-कुसुम ठाकुर- 
  



शब्दार्थ :
तिशनगी - अभिलाषा, इच्छा, प्यास , तृष्णा 

ऐसा भी मन पावन देखा



ऐसा भी मन पावन देखा "

  कैसे कह दूँ ख्वाब न देखा
आज करूँ कैसे अनदेखा


न वो बातें, न वो रिश्ते
फिर भी लगता है मन देखा


तन्हाई भी साथ रहे जब
ऐसा क्यूँ लगता घन देखा


साथ चले थे बरसों पहले 
ऐसा भी मन पावन देखा


हरियाली का पता नहीं है
किस्मत से वह सावन देखा  


-कुसुम ठाकुर- 

नैनो से बरसात क्यों


(आज की रचना उस प्रिय व्यक्ति के लिए है जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं अपने भावों को लिख पाऊं)

नैन से बरसात क्यों?
***************
कह सकूं मैं आज फिर से ना कहूँ वो बात क्यों?
आज फिर छलकीं हैं, खुशियाँ नैन से बरसात क्यों?

बात कर इंसानियत की पहले तू इंसान बन
तुम ख़ुशी गर दे ना पाए बेवजह आघात क्यों?

गीत विस्मृत गुनगुनाऊं, अब भी वह अनुराग है
अपने सुर में गीत वो गाऊँ बदल जज्बात क्यों?

रिश्ते होते जो भी नाजुक बाँध उसको प्यार से
जिन्दगी कितने दिनों की बात से फिर घात क्यों?

सींचता है सोच माली गुल से ही गुलजार हो
जो कुसुम खुशबू लुटाए, तोड़ते बेबात क्यों?

© कुसुम ठाकुर 

सपनो में बस जाते हो


"सपनो में बस जाते हो"

कुछ बरसों का साथ रहा पर याद बहुत तुम आते हो
जानूँ वे पल फिर न आए, तुम सपनो में बस जाते हो

वे क्षण कितने प्यारे होते नैन जहाँ सब कह जाते
इक दूजे को समझ गए तो खुद को क्यूँ भरमाते हो

साथ नहीं मन का छूटा, बस आँखें न मिल पातीं हैं
मीत भिज्ञ हो कारण से तुम प्रश्न नया क्यों लाते हो

न बसंत न मेघ रिझाता, न भंवरों के गीत मुझे
ताल तलैया न सूखे क्यूँ अश्क से प्यास बुझाते हो

कला है जीना गर जीवन तो, कलाकार प्रेमी माला
कुसुम के सपनों को गीतों से आकर रोज सजाते हो

-कुसुम ठाकुर-   

किस तरह


"किस तरह"

तुमको चाहा है मगर तुमको बताऊँ किस तरह 
 आँखों में जुबाँ नहीं तो सुनाऊँ किस तरह  

 भूलकर दर्द जुदाई का ना मिलती खुशियाँ 
 जफ़ा के आसुओं को अब बहाऊँ  किस तरह

 भूलना है कठिन बहुत जो पल थे यादों के 
 वो सभी यादें अभी दिल से मिटाऊँ  किस तरह

  अगर नहीं है बेबसी तो बेड़ियाँ कैसी 
  वफ़ा की चाहतें जो दिल में निभाऊँ किस तरह

 हर कदम साथ हो कुसुम की ख्वाहिश इतनी 
 मगर अकेले अब कदम को बढाऊँ  किस तरह

-कुसुम ठाकुर- 

हरएक आँख में नमी


"हरएक आँख में नमी"


लगे अमन की कमी इस खूबसूरत जहाँ में
बँटी हुई क्यों जमीं  इस खूबसूरत जहाँ में

कर्म आधार था जीने का कैसे जाति बनी 
हरएक आँख में नमी इस खूबसूरत जहाँ में

जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों  
गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में

सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर 
भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में

यूँ तो मालिक सभी का एक नाम कुछ भी दे दो  
कुसुम बने न मौसमी इस खूबसूरत जहाँ में

-कुसुम ठाकुर-

जो कह न सको तो


"जो कह न सको तो"

 वो भी कैसा प्यार जो कह न सको तो 
दिल में उठे बयार जो कह न सको तो

यूँ दूरियाँ सही पर दिल के करीब है जो 
मिलने का इंतजार जो कह न सको तो 

लम्बे सफर के सँग ही मजबूरियाँ बहुत 
आयेगा क्या करार जो कह न सको तो 

क्या प्यार रह सका है वश में किसी के   
 होते हैं दिल पे वार जो कह न सको तो 

दिल में उसे बसाया जो स्वप्न था कुसुम का 
दीदार में है प्यार जो कह न सको तो 

- कुसुम ठाकुर-

नहीं है प्रेम की सीमा

"नहीं है प्रेम की सीमा"

छवि बसती जो नैनों में उसे झुठलाया नहीं जाता
प्रेम का पाश बंधने पर उसे सुलझाया नहीं जाता

डूब जाए अगर प्रेमी  झील सी गहरी आँखों में
नयन चार जब हो जाए तो शरमाया नहीं जाता

विकलता इंतजारी में धैर्य की क्या बने सीमा
मिलन को प्रेमी जब आतुर उसे तड़पाया नहीं जाता

समर्पण भाव से जब है झिझक फिर छोड़ना लाजिम
ख़ुशी और गम ह्रदय में जब उसे बिसराया नहीं जाता

नहीं है प्रेम की सीमा निहित हो भाव कोमल सा 
कुसुम कोमल उसे काँटों से सहलाया नहीं जाता 

-कुसुम ठाकुर-