मुझे आज मेरा वतन याद आया
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Kusum Thakur
on Sunday, August 14, 2011
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"मुझे आज मेरा वतन याद आया"
मुझे आज मेरा वतन याद आया।
ख्यालों में तो वह सदा से रहा है ,
मजबूरियों ने जकड़ यूँ रखा कि,
मुड़कर भी देखूँ तो गिर न पडूँ मैं ,
यही डर मुझे तो सदा काट खाए ।
मुझे आज ......................... ।
छोड़ी तो थी मैं चकाचौंध को देख ,
मजबूरी अब तो निकल न सकूँ मैं,
करुँ अब मैं क्या मैं तो मझधार में हूँ ,
इधर भी है खाई, उधर मौत का डर ।
मुझे आज .............................. . ।
बचाई तो थी टहनियों के लिए मैं ,
है जोड़ना अब कफ़न के लिए भी ।
काश, गज भर जमीं बस मिलता वहीँ पर ,
मुमकिन मगर अब तो वह भी नहीं है ।
मुझे आज .............................. .. ।
साँसों में तो वह सदा से रहा है ,
मगर ऑंखें बंद हों तो उस जमीं पर।
इतनी कृपा तू करना ऐ भगवन ,
देना जनम निज वतन की जमीं पर ।
मुझे आज .............................. .... ।
-कुसुम ठाकुर-
किस तरह
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on Friday, August 12, 2011
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"किस तरह"
तुमको चाहा है मगर तुमको बताऊँ किस तरह
आँखों में जुबाँ नहीं तो सुनाऊँ किस तरह
भूलकर दर्द जुदाई का ना मिलती खुशियाँ
जफ़ा के आसुओं को अब बहाऊँ किस तरह
भूलना है कठिन बहुत जो पल थे यादों के
वो सभी यादें अभी दिल से मिटाऊँ किस तरह
अगर नहीं है बेबसी तो बेड़ियाँ कैसी
वफ़ा की चाहतें जो दिल में निभाऊँ किस तरह
हर कदम साथ हो कुसुम की ख्वाहिश इतनी
मगर अकेले अब कदम को बढाऊँ किस तरह
-कुसुम ठाकुर-
हरएक आँख में नमी
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on Saturday, August 6, 2011
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"हरएक आँख में नमी"
लगे अमन की कमी इस खूबसूरत जहाँ में
बँटी हुई क्यों जमीं इस खूबसूरत जहाँ में
कर्म आधार था जीने का कैसे जाति बनी
हरएक आँख में नमी इस खूबसूरत जहाँ में
जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों
गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में
सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर
भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में
यूँ तो मालिक सभी का एक नाम कुछ भी दे दो
कुसुम बने न मौसमी इस खूबसूरत जहाँ में
-कुसुम ठाकुर-
जो कह न सको तो
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on Sunday, July 24, 2011
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"जो कह न सको तो"
वो भी कैसा प्यार जो कह न सको तो
दिल में उठे बयार जो कह न सको तो
यूँ दूरियाँ सही पर दिल के करीब है जो
मिलने का इंतजार जो कह न सको तो
लम्बे सफर के सँग ही मजबूरियाँ बहुत
आयेगा क्या करार जो कह न सको तो
क्या प्यार रह सका है वश में किसी के
होते हैं दिल पे वार जो कह न सको तो
दिल में उसे बसाया जो स्वप्न था कुसुम का
दीदार में है प्यार जो कह न सको तो
- कुसुम ठाकुर-
नहीं है प्रेम की सीमा
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on Wednesday, July 20, 2011
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"नहीं है प्रेम की सीमा"
छवि बसती जो नैनों में उसे झुठलाया नहीं जाता
प्रेम का पाश बंधने पर उसे सुलझाया नहीं जाता
डूब जाए अगर प्रेमी झील सी गहरी आँखों में
नयन चार जब हो जाए तो शरमाया नहीं जाता
विकलता इंतजारी में धैर्य की क्या बने सीमा
मिलन को प्रेमी जब आतुर उसे तड़पाया नहीं जाता
समर्पण भाव से जब है झिझक फिर छोड़ना लाजिम
ख़ुशी और गम ह्रदय में जब उसे बिसराया नहीं जाता
नहीं है प्रेम की सीमा निहित हो भाव कोमल सा
कुसुम कोमल उसे काँटों से सहलाया नहीं जाता
-कुसुम ठाकुर-
था मेरा सचमुच कभी
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on Thursday, July 14, 2011
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"था मेरा सचमुच कभी"
उड़ सकूँ स्वछन्द होकर सोचा नहीं था यह कभी
मन के तारों से बंधूँ हो न सका मुमकिन कभी
नभ में तारा दिख गया इक थी चमक सबसे अलग
खोजती उसको थी कब से था मेरा सचमुच कभी
चांदनी भी श्वेत चादर ओढ़कर हँसती है जब
निस्तब्धता की वो तरंगे आ चूम लेगी फिर कभी
सीप अपना मुँह खोले राह कब से तक रहा है
बूँद स्वाति की गिरेगी आएगा वो दिन कभी
ओस बूंदों को समेटे देख निशिकर मुस्कुराये
और कुसुम रवि- तेज सहकर कुम्भला जाए न कभी
-कुसुम ठाकुर-
दुःख के दिन भी कट जायेंगे
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on Saturday, July 9, 2011
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आस है ऋतुराज से
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on Tuesday, July 5, 2011
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"आस है ऋतुराज से"
आज रूठूँ किस तरह जब पूछने वाला नहीं
दिल के कोने में छिपा गम ढूँढने वाला नहीं
ढूँढती है ये निगाहें हर तरफ मुमकिन अगर
कैसे कम हो दर्द दिल का बाँटने वाला नहीं
रुख हवा का मोड़ दूँ है दिल में हलचल इस तरह
अनुभूतियाँ स्पर्श की पर चाहने वाला नहीं
तान छेड़ूँ सप्त सुर में रागनी ऐसी कहाँ
संगीत की गहराईयों में डूबने वाला नहीं
आस है ऋतुराज से नव कोपलें हों फिर कुसुम
पत्तियाँ फिर से न सूखे सींचने वाला नहीं
- कुसुम ठाकुर-
कर में हरसिंगार
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on Monday, June 27, 2011
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"कर में हरसिंगार"
श्वेत केसरिया कोमल सुन्दर
हो तुम सौम्य प्रतीक
नम्र भाव को देख कर
भक्त हुए नत शीश
भक्त हुए नत शीश
तुमसे महके चारों दिशाएँ
हो भक्तों के भक्त
कष्ट भी उनके सोचते
गिरो भूमि यह रीति
देख तुम्हारी नम्रता
हुए भक्त विभोर
भूमि दोष देखे नहीं
देव चढ़ावें शीश
कद में छोटे हो मगर
सौरभ मन को भाए
सूचना आगमन का
फल होगा सुखदाय
तन्मय होकर चुन रही
चेहरे पर मुस्कान
शिव की करूँ आराधना
कर में हरसिंगार
-कुसुम ठाकुर-
मौन तराना सीख लिया
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on Sunday, June 26, 2011
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"मौन तराना सीख लिया"
तिमिर से रिश्ता है मेरा तो उसमे जीना सीख लिया
छूटे रिश्ते, तन्हाई के जहर को पीना सीख लिया
यादें आतीं वो बसंत जो बरसों पहले छूटा
दूर भले पर यादों में अब पास बुलाना सीख लिया
मिलते हैं कुछ लोग मुझे वे भीड़ में तन्हा जीते हैं
मीत बनाकर तन्हाई को हाथ मिलाना सीख लिय़ा
थिरक रही अब उन यादों में झूले मन सावन के
फ़िक्र करूँ क्या इस दुनिया की मौन तराना सीख लिया
जब हुई जुदाई बगिया से कुछ कुसुम गए देवालय तक
कुछ को सुन्दर सी परियों ने जूड़े में सजाना सीख लिया
- कुसुम ठाकुर-
तुम हो वही पलाश
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Kusum Thakur
on Tuesday, June 21, 2011
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"तुम हो वही पलाश"
सौंदर्य के प्रतीक
तुम हो गए विलुप्त
देख तुम्हें मन खुश हो जाता
भूले बिसरे आस
तुम हो वही पलाश
वह होली
न भूली अबतक
पिया प्रेम ने रंग दी जिसमे
दमक उठा मेरा अंग रंग
तुम हो वही पलाश
खेतों के मेड़ पर
खाली परती जमीन पर
न लगता अब वह बाग़
खाली परती जमीन पर
न लगता अब वह बाग़
अब कैसे चुनूँ हुलास
तुम हो वही पलाश
वह बसंत
क्या फिर आया
क्या फिर आया
पर खुशबू ही भरमाया
न भूली कभी बहार
तुम हो वही पलाश
-कुसुम ठाकुर-
दर्द की सौगात दूँ मैं
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Kusum Thakur
on Wednesday, June 15, 2011
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"दर्द की सौगात दूँ मैं"
है इबादत इश्क तो संगीत से पूजा करूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं
तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं
भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं
कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं
प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं
तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं
भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं
कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं
प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं
-कुसुम ठाकुर-
इबादत - ईश्वर की उपासना, पूजा
मुकम्मल - पूर्ण, पूरा
तिश्नगी - प्यास, पिपासा
संजीदगी - गंभीरता
रास्ते मुश्किल पड़ी है
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on Saturday, June 11, 2011
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"रास्ते मुश्किल पड़ी है"
याद आए जो घडी अब, वो घडी मुश्किल बड़ी है
देख जिसको मुस्कुराऊँ, क्या कोई मुमकिन कड़ी है
हो के विह्वल कह दूँ सारी, बातें दिल की सोचती
बेड़ियाँ भी कम नहीं है, रास्ते मुश्किल पड़ी है
नैन समझे सब इशारे, दर्द सहकर कह न पाए
हो किनारे कह सकूँ पर, वो बहुत नाजुक घड़ी है
तोड़ के बंधन सभी गर, कह सकूँ जज्बात दिल के
क्यूँ लगे आघात दिल को, आंसुओं की ये लड़ी है
है कुसुम की कामना, हर स्वप्न ही तुमसे सजेंगे
मुस्कुराऊँ याद में फिर, भाव की ऐसी लड़ी है
-कुसुम ठाकुर-
नैन बहुत कुछ कह जाते हैं
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Kusum Thakur
on Saturday, June 4, 2011
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मगर समर्पण मूल प्रेम का, यह भी तो इकरार करो
प्रेम की सीमा उम्र नहीं है जानो, मत अनजान बनो
भले ह्रदय में द्वन्द के कारण, चाहो तो इज़हार करो
बनो नहीं नादान कभी तुम, समझो सभी इशारों को
और समेटो हर पल खुशियाँ, कभी नहीं तकरार करो
चार दिनों का यह जीवन है,प्रेम फुहारें हों सुरभित
कहीं वेदना अगर विरह की, उस पल को भी प्यार करो
काँटों में रहकर जीने की, कला कुसुम ने सीख लिया
देर हुई है मत कहना फिर, आकर के स्वीकार करो
-कुसुम ठाकुर-
नहीं समझे?
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Kusum Thakur
on Friday, May 27, 2011
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"नहीं समझे"
दुखी करना नहीं जानूँ, मगर दुःख तुम नहीं समझे
उलझना क्यों है शब्दों में, अभी तक तुम नहीं समझे
मेरी उलझन मेरी बातें, न खुद समझी यही गम है
मैं चाहूँ पर मेरी चाहत, अभी तक तुम नहीं समझे
इशारे भी चिढाते हैं, करूँ फिर व्यक्त मैं कैसे
है जीना मूक बनकर क्यों, न सोचा जो वही समझे
है कहने को बहुत कुछ पर, यहाँ बंदिश नहीं कम है
हिलोरें दिल की समझूँ पर, थपेड़ों को नहीं समझे
निगाहें तुम न फेरोगे, सदा विश्वास है मुझको
अहम तेरी सदा खुशियाँ, ये उलझन भी नहीं समझे
जुदाई हो तो रूठे रब, कठिन होता बहुत सहना
मिलन में सुख तो होता है, तड़प को क्यों नही समझे
दिशा का ज्ञान मिलते ही, रहूँ संज्ञान मैं हरदम
इशारों से कहूँ कैसे कुसुम को भी नहीं समझे
-कुसुम ठाकुर-
हमारे देश की जनता कब जागेगी !
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Kusum Thakur
on Tuesday, May 24, 2011
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आलेख
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जमशेदपुर भी अब बाकी शहरों की तरह असुरक्षित हो गया है. आये दिन हत्या, अपहरण की वारदातें सुनने को मिलती है. कभी डॉक्टरों की हत्या तो कभी बैंक अधिकारी का अपहरण.
अभी हाल में ही एक बैंक के अधिकारी का अपहरण हो गया, जिसे अपहरणकर्ता ने बाद में फिरौती की रकम वसूल कर छोड़ दिया.
बैंक अधिकारी घर जाने के लिए निकले ही थे कि किसी ने गाड़ी रोक जबरदस्ती गाड़ी में सवार हो गया और उन्हें जंगल की और ले गया. जंगल में ले जाने के बाद अपहरणकर्ता ने ५० हज़ार रकम की मांग रखी और कहा उसी समय मंगवाकर दे. पत्नी से फ़ोन द्वारा पैसे मंगवाने की जिद्द की तो अधिकारी को उस सुनसान जंगल में कुछ नहीं सूझा और उसने पत्नी को फ़ोन कर दी कि उसे ५० हज़ार की अभी तुरंत जरूरत है किसी से मांगकर भेजे. पत्नी के पूछने पर कि पैसा कौन ले जायेगा .....अपहरण कर्ताओं ने उस अधिकारी से कह्वाया उसके बैंक का एक आदमी जाकर ले आयेगा. पर पत्नी से ५० हज़ार का इंतजाम नहीं हो पाया. अब उस अधिकारी को अपहरणकर्ता ने जबरदस्ती अपने दोस्तों और परिचितों को फ़ोन द्वारा रुपैये मंगवाने की धमकी दी.
अधिकारी क्या करता उन्होंने बारी बारी अपने दोस्तों और सहकर्मियों को फ़ोन से पैसे का इंतजाम करने कहता. अंत में एक सहकर्मी ने इंतज़ाम किया और उसे उनके खाते में डाल दिया. जिसकी पुष्टि हो गयी तो अपहरणकर्ता अधिकारी को ले गया और ATM से रुपैये निकलवाकर ले लेने के पश्चात अधिकारी को घर जाने की अनुमति दे दी. कुछ दिनों बाद फिर उसका फ़ोन आया और ५० हज़ार की मांग फिर उस अपहरणकर्ता ने रखी और साथ में धमकी भी कि अगर पुलिस को बताया तो बीवी बचे को उठवा लेगा. कोई चारा नहीं देख उस अधिकारी ने फिर ५० हज़ार उसे दे दिया, पर इस बार अपहरण कर्ता को अपने इलाके में ही बुलाकर पैसे दी. साथ ही पैसे देने के बाद पुलिस में खबर कर दी और एफआईआर भी दर्ज करवा दिया.
दरअसल अपहरणकर्ता को बैंक अधिकारी पहचानता है. वह कभी बैंक से क़र्ज़ लेने के सिलसिले में अधिकारी के पास आया था. क़र्ज़ के नियमो के अनुसार उसे क़र्ज़ नहीं मिल पाया था. इस वारदात के बाद अधिकारी ने पुलिस को सारी बातें बता दी थी और पुलिस ने आश्वासन भी दिया था कि अपराधी अवश्य पकड़ा जायेगा. परन्तु एक महीने से ऊपर हो गया है अबतक अपराधी नहीं पकड़ाया है. पुलिस अधिकारी आश्वासन तो देते हैं.... पर अपहरणकर्ता अब फिर से पैसे कि मांग कर रहा है. पुलिस कहती है वह अपराधी फरार है...पुलिस उसे ढूंढ रही है.
दहशत में पूरा परिवार है... अब उनके पास विकल्प क्या है ? क्या हमारी निकम्मी पुलिस सक्षम नहीं है कि अपराधी को ढूढ़ निकाले या यहाँ भी अपराधी ने पैसे से मुंह बंद कर दिया है? कुछ वर्ष पहले जिस शहर की शांति से प्रभावित होकर कई लोग यहीं बस जाते थे आज वही शहर बिलकुल असुरक्षित होता जा रहा है.
एक तरफ अतिक्रमण को हटाया जा रहा है दूसरी तरफ नेताओं के इशारे पर उनके आदमी अतिक्रमण कर रहे हैं. हमारे देश की जनता कब जागेगी ?















