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मैं न उसमे बही सही


"मैं  उसमे बही सही"

मैंने मन की कही सही 
जो सोचा वह सही-सही 

भूली बिसरी यादें फिर भी 
आज कहूँ न रही सही 

 कितना भी दिल को समझाऊँ  
आँख हुआ नम यही सही 

वह रूठा न जाने कब से 
प्यार अलग सा वही सही 

रंग अजब दुनिया की देखी 
मैं न उसमे बही सही 

- कुसुम ठाकुर- 


न तुम्हें देखा मैं ने , न तुमने मुझको

"न तुम्हें देखा मैं ने , न तुमने मुझको" 

न तुम्हें देखा मैं ने , न तुमने मुझको  
फिर कैसी ये प्रीत, बतलाऊँ किसको?

लगी कैसी लगन, रहूँ मैं यूँ मगन 
धरूँ ध्यान किसीका , पाऊँ मैं तुझको

क्या है तुम में वो, बात जपूँ दिन रात
कहूँ कैसे न मैं, समझूँ मैं तुमको

कहो तुम जो वही, लगे मुझको सही
क्यों न करूँ विश्वास, है अगन मुझको

मिला जब से है मीत, रुचे सब रीत
देखूँ उसे भी न तो, जँचे उसको

- कुसुम ठाकुर - 



मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा

(आज मेरे लिए एक विशेष दिन है . मन में कुछ बातें आईं, सोची शब्दों में पिरो दूँ. )

"मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा "

हो तो दूर मगर लगे पास यदा 
हर ख़ुशी जो मिले यह आशीष सदा 

है कचोट कहूँ जो मैं हूँ न वहाँ 
है वो बात कहाँ जो कहूँ मैं यदा  

धरूँ धीर सदा फिर न पीर कमा  
लगे कुछ न सही यही रीत बदा

तप ज्यों मैं करूँ रहे क्यों न भला 
यही मन में मेरे है जो बात सदा 

कहूँ कुछ न भला लगे राज बला 
मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा 

- कुसुम ठाकुर -