नैनो से बरसात क्यों
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Kusum Thakur
on Sunday, February 5, 2012
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(आज की रचना उस प्रिय व्यक्ति के लिए है जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं अपने भावों को लिख पाऊं)
नैन से बरसात क्यों?
***************
कह सकूं मैं आज फिर से ना कहूँ वो बात क्यों?
आज फिर छलकीं हैं, खुशियाँ नैन से बरसात क्यों?
बात कर इंसानियत की पहले तू इंसान बन
तुम ख़ुशी गर दे ना पाए बेवजह आघात क्यों?
गीत विस्मृत गुनगुनाऊं, अब भी वह अनुराग है
अपने सुर में गीत वो गाऊँ बदल जज्बात क्यों?
रिश्ते होते जो भी नाजुक बाँध उसको प्यार से
जिन्दगी कितने दिनों की बात से फिर घात क्यों?
सींचता है सोच माली गुल से ही गुलजार हो
जो कुसुम खुशबू लुटाए, तोड़ते बेबात क्यों?
लोकतंत्र बीमार है
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Kusum Thakur
on Saturday, December 31, 2011
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"लोकतंत्र बीमार है"
लोकतंत्र बीमार अब, है जनता में रोष।
इक दूजे पर थोपते, अपना अपना दोष।।
बातें जन-हित की करें, स्वार्थ न करते दूर।
आम लोग सच जानते, साथ चले भरपूर।।
आम लोग सच जानते, साथ चले भरपूर।।
जागो देश निवासियों, नहीं हुई है देर ।
बनी रहे बस एकता, दुश्मन होंगे ढेर।।
नहीं गुलामी देश में, फिर भी है संताप।
छोड़ गये अंग्रेज पर, शेष रह गयी छाप।।
प्रकृति नियम हरदम यही, होंगे ही बदलाव।
बहे हवा के संग कुसुम, उससे नहीं लगाव।।
सपनो में बस जाते हो
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Kusum Thakur
on Wednesday, December 28, 2011
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"सपनो में बस जाते हो"
कुछ बरसों का साथ रहा पर याद बहुत तुम आते हो
जानूँ वे पल फिर न आए, तुम सपनो में बस जाते हो
वे क्षण कितने प्यारे होते नैन जहाँ सब कह जाते
इक दूजे को समझ गए तो खुद को क्यूँ भरमाते हो
साथ नहीं मन का छूटा, बस आँखें न मिल पातीं हैं
मीत भिज्ञ हो कारण से तुम प्रश्न नया क्यों लाते हो
न बसंत न मेघ रिझाता, न भंवरों के गीत मुझे
ताल तलैया न सूखे क्यूँ अश्क से प्यास बुझाते हो
कला है जीना गर जीवन तो, कलाकार प्रेमी माला
कुसुम के सपनों को गीतों से आकर रोज सजाते हो
-कुसुम ठाकुर-
जानूँ वे पल फिर न आए, तुम सपनो में बस जाते हो
वे क्षण कितने प्यारे होते नैन जहाँ सब कह जाते
इक दूजे को समझ गए तो खुद को क्यूँ भरमाते हो
साथ नहीं मन का छूटा, बस आँखें न मिल पातीं हैं
मीत भिज्ञ हो कारण से तुम प्रश्न नया क्यों लाते हो
न बसंत न मेघ रिझाता, न भंवरों के गीत मुझे
ताल तलैया न सूखे क्यूँ अश्क से प्यास बुझाते हो
कला है जीना गर जीवन तो, कलाकार प्रेमी माला
कुसुम के सपनों को गीतों से आकर रोज सजाते हो
-कुसुम ठाकुर-
तेरा दिया ही लाई हूँ
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on Wednesday, November 23, 2011
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देवी वंदना
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"तेरा दिया ही लाई हूँ"
हूँ तो माँ इक तुच्छ उपासक,द्वार पे तेरे आई हूँ।
कैसे कहूँ लोभ नहीं है,सब तेरा दिया ही लाई हूँ। ।
न मैं जानूँ आरती वंदन,स्वर में भी कम्पन मेरे।
दर्शन की प्यासी हूँ मैया,इसी उद्देश्य वश आई हूँ।।
बीच भंवर में नाव है मेरी,खेवनहार तुम्ही हो कहूं।
शरणागत की रक्षा करती,माँ यही गुहार लगाई हूँ।।
मन में मेरे पाप का डेरा,सेवा में अर्पण क्या करूँ।
तू माता लेती सुधि सबकी,बस यही राग मैं गाई हूँ।।
है मेरा मन चंचल मैया,मन के भाव कहूँ कैसे।
तुमको कहते अन्तर्यामी,इस द्वार पे साहस पाई हूँ।।
-कुसुम ठाकुर-
मैं न उसमे बही सही
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on Saturday, November 5, 2011
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मुक्तिका
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भय हरण कालिका
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on Monday, October 24, 2011
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भगवती स्त्रोत
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"भय हरण कालिका"
जय जय जग जननि देवी
सुर नर मुनि असुर सेवी
भुक्ति मुक्ति दायिनी भय हरण कालिका।
जय जय जग जननि देवी।
मुंडमाल तिलक भाल
शोणित मुख लगे विशाल
श्याम वर्ण शोभित, भय हरण कालिका।
जय जय जग जननि देवी ।
हर लो तुम सारे क्लेश
मांगूं नित कह अशेष
आयी शरणों में तेरी, भय हरण कालिका ।
जय जय जग जननि देवी ।
माँ मैं तो गई हूँ हारी
माँगूं कबसे विचारी
करो अब तो उद्धार तुम, भय हरण कालिका ।
जय जय जग जननि देवी ।
-कुसुम ठाकुर-
क्या आत्म हत्या करना किसी दुःख का हल है?
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on Wednesday, September 21, 2011
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कुसुम ठाकुर
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अचानक सुबह में मेरी एक सहेली का फ़ोन आया और उसने कहा "पता है मि. मुर्मू की बेटी ने आत्म हत्या कर ली अभी उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा है". यह सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई. अपने बालकनी में जाकर खड़ी हो गई और जो दृश्य देखी वह देख मैं विचलित हो गई. आगे आगे मालिनी का शव कंधे पर लिए चार लोग और पिता छतरी को मालिनी के सर पर ताने बढ़ रहे थे, पीछे पीछे पूरा परिवार रोते बिलखते मालिनी को अंतिम विदाई देने के लिए. मालिनी के पार्थिव शरीर को एक फूलों से लदे ट्रक पर डाल दिया गया. जिस बेटी या बच्चे को छोटी सी चोट लगने पर माँ बाप बेचैन हो जाते हैं आज उसे ही अग्नि देव को सुपुर्द करने ले जाते समय उनकी मानसिक स्थिति का सोच मेरा मन रो उठा. पर मैं सबसे ज्यादा उस समय द्रवित हुई जब पत्रकारों का एक समूह उस गमगीन घडी में भी होड़ लगाये हुए थे कि कौन सबसे नजदीक और अच्छी तस्वीर ले सकता है. उस होड़ में वे दुःख में डूबे परिजनों को बगल हटने या पीछे जाने के लिए भी कह रहे थे.
श्री मुर्मू और श्रीमती मुर्मू मेरे पड़ोस में रहते हैं. बड़ी बेटी मालिनी का इसबार आई आई एम बंगलौर में दाखिला दिलाने के बाद वे बहुत ही खुश थे. उन्हें क्या पता था कि उनकी यह ख़ुशी जल्द ही दुःख में परिवर्तित हो जायेगा. किसी से मालिनी को प्रेम हो गया था पर उस प्रेमी द्वारा फेस बुक स्टेटस में "filing super cool, dumped my new ex girl friend, happy independence day" को मालिनी बर्दाश्त नहीं कर पाई और suicide note लिखकर लैपटॉप के पास छोड़ अपने हॉस्टल में फाँसी लगाकर आत्म हत्या कर ली. आज के ज़माने में जीवन की रफ़्तार इतनी तेज़ है कि लोगों को किसी के भावना का भी जरा सा ख्याल नहीं रहता. इस भौतिकवादी ज़माने में बहुत कम व्यक्ति हैं जो भावनाओं को अहमियत देते हैं. अहम की भावना भी आज की पीढ़ी में बढ़ता जा रहा है बर्दाश्त करने की शक्ति तो जैसे नगण्य होता जा रहा है.
क्या आत्म हत्या करना ही किसी भी दुःख का अंत या हल है ?
सदा मीत सँग भोर
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on Wednesday, September 14, 2011
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"सदा मीत सँग भोर"
जीवन जीने की कला मिला तुम्ही से मीत
लगता है इस मोड़ पर बढ़ा और भी प्रीत
गहरे होते भाव जितने होते उतने ही गंभीर
बिना शब्द ही कह गए यह नैनो की तासीर
ह्रदय सदा ही ढूँढता मिलन हुआ संयोग
कहने को तो है बहुत पर कैसे सहूँ वियोग
स्त्रोत प्रेरणा का मिला कहूं न सृजनहार
दिशा दिखाया आपने हुआ यही उपकार
मन का दर्पण खोलकर हुए जो भाव विभोर
कुसुम कामना सँग लिए सदा मीत सँग भोर
-कुसुम ठाकुर-
जीवन जीने की कला मिला तुम्ही से मीत
लगता है इस मोड़ पर बढ़ा और भी प्रीत
गहरे होते भाव जितने होते उतने ही गंभीर
बिना शब्द ही कह गए यह नैनो की तासीर
ह्रदय सदा ही ढूँढता मिलन हुआ संयोग
कहने को तो है बहुत पर कैसे सहूँ वियोग
स्त्रोत प्रेरणा का मिला कहूं न सृजनहार
दिशा दिखाया आपने हुआ यही उपकार
मन का दर्पण खोलकर हुए जो भाव विभोर
कुसुम कामना सँग लिए सदा मीत सँग भोर
-कुसुम ठाकुर-
मुझे आज मेरा वतन याद आया
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on Sunday, August 14, 2011
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"मुझे आज मेरा वतन याद आया"
मुझे आज मेरा वतन याद आया।
ख्यालों में तो वह सदा से रहा है ,
मजबूरियों ने जकड़ यूँ रखा कि,
मुड़कर भी देखूँ तो गिर न पडूँ मैं ,
यही डर मुझे तो सदा काट खाए ।
मुझे आज ......................... ।
छोड़ी तो थी मैं चकाचौंध को देख ,
मजबूरी अब तो निकल न सकूँ मैं,
करुँ अब मैं क्या मैं तो मझधार में हूँ ,
इधर भी है खाई, उधर मौत का डर ।
मुझे आज .............................. . ।
बचाई तो थी टहनियों के लिए मैं ,
है जोड़ना अब कफ़न के लिए भी ।
काश, गज भर जमीं बस मिलता वहीँ पर ,
मुमकिन मगर अब तो वह भी नहीं है ।
मुझे आज .............................. .. ।
साँसों में तो वह सदा से रहा है ,
मगर ऑंखें बंद हों तो उस जमीं पर।
इतनी कृपा तू करना ऐ भगवन ,
देना जनम निज वतन की जमीं पर ।
मुझे आज .............................. .... ।
-कुसुम ठाकुर-
किस तरह
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on Friday, August 12, 2011
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"किस तरह"
तुमको चाहा है मगर तुमको बताऊँ किस तरह
आँखों में जुबाँ नहीं तो सुनाऊँ किस तरह
भूलकर दर्द जुदाई का ना मिलती खुशियाँ
जफ़ा के आसुओं को अब बहाऊँ किस तरह
भूलना है कठिन बहुत जो पल थे यादों के
वो सभी यादें अभी दिल से मिटाऊँ किस तरह
अगर नहीं है बेबसी तो बेड़ियाँ कैसी
वफ़ा की चाहतें जो दिल में निभाऊँ किस तरह
हर कदम साथ हो कुसुम की ख्वाहिश इतनी
मगर अकेले अब कदम को बढाऊँ किस तरह
-कुसुम ठाकुर-
हरएक आँख में नमी
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Kusum Thakur
on Saturday, August 6, 2011
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"हरएक आँख में नमी"
लगे अमन की कमी इस खूबसूरत जहाँ में
बँटी हुई क्यों जमीं इस खूबसूरत जहाँ में
कर्म आधार था जीने का कैसे जाति बनी
हरएक आँख में नमी इस खूबसूरत जहाँ में
जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों
गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में
सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर
भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में
यूँ तो मालिक सभी का एक नाम कुछ भी दे दो
कुसुम बने न मौसमी इस खूबसूरत जहाँ में
-कुसुम ठाकुर-
जो कह न सको तो
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on Sunday, July 24, 2011
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"जो कह न सको तो"
वो भी कैसा प्यार जो कह न सको तो
दिल में उठे बयार जो कह न सको तो
यूँ दूरियाँ सही पर दिल के करीब है जो
मिलने का इंतजार जो कह न सको तो
लम्बे सफर के सँग ही मजबूरियाँ बहुत
आयेगा क्या करार जो कह न सको तो
क्या प्यार रह सका है वश में किसी के
होते हैं दिल पे वार जो कह न सको तो
दिल में उसे बसाया जो स्वप्न था कुसुम का
दीदार में है प्यार जो कह न सको तो
- कुसुम ठाकुर-
नहीं है प्रेम की सीमा
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on Wednesday, July 20, 2011
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"नहीं है प्रेम की सीमा"
छवि बसती जो नैनों में उसे झुठलाया नहीं जाता
प्रेम का पाश बंधने पर उसे सुलझाया नहीं जाता
डूब जाए अगर प्रेमी झील सी गहरी आँखों में
नयन चार जब हो जाए तो शरमाया नहीं जाता
विकलता इंतजारी में धैर्य की क्या बने सीमा
मिलन को प्रेमी जब आतुर उसे तड़पाया नहीं जाता
समर्पण भाव से जब है झिझक फिर छोड़ना लाजिम
ख़ुशी और गम ह्रदय में जब उसे बिसराया नहीं जाता
नहीं है प्रेम की सीमा निहित हो भाव कोमल सा
कुसुम कोमल उसे काँटों से सहलाया नहीं जाता
-कुसुम ठाकुर-
था मेरा सचमुच कभी
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Kusum Thakur
on Thursday, July 14, 2011
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"था मेरा सचमुच कभी"
उड़ सकूँ स्वछन्द होकर सोचा नहीं था यह कभी
मन के तारों से बंधूँ हो न सका मुमकिन कभी
नभ में तारा दिख गया इक थी चमक सबसे अलग
खोजती उसको थी कब से था मेरा सचमुच कभी
चांदनी भी श्वेत चादर ओढ़कर हँसती है जब
निस्तब्धता की वो तरंगे आ चूम लेगी फिर कभी
सीप अपना मुँह खोले राह कब से तक रहा है
बूँद स्वाति की गिरेगी आएगा वो दिन कभी
ओस बूंदों को समेटे देख निशिकर मुस्कुराये
और कुसुम रवि- तेज सहकर कुम्भला जाए न कभी
-कुसुम ठाकुर-
दुःख के दिन भी कट जायेंगे
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on Saturday, July 9, 2011
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आस है ऋतुराज से
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Kusum Thakur
on Tuesday, July 5, 2011
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"आस है ऋतुराज से"
आज रूठूँ किस तरह जब पूछने वाला नहीं
दिल के कोने में छिपा गम ढूँढने वाला नहीं
ढूँढती है ये निगाहें हर तरफ मुमकिन अगर
कैसे कम हो दर्द दिल का बाँटने वाला नहीं
रुख हवा का मोड़ दूँ है दिल में हलचल इस तरह
अनुभूतियाँ स्पर्श की पर चाहने वाला नहीं
तान छेड़ूँ सप्त सुर में रागनी ऐसी कहाँ
संगीत की गहराईयों में डूबने वाला नहीं
आस है ऋतुराज से नव कोपलें हों फिर कुसुम
पत्तियाँ फिर से न सूखे सींचने वाला नहीं
- कुसुम ठाकुर-
कर में हरसिंगार
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Kusum Thakur
on Monday, June 27, 2011
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"कर में हरसिंगार"
श्वेत केसरिया कोमल सुन्दर
हो तुम सौम्य प्रतीक
नम्र भाव को देख कर
भक्त हुए नत शीश
भक्त हुए नत शीश
तुमसे महके चारों दिशाएँ
हो भक्तों के भक्त
कष्ट भी उनके सोचते
गिरो भूमि यह रीति
देख तुम्हारी नम्रता
हुए भक्त विभोर
भूमि दोष देखे नहीं
देव चढ़ावें शीश
कद में छोटे हो मगर
सौरभ मन को भाए
सूचना आगमन का
फल होगा सुखदाय
तन्मय होकर चुन रही
चेहरे पर मुस्कान
शिव की करूँ आराधना
कर में हरसिंगार
-कुसुम ठाकुर-














