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मीत सँग हो भोर

 "मीत सँग हो भोर"

जीवन जीने की कला, मिला तुम्ही से मीत।
अब आकर इस मोड़ पर, बढ़ा और भी प्रीत।।

गहरे होते भाव जो, वो‌ उतने  गंभीर।
बिनु बोले जो कह गए, नैनो की तासीर।।

ह्रदय सदा ही ढूँढता, मिलने का संयोग।
कहने को तो बहुत पर, कैसे सहूँ वियोग।।

स्त्रोत प्रेरणा का मिला, वही सृजन का हार।
दिशा दिखाया आपने, बहुत बड़ा उपकार।।

मन-दर्पण को देखकर, होते भाव विभोर।
कुसुम हृदय की कामना, मीत संग हो भोर।।

©कुसुम ठाकुर

लोकतंत्र बीमार है

 "लोकतंत्र बीमार है"

लोकतंत्र बीमार अब, है जनता में रोष।
इक दूजे पर थोपते, अपना अपना दोष।।

बातें जन-हित की करें, स्वार्थ न करते दूर।
आम लोग सच जानते, साथ चले भरपूर।। 

जागो देश निवासियों, नहीं हुई है देर  ।
बनी रहे बस एकता, दुश्मन होंगे ढेर।।

नहीं गुलामी देश में, फिर भी है संताप।
छोड़ गये अंग्रेज पर, शेष रह गयी छाप।।

प्रकृति नियम हरदम यही, होंगे ही बदलाव।
बहे हवा के संग कुसुम, उससे नहीं लगाव।।


-कुसुम ठाकुर-

सदा मीत सँग भोर

  "सदा मीत सँग भोर"


जीवन जीने की कला मिला तुम्ही से मीत 
लगता है इस मोड़ पर बढ़ा और भी प्रीत 


गहरे होते भाव जितने होते उतने ही गंभीर 
बिना शब्द ही कह गए यह नैनो की तासीर 


ह्रदय सदा ही ढूँढता मिलन हुआ संयोग 
कहने को तो है बहुत पर कैसे सहूँ वियोग 


स्त्रोत प्रेरणा का मिला कहूं न सृजनहार 
दिशा दिखाया आपने हुआ यही उपकार 


मन का दर्पण खोलकर हुए जो भाव विभोर 
कुसुम कामना सँग लिए सदा मीत सँग भोर 


-कुसुम ठाकुर-