मीत सँग हो भोर

 "मीत सँग हो भोर"

जीवन जीने की कला, मिला तुम्ही से मीत।
अब आकर इस मोड़ पर, बढ़ा और भी प्रीत।।

गहरे होते भाव जो, वो‌ उतने  गंभीर।
बिनु बोले जो कह गए, नैनो की तासीर।।

ह्रदय सदा ही ढूँढता, मिलने का संयोग।
कहने को तो बहुत पर, कैसे सहूँ वियोग।।

स्त्रोत प्रेरणा का मिला, वही सृजन का हार।
दिशा दिखाया आपने, बहुत बड़ा उपकार।।

मन-दर्पण को देखकर, होते भाव विभोर।
कुसुम हृदय की कामना, मीत संग हो भोर।।

©कुसुम ठाकुर

वह जन्मदिन है याद मुझको

"वह जन्मदिन है याद मुझको"


वह जन्मदिन है याद मुझको आज भी
खबर आयी माँ कहे सौगात भी

थी नहीं मुझको खबर पहले कभी
सूचना मुझको मिली थी बस तभी


मूंद कर  मैं नैन माँ की गोद में थी
सुन रही थी माँ बड़ों की बात भी

स्वच्छंदता में विघ्न का न भान था
और न कर्तव्य का कुछ ज्ञान भी

प्रेम माता, भाई-बहनों तक रहा
और से हो प्रेम न था ज्ञात भी

सोच में तब पड़ गयी  क्या हो मेरा
हर सखी पूछेगी तब जज़्बात भी


देखने आयी तो थी बारात ही
क्या पता मेंहदी रचेगी हाथ भी

देख गहने खुश हुई सब भूलकर
हाथ मेहँदी रच गई उस प्रात  भी

मैं न समझी प्रेम उनसे क्यों करूँ
प्रेम में थी किन्तु इक सौगात भी

 © कुसुम ठाकुर
          

बनें आधुनिक

"बनें आधुनिक"

बनें आधुनिक बोलें हर इक बात में
लेकिन मोल चुकाएँ उसके साथ में

 यूँ बातों में कहें लोग कुछ भला-बुरा 
 नहीं मगर यह दिल बदला आघात में

 क्या दिन थे जब बैठे हम बिन बात भी
 अब फुरसत है कहाँ किसे दिन रात में

 खोल कलम दिल के भावों को लिखते थे
 अब तो नकली प्रेम दिखे सौगात में

 प्रेम सरोवर में ये 'कुसुम' रहे खिलती
जगह न हो कटुता की उसकी बात में।

सपनो का भारत

सपनो का भारत

हो न अमन की कमी इस जहां में
मिलजुल सब रहें इस जहां में 

हर विस्थापितों को मिले आशियाना
रहे अनाथ ना कोई इस जहां में 

आतंक के आतंक का हो खात्मा
उन्हें भी प्यार मिले इस जहां में 

बागों में खिले हर इक कली
कहीं कुम्भला न जाए इस जहां में

अधिकार हर औरत को यूं मिले
हक के लिए न लड़ें इस जहां में

नेता हम चुने अपने विवेक से 
धर्म के नाम पर न बटें इस जहां में 

फर्क बेटे बेटियों का जब मिटे
इज्जत भी तब मिले इस जहां में 

फूलों में खुशबू हो तभी  
कुसुम न बने मौसमी इस जहां में

निज स्वार्थ से ऊपर रहे देश हित
यही सपनो का भारत इस जहां में 

© कुसुम ठाकुर 

मिथिला का लोक पर्व "सामा- चकेबा"


sama-chakeba
सामा-चकेबा एकमात्र मिथिला में मनाया जाने वाला लोक पर्व है. यह पर्व मिथिला की संस्कृति से जुड़े होने के साथ ही इसकी पौराणिक मान्यता भी है. बहनो द्वारा भाई के लिए मनाया जाने वाले इस त्यौहार का शुभारम्भ कार्तिक शुक्ल सप्तमी, छठ के पारण यानि सुबह के अर्घ के दिन होता है और पूर्णिमा को इसका समापन होता है . भाई बहनों के प्रेम के प्रतीक स्वरुप यह पर्व मनाया जाता है. कहते हैं पूर्णिमा के दिन सामा अपने ससुराल चली जाती है.


 पुराण के अनुसार कृष्ण की बेटी का नाम श्यामा (सामा) और बेटे का नाम साम्ब था, साम्ब को बचपन से ही अपनी बहन सामा से बहुत प्रेम था . सामा के पति का नाम चारुवक्त्र (चकेबा) था. चकेवा भी अपनी पत्नी सामा से बहुत प्रेम करते थे . सामा  को प्रकृति से बहुत स्नेह था . वह सुबह उठकर प्रकृति प्रेमवश वृन्दावन चली जाती और दिनभर पेड़, पौधे, पक्षियों और प्रकृति के बीच वन में विचरण करती,  वह दिन भर सातों ऋषियों (सत भैया ) के बीच खेलती कथा-पुराण सुन वापस आ जाती। कृष्ण के राज्य में चूड़क (चुगला) नामक एक मंत्री था उसने सामा के पिता से नमक मिर्च लगा सामा के बारे में चुगली कर दी  और सामा पर लांछन भी लगा दिया। सामा के पिता ने क्रोध में आकर सामा और सातों ऋषियों को पक्षी रूप का श्राप दे दिया . चकेबा अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे वे शिव जी की तपस्या करने लगे और प्रसन्न हो शिव ने वरदान मांगने को कहा तो पक्षी रूप का वरदान मांग लिया और पत्नी वियोग में वनों में भटकते रहते . साम्ब बाहर गए हुए थे बाहर से आने के बाद जब उन्हें इस बात का पता चला तो वह कृष्ण को मनाने की कोशिश करने लगे और न मानने पर तपस्या कर उन्हें मनाने में कामयाब हुए. सामा और सातों ऋषियों को श्राप मुक्त करवाया. कृष्ण ने साम्ब को वचन दिया कि हर साल कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सामा आएगी और पूर्णिमा के दिन वापस लौट जाएगी . इसप्रकार सामा चकेबा का मिलन कार्तिक मास में होता है .



इसी कथा के मान्यता के आधार पर बहने छठ के पारण के दिन मिटटी के सामा, चकेबा, चुगला, वृन्दावन, बाटो-बहिन, सतभैया, इत्यादि की मूर्ती बनाकर रोज शाम में खेत या मंदिर के पास जाकर खेलती हैं. प्रतिदिन प्रतीक स्वरुप मिटटी के बनाये गए वृन्दावन जिसमे खढ लगा होता है उसे थोड़ा थोड़ा रोज जलाई जाती है. चुगला जिसके मुंह में पाट(पटुआ) लगा होता है उसे भी आग लगाकर जलाई जाती है उसे मोटे मोटे काजल लगा हंसी का पात्र बनाया जाता है.



वृन्दावन में आग लगाते समय बहने गातीं हैं :
वृन्दावन में आग लागल कियो नहि मिझाबय हे
हमर भैया बड़का भैया दौड़ दौड़ मिझाबय हे



चुगला को जलाते समय बहने गातीं हैं :
चुगला करे चुगली बिलाड़ि करे म्याऊँ
आरे चुगला तोरे फांसी दूँ
चाउर चाउर चाउर
भैया कोठी चाउर
छाउर छाउर छाउर
चुगला कोठी छाउर



हंसी ख़ुशी हंसी मजाक के माहौल और वातावरण में मनाया जाने वाले इस पर्व में बहनें भाई की लंबी उम्र और धन धान्य से परिपूर्ण होने की कामना से युक्त
गाने गातीं हैं जिसमे सारे भाई बहनों के नाम होते हैं . 



भाई को आशीष देने के लिए बहने गाती हैं :
सामा हे चकेबा हे
जोतला खेत में अबिह हे
ढेला फोड़ि फोड़ि खइह हे
भाई के आशीष दीह हे
भरि घर बहिना सामा खेलाय सामा खेलाय
निरसुख बहिना घुरि घर जाय घुरि घर जाय



गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हे
तोहें बड़का भैया हे
भैया हाथो दस पोखरि खूना दिय चम्पा फूल लगा दिय हे
भैया लोढायेल भौजी हार गुथु हे आहे सेहो हार पहिरथु बड़की बहिना साम चकेबा खेल करू हे
गाम के अधिकारी ....................................
कथिये बझायब बन तितिर हे
आहे कठिये बझायब राजहंस चकेबा खेलब हे
चाले बझायब बन तितिर हे
आहे रभासि बझायब राजहंस चकेबा खेलब हे
गाम के अधिकारी तोहें .................................



देवउठावन (देवउठनी) एकादशी के दिन सामा के ससुराल जाने का दिन तय होता है उस दिन सारे मूर्तियों पर चावल के पिठार का छींटा दिया जाता है अर्थात सामा के जाने का दिन तय हो गया . उस दिन से सामा के ससुराल जाने की तैयारी शुरू होती है . मिट्टी के पौती बनाते हैं जिसमे चूड़ा, चावल, मिठाई ,कपडे दिए जाते हैं . उस दिन से सारे मूर्तियों को रंग बिरंगे रंगों से रंगे जाते हैं और पूर्णिमा के दिन सारे मूर्तियों को बांस की डाली में लेकर उसमे दिया जलाकर खेत में सारी बहने झुण्ड में जाती हैं पूर्णिमा के दिन भाई का साथ जाना जरूरी होता है.  वहां पहुंचकर रोज की तरह सारी मूर्तियों को जमीन पर रख उनमे से चुगला और वृन्दावन को जलाते हुए हंसी मजाक और चुगला को गाली दी जाती है. अंत में भाइयों को मिठाई और नए चूड़े दी जाती है . एक चिड़िया बाटो- बहिना को छोड़ भाई सारे मूर्तियों को अपने घुटने से तोड़ते हैं और उन्हें जुते हुए खेत में विसर्जन कर दी जाती है.



यह पर्व भाई बहनों के प्रेम और भाई के बहन के प्रति अटूट विश्वास का सन्देश देता है. 

साल नया फिर इक आया



 "साल नया फिर इक आया "


साल नया फिर इक आया
न कहता वह क्या-क्या लाया
आशा है भरपूर
कहीं यह भी न हो शूल



बंद पिटारे अब खुलने हैं
आस लगाए सब बैठे हैं
क्या होगा अब भी दूर
कहीं यह भी न हो शूल



देख जिसे सब खुश होते
सपने भी सब सच लगते
अब हो गए हमसे दूर
कहीं यह भी न हो शूल



सहें सभी सहमी सी बाजी
हूँ राजा क्या करेगा क़ाज़ी
चाहें, जनता न हो दूर
कहीं यह भी न हो शूल



अहंकार- न डरूं किसी से
दूजे का अपराध दिखा
क्या घटा कभी है कसूर
कहीं यह भी न हो शूल



सच की परिभाषा ही झूठी
घड़े फूटे जब झूठ औ सच की
कुसुम को है न कबूल
कहीं यह भी न हो शूल



नए वर्ष से आस जगाकर
भूल गए कुछ नया बताकर
कुर्सी ज्यों होगी दूर
कहीं यह भी न हो शूल



- कुसुम ठाकुर-

वामन वृक्ष



" वामन वृक्ष "

वामन वृक्ष करे पुकार ,
झेल रहा मनुज की मार ।
वरना मैं भी तो सक्षम ,
रहता वन मे स्वछंद ।

देख मनुज जब खुश होते ,
मेरी इस कद काठी को ।
कुढ़कर मैं रह जाता चुप ,
किस्मत मेरी है अभिशप्त ।

बेलों को तो मिले सहारा ,
पेडों को मिले नील गगन ।
पर हमारी किस्मत ऐसी ,
तारों से हमें रखें जकड़ ।

बढ़ना चाहें हम भी ऐसे ,
जैसे बेल और पेड़ बढ़ें ।
पर बदा किस्मत में मेरे ,
मिले हमें वामन का रूप ।

फल भी छोटा फूल भी छोटा ,
देख मनुज पर खुश होवें ।
पर हमारी अंतरात्मा की,
आह अगर वे देख सकें ।

चाहें हम भी रहना स्वछन्द ,
लगे हमें यह पिंजरे सा ।
हम भी तो प्रकृति की रचना ,
करे मनुज क्यों अत्याचार ।।

- कुसुम ठाकुर -

सावन आज बहुत तड़पाया

"सावन आज बहुत तड़पाया"

फिर बदरा ने याद दिलाया
पिया मिलन की आस जगाया

तड़पाती है विरह वेदना
सोये दिल की प्यास बढ़ाया

कट पाये क्या सफ़र अकेला
बस जीने की राह दिखाया

पतझड़ बीता और बसंत भी
सावन आज बहुत तड़पाया

आदत काँटों में जीने की
जहाँ कुसुम हरदम मुस्काया

-कुसुम ठाकुर- 

झलक दिखाने आ जाओ

'झलक दिखाने आ जाओ'

पलभर को कहीं गफलत ही सही, चेहरा तो दिखाने आ जाओ
तुम बुझे हुए नयनों के इन पलकों में समाने आ जाओ

प्रिय रुठे क्यों हो तुम अब तक बोलो कैसी है मजबूरी
ये  बेचैनी मैं कासे कहूँ एहसास जगाने आ जाओ

हो दूर मगर तुम जुदा नहीं आंसूं का साथ हुआ अपना
तन्हाई संग-संग रहती है पल भर को सताने आ जाओ

इस पार हैं हम उस पार हो तुम फिर मिलना कैसे हो संभव
सपनों में यकीं है मुझको तुम इक झलक दिखाने आ जाओ

दिन भर तो प्रतीक्षा कुसुम करे फिर शाम ढले वो मुरझाए
भंवरों की गुंजन यही कहे सपनों को सजाने आ जाओ

-कुसुम ठाकर-

वह रात मुझे डराती है

"वह रात मुझे डराती है "

वह रात मुझे डराती है 
जब याद तुम्हारी आती है 

दुःख की बातें याद नहीं
सुख सोच बहुत तडपाती है

व्याकुल हो जब भी ढूढूँ मैं
लगता मुझे चिढाती है

जीवन हो जीने की कला
यह सोच मुझे भरमाती है

साथी मुझसे छूटा जबसे
सपनो में सहलाती है

-कुसुम ठाकुर-

भारत को शिक्षित बनाओ

 
(पोलियो निवारण के बाद रोटरी का अगला कदम है 'साक्षरता मिशन' उसी पर कुछ पंक्तियाँ )
"भारत को शिक्षित बनाओ"

भारत को शिक्षित बनाओ हम सबका यह नारा है
जन-जन तक शिक्षा पहुँचाएं यह कर्तव्य हमारा है 

ठान लिया जब हमने बीड़ा कदम कभी न रुकने देंगे
हर व्यक्ति जब होगा शिक्षित तब स्वतंत्र कहलाएंगे

तीन वर्ष का समय मिला है जाया इसे न करना है
पथ प्रदर्शक साथ हमारे मिला देश हर कोना है

शून्य दिया है देश ने जग को होगा साक्षर हर व्यक्ति
 फिर कलाम की जन्म भूमि के जन-जन  को मिले शक्ति

  शिक्षा तो जन का अधिकार, जागरूक हम बनाएंगे
  पूरा होगा मिशन हमारा, अशिक्षा दूर भगाएंगे
-कुसुम ठाकुर-

हार मिली पर हार वही

"हार मिली पर हार वही"

है चाहत  हर बार वही
क्यों रहता ना प्यार वही

आती जाती यादों पर
हो अपना अधिकार वही

प्यार सदा सच  कहता है
हार मिली पर हार वही

प्यार कला है जीने की
तब जगमग संसार वही

समझ कुसुम नैनों की भाषा
प्रेम सहज हर बार वही

-कुसुम ठाकुर-

कन्यादान महादान क्यों ?

 कहते हैं कन्यादान महा दान अर्थात इससे बड़ा दान नहीं होता है. बेटियों को दान में क्यों दिया जाता है यह आजतक मेरी समझ से परे है. दान में तो वस्तु दी जाती है, तो क्या बेटियाँ वस्तु हैं ? कहते हैं जो वस्तु दान में दे दी जाती है  उस पर न कोई अधिकार होता है न ही उसके बारे में सोचना चाहिए. तो क्या बेटियों पर भी यही लागू होता है ? कन्यादान कब कैसे और क्यों हमारे विवाह पद्धति में जुड़ा यह अभी चर्चा का विषय नहीं है पर उसका दुष्परिणाम आज भी हमारे समाज में लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है. 

कहते हैं सीता जी की अग्नि परीक्षा, वनवास और लव कुश की कहानी अर्थात उत्तरकाण्ड राम चरित मानस का अंश नहीं है, इसे बाल्मीकि ने नहीं लिखा है, इसे बाद में विद्वानों ने जोड़ा है. हमारे धर्म ग्रंथों पर चर्चा करें तो यह विवाद का विषय हो जाएगा. पर हम उसी ग्रन्थ के आधार पर गर्व से कहते हैं मर्यादा पुरषोत्तम राम ने एक धोबन के कहने पर अपनी सीता जैसी पत्नी तक का त्याग कर दिया. यहाँ भी पुरुष की प्रधानता दर्शाता है. क्या यह पौरुषता का विषय है? एक गर्भवती पत्नी का त्याग करना क्या पौरूषता है ? यहाँ भी सीता को अबला नारी का दर्जा मिला . दिव्य शक्ति प्राप्त सीता अबला नारी बन गई. 

पहले हम कहते थे बेटियाँ घर की शोभा होती हैं, सच उसी घर की शोभा को दान में देकर हम खुश हो जाते है और उम्मीद करते हैं कि हमारे घर की शोभा अपने ससुराल जहां वह दान स्वरुप भेजी जा रही है उस घर की शोभा बनकर तो रहे ही, साथ ही उस घर की जिम्मेदारियों की भी अच्छी तरह पालन करे, उसे कितना भी कष्ट हो दोनों घरों की इज्जत पर आंच न आने दे, लड़कियों और लड़कों के लिए परिभाषा अलग अलग है.

आजकल लडकियां घर की शोभा तो नहीं कहलाती हाँ, लड़के लड़की में क्या फर्क है ? लोग यह जरूर कहते हैं. जब ही यह कहा जाता लड़के लड़की में क्या फर्क है मतलब स्पष्ट है फर्क तो है हम कोशिश कर रहे हैं फर्क कम करने की. आज भी बहुत कम लोग हैं जो शादी के बाद बेटी के बारे में भी उतना ही सोचते हैं जितना बेटे के बारे में सोचते हैं. आज भी बेटी शादी के बाद परायी हो जाती है. हा, सांत्वना और दिखावा के लिए यह जरूर कहते हैं बेटियाँ बेटों से ज्यादा माँ बाप के बारे में सोचती हैं. केवल बेटों के लिए धन उपार्जन और पैतृक संपत्ति का रिवाज अभी भी बरकरार है. 

कन्यादान जैसे महादान को हटा देना चाहिए , तब ही हम कह सकते है लडके लड़कियों में कोई फर्क नहीं, वर्ना सदियों से चली आ रही लडके लड़की में फर्क रहेगा ही. जबतक हम कन्या का दान करते रहेंगे उसके साथ अबला शब्द जोड़ा जाता रहेगा और माता पिता बेटा बेटी में भेद करते रहेगे. 

मानवता के मूल्य को समझें यही हमारी संस्कृति रही है

एक बार एक प्रसिद्ध फिल्म नेर्देशक से बातें हो रही थी और उन्होंने कहा था "एक दिन मैं बम्बई में एक फिल्म शूटिंग देख रहा था उस दिन मेरे मन में आया सिनेमा सबसे अच्छा माध्यम है लोगों तक अपने विचारों को पहुंचाने का."  उसके बाद ही हमने  पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने का निर्णय लिया और निर्देशन को चुना.

सच सिनेमा वह शसक्त माध्यम है जिसके जरिए निर्देशक अपनी बातें आम लोगों तक पहुंचा सकता है, समाज को नई दिशा दिखा सकता है. जिन छोटी छोटी बातों पर हम गौर नहीं करते उनका आईना हमें निर्देशक सिनेमा के माध्यम से दिखा सकता है. परन्तु आज हमारे यहाँ हर जगह राजनीति इतनी हावी हो गई है, लोगों की भावनाएं इतनी कलुषित हो गई हैं कि समाज सदा दो भागों में बंट जाती है, लोग आपस में उलझकर रह जाते है, विषय के मतलब ही बदल जाते हैं. जिस उद्देश्य से निर्देशक ने अपनी बात रखी वह तो बेमानी हो जाती है. सिनेमा मनोरंजन के लिए बनाई जाती है........देश के नेता उसे धर्म, देवी देवता पर आक्रमण कह चिंगारी भड़काने का काम करते हैं, उसे धर्म और कौम से जोड़ देते हैं. 

हम इक्कीसवीं सदी में में कहने को तो जी रहे हैं लेकिन आज भी हमारे विचारों में ईश्वर का खौफ विद्यमान है. जो जितना पाप करता है वह उतना ज्यादा पूजा पाठ धर्म का आडम्बर करता है. मैं नहीं कहती पूजा नहीं करनी चाहिए. पूजा करना या किसी विशेष धर्म का अनुयायी होने का मतलब यह नहीं होता कि हम दूसरों को भी उसके विचारों को मानने के लिए बाध्य करें और सहमत न होने पर उसे भला बुरा कहें, धर्म हमें दूसरों का आदर करना सिखाता है, हमें अनुशासित बनाता है न कि उद्दंड.

ईश्वर हैं या नहीं इसपर बात करूँ इतनी विदूषी मैं नहीं पर इतना जरूर कहूँगी कि आज के युग में, धर्म के ठेकेदार बाबा और संत हो ही नहीं सकते. संत की परिभाषा क्या होती है यह भी आज के बाबाओं और संतों को मालुम नहीं होगा. हाँ लोगों में आगे बढ़ने की जल्दबाजी और डर ने आज व्यावसायिक बाबाओं, संतों को जन्म दिया है जो धर्म के नाम पर लोगों को ठगते हैं और लोगों के मन में बसे डर और लालच उन्हें ठगने का मौका देती है. उन्हें धर्म की जानकारी हो या न हो इतना अवश्य मालूम है कि धर्म के नाम पर देश को बांटा जा सकता है.

पंडित, पुजारी,मौला, पादरी या बाबाओं को हम भगवान का प्रतिनिधि मानते हैं और हमारी इसी कमजोरी का फायदा आजके ये प्रतिनिधि उठाते हैं. एक प्रश्न मैं करना चाहूंगी अगर सच में ईश्वर हैं.....और अगर  हम इन प्रतिनिधियों का वहिष्कार कर खुद से अपने ईश्वर या ईष्ट की पूजा करें तो क्या हमारे ईश्वर हमारी नहीं सुनेंगे और यदि नहीं सुनेंगे तो फिर ईश्वर कैसे ?

हमारे यहाँ एक सिनेमा आज देश के प्रबुद्ध वर्ग से कहना चाहूंगी कि वे जागें और अपने विचारों पर किसी को हावी न होने दें. धर्म के आधार पर किसी को अपनी भावना पर अधिकार न करने दें . मानवता के मूल्य को समझें यही हमारी संस्कृति रही है उसे विलुप्त न होने दें.

चलने का बहाना ढूँढ लिया

"चलने का बहाना ढूँढ लिया"

चलने की हो ख्वाहिश साथ अगर 
चलने का बहाना ढूंढ लिया 

यूं रहते थे दिल के पास मगर 
तसरीह का बहाना ढूंढ लिया

मुड़कर भी जो देखूं मुमकिन नहीं
आरज़ू थी जो मुद्दत से ढूंढ लिया

तसव्वुर में बैठे थे शिद्दत सही 
खलिश को छुपाना ढूंढ लिया 

कहने को मुझे हर ख़ुशी है मिली 
हँसने का बहाना ढूंढ लिया 

- कुसुम ठाकुर -

दर्द इस कदर दिया

"दर्द इस कदर दिया "

यूँ नसीब ने तो प्यारा हमसफ़र दिया 
मेरी जिंदगी में ऐतवार भर दिया

दर्द पाया फिर भी लगता खुश नसीब हूँ 
जाने जादू क्या उसने ऐसा कर दिया

वैसे जिन्दगी में कम कहाँ है उलझनें 
जाते जाते भी न चैन इक पहर दिया

ये तो जाना हमसफ़र का भी सफ़र वहीं
वो हसीन पल भी सपनों में है भर दिया  

कहना चाहा जो कुसुम ने आज कह दिया 
अपनी पंखुड़ी भी दर्द इस कदर दिया 

-कुसुम ठाकुर-

बेटियों को अधिकार कब मिलेगा, कब तक वो पराई कहलाएंगी ?

कर्म के आधार पर वर्ण बनाया गया परन्तु कालान्तर में वर्ण ही  छूआछूत भेदभाव को जन्म दिया और पराकाष्ठा पर पहुँच गया.उसी प्रकार ईश्वर ने स्त्री को मात्र शारीरिक तौर पर पुरुषों से कमजोर बनाया. उन्हें शारीरिक श्रम वाले काम से दूर रखने के लिए घर के काम काज उनके जिम्मे दिया गया. कालान्तर में उन्हें कमजोर समझ घर हो या बाहर शोषण होने लगा. 

1908 ई. में अमेरिका की कामकाजी महिलाएं अपने अधिकार की मांग को लेकर सडकों पर उतर आईं।1909 ई. में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने उनकी मांगों के साथ राष्ट्रीय महिला दिवस की भी घोषणा की। 1911 ई. में इसे ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का रूप दे दिया गया और तब से ८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाई जा रही है। 

कुछ वर्षों से "दिवस" मनाना फैशन बन गया है। क्या साल में एक दिन याद कर लेना लम्बी लम्बी घोषणा और वादे करना ही सम्मान होता है ? किसी को विशेष दिन पर याद करना या उसे उस दिन सम्मान देना बुरी बात नहीं है। बुरा तो तब लगता है जब विशेष दिनों पर ही मात्र आडंबर के साथ सम्मान देने का ढोंग किया जाता हो।  सम्मान बोलकर देने की वस्तु नहीं है सम्मान तो मन से होता है क्रिया कलाप में होता है। 

एक तरफ महिला दिवस मनाई जाती है दूसरी तरफ नारी का शोषण बलात्कार दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. आज भी हमारे देश में नारी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. कहने के लिए लोग कहते हैं हम बेटे बेटी में फर्क नहीं करते परन्तु कितने लोग हैं जो आज अपनी बेटी को वही अधिकार देते हैं जो अपने बेटे को. पहले भी बेटी पराई थी आज भी पराई ही कहलाती है. माता पिता आज भी बेटी की जिम्मेदारी शादी तक ही समझते हैं जब कि बेटे के लिए उनकी जिम्मेदारी कभी ख़त्म नही होती. कहने के लिए कहते हैं अब मेरी जिम्मेदारी ख़त्म हुई अब बेटा अपना समझेगा पर अपने बेटा क्या बेटे के बेटे यानि पोते के लिए भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं. मेरी समझ में यह नहीं आता कि एक ही माता पिता की संतान में इतना अंतर क्यों ?  बेटी पराई क्यों कहलाती है ? पहले जमाने में तो फिर भी ठीक था बेटा घर, संपत्ति संभालता था बेटी ससुराल चली जाती थी. 

आज महिला दिवस है पर चुनाव और आचार संहिता लग जाने की वजह से सभी पार्टी और नेता इतने व्यस्त हैं कि इसबार महिला दिवस पर महिलाओं के लिए होने वाले झूठे आरक्षण के वादे सुर्ख़ियों में नहीं है. हर महिला दिवस पर महिलाओं के लिए आरक्षण की बात होती है कुछेक सम्मान का आयोजन। साल के बाक़ी दिन अब भी न वह सम्मान है न वह बराबरी मिल पाता है, जिसकी वह हकदार है या जो दिवस मनाते वक्त कही जाती है। कहने को तो आज सभी कहते हैं "नारी पुरुषों से किसी भी चीज़ में कम नहीं हैं". परन्तु नारी पुरुष से कम बेसी की चर्चा जबतक होती रहेगी तबतक नारी की स्थिति में बदलाव नहीं आ सकता।  

नारी ममता त्याग की देवी मानी जाती है और है भी। यह नारी के स्वभाव में निहित है , यह कोई समयानुसार बदला हो ऐसा नहीं है। ईश्वर ने नारी की संरचना इस स्वभाव के साथ ही की है। हाँ अपवाद तो होता ही है। आज नारी की परिस्थिति पहले से काफी बदल चुकी है यह सत्य है। आज किसी भी क्षेत्र में नारी पुरुषों से पीछे नहीं हैं । बल्कि पुरुषों से आगे हैं यह कह सकती हूँ। आज जब नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है तब भी आरक्षण की जरूरत क्यों ? आरक्षण शब्द ही कमजोरी का एहसास दिलाता है आज एक ओर तो हम बराबरी की बातें करते हैं दूसरी तरफ आरक्षण की भी माँग करते हैं , यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता है। क्या हम आरक्षण के बल पर सही मायने में आत्म निर्भर हो पाएंगे?  हमें जरूरत है अपने आप को सक्षम बनाने की, आत्मनिर्भर बनने की, आत्मविश्वास बढ़ाने की। 

आज भी हमारे यहाँ यदि कोई बेटी अपने माता पिता या परिवार में अपने अधिकार की बात करती है तो परिवार उसे पसंद नही करता. कानून तो बन गया है पर कितने लोग उसपर अमल करते हैं यह सोचनीय है. दहेज़ जैसे दानव  के जन्म का एक यह भी कारण है. कब हर बात में कहना बंद होगा बेटियाँ पराई होती हैं. हम सरकार से आरक्षण तो मंगाते हैं पर अपने परिवार में अपने माता पिता से अपना अधिकार कब मांगेंगे ? 

  

नीम गुणों का खान


"नीम गुणों का खान"

औषधीय गुणों मान  
नीम गुणों का खान, कहे सब 
नीम गुणों का खान 
और मिलना भी आसान 

उच्च हिमालय नहीं है भाता 
जगह जगह मिल जाता 
दोषमुक्त औषधीय गुण वाला 
चमत्कार दिखलाता 

छाल पत्तियाँ फल फूल बीज 
के नियमित सेवन से 
रोगों को दूर भगाता 
है पर्यावरण बचाता 

-कुसुम ठाकुर-

मन में झंझावात


मन में झंझावात"

दिल के तहखाने में बीता तनहा सारी रात 
कहती क्यों सावन हरजाई लाई है सौगात

स्नेह का सागर भरा हुआ है, क्यूँ मन में अवसाद 
किसको बोलूँ, रूठूं कैसे,  मन में झंझावात 

तिल-तिल दीपक सा जलता मन, लिए स्नेह की आस 
गुजरी यादें, धुमिल हो गईं, इतनी रही बिसात 

समझूं कैसे देगा निशि-दिन, दिल में चोट हजार
प्रेम की भाषा वे बोले पर, ना समझे जज्बात  

आता मौसम जाता मौसम, जीवन में सौ बार 
कुसुम मौसमी होता क्यूँ, है, समझ न आयी बात 

-कुसुम ठाकुर-

माँ मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी,



माँ मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी,
अब जाऊँ किधर तज शरण तुम्हारी 


दर भी तुम्हारा लगे मुझको प्यारा,
 तजूँ मैं कैसे अब शरण तुम्हारी 
माँ .........................................


मन मेरा चंचल, धरूँ ध्यान कैसे,
बसो मेरे मन, मैं शरण तुम्हारी
माँ..........................................


जीवन की नैया मझधार में है, 
पार उतारो मैं शरण तुम्हारी
माँ .................................... 


तन में न शक्ति, करूँ मन से भक्ति 
अब दर्शन दे दो मैं शरण तुम्हारी 
माँ.............................................

- कुसुम ठाकुर -