होली

( कई दिनों से अस्वस्थता के कारण मैं कुछ नहीं लिख पाई हूँ, न ही पढ़ पाई हूँ, पर आज बिना लिखे न रह पाई और कुछ पंक्तियाँ लिख ही डाली )
" होली
 दिन हो होली या कि दिवाली , 
रहता था न दिल  कभी खाली । 
चटक रंग बसता ह्रदय में , 
उसे उतारूँ कैसे नयनो में ।
 देखि ज्यों मैं सरसों पीली , 
याद दिला गई बरसों की होली । 
बसंत बयार न लागता मुझको , 
कूक कोयल भी न भाये अब तो । 
 नींद खुली बस आहट पाकर ,
 कहा कोई कानों में गाकर । 
फागुन में मैं चातक बनकर , 
आया हूँ सजनी के दर पर ।।
 -कुसुम ठाकुर -

रोना भी क्या एक कला है


" रोना भी तो एक कला है "

रोना क्यों कर दुर्बलता है ?
यह तो नयनों की भाषा है

सुख देखे तो छलक जाता है
दुःख में फिर भी सहज आता है

लाख संभालो , न तब रुकता है
न निकट हो कोई आहत करता है

उमड़ घुमड़ जो बस जाता है
श्रांत ह्रदय वह कर देता है

रोना भी तो एक कला है
फिर क्यों लगे यह भरमाता है ?

- कुसुम ठाकुर -


कवि कोकिल विद्यापति


कवि कोकिल विद्यापति

"कवि कोकिल विद्यापति" का पूरा नाम "विद्यापति ठाकुर था। धन्य है उनकी माता "हाँसिनी देवी"जिन्होंने ऐसे पुत्र रत्न को जन्म दिया, धन्य है विसपी गाँव जहाँ कवि कोकिल ने जन्म लिया।"श्री गणपति ठाकुर" ने कपिलेश्वर महादेव की अराधना कर ऐसे पुत्र रत्न को प्राप्त किया था। कहा जाता है कि स्वयं भोले नाथ ने कवि विद्यापति के यहाँ उगना(नौकर का नाम ) बनकर चाकरी की थी। ऐसा अनुमान है कि "कवि कोकिल विद्यापति" का जन्म विसपी गाँव में सन १३५० . में हुआ अंत निकट देख वे गंगा लाभ को चले गए और बनारस में उनका देहावसान कार्तिक धवल त्रयोदसी को सन १४४० . में हुआ

यह उन्हीं की इन पंक्तियों से पता चलता है। :

विद्यापतिक आयु अवसान।
कार्तिक धवल त्रयोदसी जान।।

यों तो कवि विद्यापति मथिली के कवि हैं परन्तु उनकी आरंभिक कुछ रचनाएँ अवहटट्ठ(भाषा) में पायी गयी हैं अवहटट्ठ संस्कृत प्राकृत मिश्रित मैथिली है। कीर्तिलता इनकी पहली रचना राजा कीर्ति सिंह के नाम पर है जो अवहटट्ठ (भाषा) में ही है। कीर्तिलता के प्रथम पल्लव में कवि ने स्वयं लिखा है। :

देसिल बयना सब जन मिट्ठा।
ते तैसन जम्पओ अवहटट्ठा । ।

अर्थात : "अपने देश या अपनी भाषा सबको मीठी लगती है। ,यही जानकर मैंने इसकी रचना की है"।

मिथिला में इनके लिखे पदों को घर घर में हर मौके पर, हर शुभ कार्यों में गाई जाती है, चाहे उपनयन संस्कार हों या विवाह। शिव स्तुति और भगवती स्तुति तो मिथिला के हर घर में बड़े ही भाव भक्ति से गायी जाती है। :

जय जय भैरवी असुर-भयाउनी
पशुपति- भामिनी माया
सहज सुमति बर दिय हे गोसाउनी
अनुगति गति तुअ पाया। ।
बासर रैन सबासन सोभित
चरन चंद्रमनि चूडा।
कतओक दैत्य मारि मुँह मेलल,
कतौउ उगलि केलि कूडा । ।
सामर बरन, नयन अनुरंजित,
जलद जोग फुल कोका।
कट कट विकट ओठ पुट पाँडरि
लिधुर- फेन उठी फोका। ।
घन घन घनन घुघुरू कत बाजय,
हन हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
पुत्र बिसरू जुनि माता। ।

इन पंक्तियों में कवि ने माँ के भैरवी रूप का वर्णन किया है।

कुष्ठ रोग आश्रम में एक दिन


कुष्ठ रोग आश्रम में एक दिन

मेरा मन 5 फरवरी से अबतक विचलित है । कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा है , न खाने में मन लग रहा है, न ही लिखने का मन हो रहा है और न ही किसी और काम में । कल मेरे एक दोस्त ने यह सुन मुझसे बातें कर मेरा मन बहलाने की कोशिश करता रहा, पर आज सभी अपने परिवार और दोस्तों में व्यस्त होंगे ।

5 फरवरी को मेरे पति का जन्मदिन रहता है और मेरी कोशिश होती है मैं उस रोज़ कुछ मंदों के बीच बिताऊं । जमशेदपुर के ऐसे ही एक बस्ती की तलाश कर मैं इस बार 5 फरवरी को गई थी । यहाँ छोटे छोटे कई बस्तियां हैं जिनमें करीब 3000 - 4000 कुष्ठ रोगी रहते हैं । बाहर से देखने पर लगा कि यहाँ सरकार इनका काफी ख्याल रखती है । साफ़ सुथरी बस्ती और घर छोटे मगर रहने लायक थे। मुझे देख अच्छा लगा क्यों कि लिखा हुआ था भवन झारखण्ड सरकार द्वारा निर्मित ।

मैं अपने डॉक्टरों, कुछ मित्र और सहयोगियों के साथ जब वहाँ पहुँची उस समय तक वहाँ खाना बनना शुरू हो चुका था । जिन लोगों को उस कार्य का भार दी थी वे वहाँ मौजूद थे और खाना बन रहा था। वहाँ पहुँचते के साथ मरीज़ भी आ गए और पंक्ति में खड़े हो गए । एक एक की जाँच डॉक्टरों ने शुरू की और दवाई वितरण भी वहीँ एक तरफ होने लगा ।

मेरी आदत है जब भी मेडिकल कैंप में जाती हूँ डॉक्टर के बगल में बैठ डॉक्टर और मरीज़ की बातों को ध्यान से सुनती हूँ । एक एक मरीज़ को गौर से देखती और उनकी बातें सुन रही थी । बहुत कम लोग उस कैंप में थे जिन्हें कुष्ठ रोग नहीं था और किसी और रोग से ग्रसित थे ।



दवाई लेते रोगी

एक बच्चा जो कि मात्र 5 साल का था उसकी बारी आई तो उसकी माँ भी साथ में थी। उसने एक डॉक्टर की पर्ची दिखाई और कहने लगी " डॉक्टर साहब इस दवाई से मेरे बेटे को कोई फायदा नहीं हो रहा है "डॉक्टर साहब ने उससे पर्ची लेकर देखा और कहा डॉक्टर ने दबाई तो बिल्कुल ठीक लिखा है यही दबाई चलेगी । पाँच साल के बच्चे को एक तो कुष्ठ रोग उसपर दम्मा । खैर उसे हमने 6 महीने की दबाई दी और शायद आगे भी उसकी मदद कर सकूँ ।

तरह तरह के रोगियों को अलग अलग परिस्थिति में देख बहुत से प्रश्न मेरे मन में उठने लगे । उसी समय एक छोटी बच्ची आई । उसे सर्दी बुखार था ऐसा उसकी माँ ने कहा । डॉक्टर साहब ने उसकी गाल के तरफ दिखाकर कहा मुझे यहाँ कुछ fungus लग रहा है । उसकी माँ से पूछा " डॉक्टर ने कभी इसकी जांच किया है ? " उसकी माँ ने कहा नहीं । यह सुन डॉक्टर ने पूछा " यहाँ कभी कोई जांच के लिए आता है?" तब भी उस औरत ने कहा नहीं । यह सुन डॉक्टर साहब के साथ मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ।

बच्ची के जाने के बाद एक वृद्ध मरीज़ आया । उसके दोनों हाथों में एक भी उंगली नहीं थे । डॉक्टर साहब ने जांच के बाद दवाई लिखी और वहाँ ही दम्मे से ग्रसित उस व्यक्ति को ढेर सारे inhaler दे दवाई लेने को कहा । वह जैसे ही आगे बढ़ा अचानक डॉक्टर साहब को ध्यान आया और उन्होंने अपने सहायक को बुला बोला पहले उससे पूछो क्या उसके परिवार में कोई है जो उसे inhale करवा सके । मेरे मन में अनेकों प्रश्न बार बार उठ रहे थे मैं वहाँ से उठकर पंक्ति में लोगों को वस्त्र बांटने चली गयी । ध्येय यही था कि उनसे कुछ बात चित करूँ ।

कपड़े बाँटते हुए उनसे मैं तरह तरह के प्रश्न पूछती और वे जवाब दे रहे थे । मैं वहाँ के मुखिया को इशारे से बुलाई और सोची कुछ जानकारी इनसे भी ले लूँ । पर उससे जो जानकारी मिली उससे अबतक मैं आहत हूँ । मैं पूछी यह घर तो सरकार ने बनवाया है तो यहाँ इस रोग की जाँच ख़ास कर बच्चों में यह बीमारी न फैले, या उसकी जांच के लिए सरकार की ओर से कोई सुविधा मिलती है या नहीं ? उस मुखिया ने जो कहा वह इस प्रकार है : " दीदी यह रघुवर दास जी की बस्ती है और ये लोग आते ही हैं " मुझे यह सुन बहुत ख़ुशी हुई और मैं तुरंत बोली " यह तो अच्छा है चलो वे एक अच्छा कम कर रहे हैं , पर उन्हें क्यों नहीं बताते यहाँ बच्चों या जिन्हें यह बीमारी नहीं है उसकी जाँच करने कोई नहीं आता । " वह हँसने लगा ...बोला " दीदी वे हमारा हाल पूछने नहीं आते , वे तो सिर्फ वोट के समय आते है और हाथ हिला हिला कर पूछते है सब ठीक ठाक है न और उनके चमचे कहते हैं इस बार इसपर मुहर लगाना । कभी कभी कुछ खाना हमें मिल जाता है ।

एक दो दिनों में मैं यहाँ के कलक्टर से मिलकर उन्हें स्थिति कि जानकारी दूंगी । शायद वे उस बस्ती में डॉक्टरों को या उस विभाग के लोगों को भेजें ताकि उन छोटे छोटे बच्चों की जाँच समय पर हो पाए और रोग के फ़ैलने से पहले इलाज हो पाए ।


कहूँ याद करती !!

आज एक ऐसे व्यक्ति का जन्मदिन है जिसके साथ का एहसास मेरे जीवन में बहुत महत्व रखता है । जो मुझे १५ वर्ष की उम्र में मिला और २३ वर्षों में जन्मों का स्नेह दिया ।

एक अद्भुत कलाकार , एक हंसमुख इंसान , मातृ -भक्त , एक सफल पिता और पति । ऐसा व्यक्ति जो हर रिश्ते की अहमियत जानता हो और उसे बखूबी निभाए, बहुत कम देखने को मिलते हैं।

एक प्रश्न का जवाब मुझे आज तक नहीं मिल पाया है । किसी का जन्मदिन या शादी की वर्षगाँठ उसके नही रहने पर से ख़ुशी क्यों नहीं मनाते ? क्या उस दिन दुखी होना लाजमी है ? वह व्यक्ति यदि आपका प्रिय है तो वह व्यक्ति रहे न वह दिन आपके लिए शुभ ही होगा । क्यों न उस शुभ दिन को ख़ुशी से मनाया जाय ? उसकी यादों को यादगार बनाया जाय ।

मेरी आज की रचना मेरे पति श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को समर्पित है जिनका आज जन्मदिन है। जो कहने को तो मेरे पास नहीं हैं, पर उन्हें मैं सदा अपने पास ही महसूस करती हूँ ।



" कहूँ याद करती "

सारी रस्में निभाने की चाहत गज़ब थी ।
तुमको मगर मैं तो भूली ही कब थी ?

है बाहर समझ से करूँ याद क्यों मैं ?
उन यादों के मंज़र से निकली ही कब थी ?

बंद आँखों से देखूं तो मिलता सुकूँ है ।
मिला जो मुझे उसकी चाहत ही कब थी ?

तेरी परछाइयों से भी उल्फत है मुझको ।
यूँ भी बेज़ार तुमसे हुई मैं ही कब थी ?

याद तेरी जो दिल में इनायत से कम क्या ?
याद करती कुसुम जिसे भूली ही कब थी ?

- कुसुम ठाकुर -

संघर्ष में ही जीवन

"संघर्ष में ही जीवन"


रस्ते चली मैं जिस पर, छोडूँ उसे मैं कैसे ?
गैरों से न हूँ परेशां, खुद पर सितम न कम हो ।।


धिक्कार है मनुज को, अधिकार न दिया जो ,
संघर्ष में ही जीवन, संताप भी न कम हो ।।


जीवन के इस सफ़र में, मिलते तो सेज दोनों ,
फूलों की सेज पाकर, काँटों की चुभन न कम हो ।।


हौसला कहूँ उसे या, जज्बा है क्या न जानूं ।
अभिसार जिंदगी का, मुस्कान से न कम हो ।।


कुसुम की कामना है, मनुज के ही काम आए ,
बागों और घरों की,शोभा भी न कम हो ।।

-कुसुम ठाकुर -

हँसी के तले शिकन जो मिले

" हँसी के तले शिकन जो मिले "

मैं हँसती तो हूँ पर कहूँ मैं किसे
इस हँसी के तले शिकन जो मिले

कहूँ किस तरह दर्द के सिलसिले
दिखाऊँ किसे दर्द हैं जो मिले

न अरमानों की हसरत है मुझे
न दीवानगी न उल्फत ही मिले

हौसला है मिला उस सफ़र के लिए
मैं करूँ बंदगी पर सिफर ही मिले

- कुसुम ठाकुर -

भावाकुल मन ढूँढ़े तुमको


(आज नरक निवारण चतुर्दशी के अवसर पर यह कविता उस व्यक्ति को समर्पित करती हूँ जो मेरे लिए प्रेरणा , मेरे गुरु तथा साथी सदा थे और रहेंगे । संयोगवश आज उनका भी जन्मदिन है। )

" भावाकुल मन ढूँढ़े तुमको "


काश, आज आपने शब्दों को ,
अर्पित कर पाती मैं तुमको ।
मेरे मन का सहज भाव फिर ,
नया राग दे जाता मुझको ।


भूलूँ मैं कैसे उन पल को ,
मुझे लगे जैसे वह कल हो ।
नित्य नए एक रूप में देखी ,
समझ न पाई पर मैं तुमको ।


सुख की यादें बंद नयनों में ,
क्लांत ह्रदय वे कर देती हैं ।
दुःख भी तो लगता है सपना ,
याद करुँ जो उन पल तुमको ।


क्या कला क्या जीवन रंग हो ,
मैंने तो बस सीखा कल को ।
लाऊं कहाँ मनोवांछित पल वो,
भावाकुल मन ढूंढें तुमको ।।

- कुसुम ठाकुर -




रंग मंच सा लगता मुझको


" रंग मंच सा लगता मुझको "

रंग मंच सा लगता मुझको
मैंने दुनिया को ना जानी ।

जीवन के इस रंग मंच पर
कलाकार अद्भुत देखी है
निर्देशन का पता नहीं है
होती है अभिनय मन मानी
मैंने दुनिया को ना जानी ।

दो अन्जाने मिल जाते हैं
मिलकर अभिनय कर जाते है
अभिनय करना एक कला है
कला नहीं तो है नादानी
मैंने दुनिया को ना जानी ।

मंच जहाँ भी मिल जाता है
जाकर वहाँ ही रम जाते हैं
नहीं खबर है पटाक्षेप का
लगती है दुनिया अन्जानी
मैंने दुनिया को ना जानी ।

- कुसुम ठाकुर -


शब्द न मैं दे पाती हूँ



" शब्द न मैं दे पाती हूँ "

शब्दों के बस महाजाल में
उलझ उलझ रह जाती हूँ
लब तो है कहने को उद्धत
कुछ न मैं कह पाती हूँ


भावों की न कमी नयनों में
बस समझ उन्हें न पाती हूँ
उनके नम उद्गारों से क्यों
खुद विचलित हो जाती हूँ


अभिलाषा मेरे स्वभाव का
बस मुखर नहीं हो पाती हूँ
अंतर्मन की भाषा को क्यों
आत्मसात कर जाती हूँ


अंतर्द्वन्द को लिए ह्रदय में
उलझ स्वयं ही जाती हूँ
यह कैसी विह्वलता मेरी
शब्द न मैं दे पाती हूँ

- कुसुम ठाकुर -



जुस्तज़ू

"जुस्तज़ू "

प्यार मैं जो करूँ क्यों बगावत करूँ
कैसे अब मैं न उसकी इबादत करूँ

क्या खता थी मेरी मुझे नहीं है पता
किससे शिकवा करूँ क्या शिकायत करूँ

लब सिले हैं मेरे पर पशेमाँ भी हैं
कैसे इज़हार करूँ न अनायत करूँ

जुस्तज़ू थी मेरी जो मुझे मिल गई
इक कशक आबरू की हिफाज़त करूँ

सब कुसुम सा खिले मुस्कुराए दुनिया में
किसी को भला क्यों मैं आहत करूँ

- कुसुम ठाकुर -

बचपन

" बचपन "

याद मुझे बच्चों का बचपन ,
और याद उनका भोलापन ।
भाते थे उनका तुतलाना ,
और सदा उन्हें बहलाना ।

बचपन उनका बीता ऐसे ,
आँख भींचते रह गयी मैं जैसे।
चाहूँ बस स्मृतियों में वैसे ,
संचित कर रख पाऊँ कैसे।

सोच सोच मैं सुख पाऊँ
बिन सोचे न रह पाऊँ
नैनों को बस भरमाऊँ
और स्वयं ही मुस्काऊँ

- कुसुम ठाकुर -

मूल्य है हर पल का



"मूल्य है हर पल का"


मूल्य है हर उस पल का ,
चाहे सुख या दुःख के हों ।
दुःख की घड़ियाँ न रहे सब दिन ,
तो सुख की आस निरंतर क्यों हो ।


जो दुःख की घड़ियाँ सहज सँग हो ,
तो सुख बाँटन में भी सुख हो ।
जो मिल जाए, और विश्वास सँग हो ,
तो सुख और दुःख में भेद कम हो ।


सुख में उल्लास बढे विश्वास ,
दुःख में ही पहचान भी तो हो ।
आवे न जो दुःख, इस जीवन में ,
तो सुख का मोल, भी तो कम हो ।।

- कुसुम ठाकुर -


खोकर भी पाया इसी जिन्दगी से

" खोकर भी पाया इसी जिन्दगी से"

दिया है बहुत कुछ इस जिन्दगी ने
हँसाकर रुलाया इसी जिन्दगी ने

मझधार में भी छोड़ा जिन्दगी ने
डूबने से उबारा पर जिन्दगी ने

मैं सम्भली नहीं सम्भाला किसी ने
मुझे गर्त में जाने से उबारा किसी ने

करूँ जब शिकायत इस जिन्दगी से
चमत्कार दिखा दे जीवन में फ़िर से

मैं जो कुछ भी चाहूँ इस जिन्दगी से
रागनी बनकर छाये न जाए जिन्दगी से

मैं तो घबरा गयी विषम जिन्दगी से
है खोकर भी पाया इसी जिन्दगी से

- कुसुम ठाकुर -

भास्कर श्वेता को शादी की सालगिरह की अनेक शुभकामनाएँ और आशीर्वाद !!

"आशीर्वाद "

करूँ याद रिश्ते का यह दिन ।
हो ह्रदय में सदा कहे मेरा दिल।।

चलो साथ सदा भावे मुझको वह।
दूँ आशीष , कर उठे मेरा यह ।।

जब भी कहूँ, कहूँ बस यही कि ।
सँग दो तुम सदा एक दूजे का ।।

ज्यो हो विश्वास एक दूजे पर ।
आसान डगर तब जीवन भर ।।

- कुसुम ठाकुर -

प्रिय श्वेता/ भास्कर
शादी की सालगिरह की अनेक शुभकामनाएं और आशीर्वाद !!

8 December 2009

कैसे भूलूँ उस पल को !

"कैसे भूलूँ उस पल को यूँ "


कैसे भूलूँ उस पल को यूँ ,
जिसकी तपिश न हुई हो कम ।
दग्ध करे अब भी हर पल ,
थे अवसादों से भरे वे क्षण ।

चाही तो बस इन नयनों से ,
काश ! साथ वे दे पाते ।
अंसुवन को वश में रख लेती ,
तब भी यह दिल भर आता ।


याद जिसे करना चाहूँ मैं ,
उसे तो मैं फ़िर भी भूलूँ ।
पर बीच में वह मंज़र आ जाता ,
उस पल को कैसे भूलूँ ।।

- कुसुम ठाकुर -

H1 N1 का पूना में प्रकोप और नागरिकों में दहशत !

पूना में बहुत से अन्तराष्ट्रीय स्कूल हैं जिसकी वजह से बच्चों का बाहर के देशों से आना जाना लगा रहता है। अगस्त महीने में पूना में जब स्वाइन फ्लू का प्रकोप सामने आया और एक के बाद एक लोंगों की मृत्यु इस बीमारी से होने लगी तो आम नागरिकों के बीच एक दहशत सी फ़ैल गई । सरकार का स्कूल , कॉलेज, सिनेमा घरों एवं शौपिंग मॉल का बंद करना आग में घी का काम कर गया । आम नागरिकों की मनोरंजन गतिविधियाँ जैसे थम सी गई।

इस सब के बावजूद अच्छी बात यह है कि लोंगो में सफाई और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ी । पर क्या आम जनता को यह ज्ञान है कि उन्हें कौन सी एहतियात बरतनी चाहिए ? सुन लिए मास्क लगाना चाहिए बस दौड़ पड़े मास्क लेने । पूरा शहर यदि जागरूक हुआ तो वह था मास्क के प्रति । मास्क की बिक्री बढ़ गई। कुछ अच्छे ब्रांड की तो काला बाजारी भी होने लगी । हर नुक्कड़ हर दूकान पर मास्क उपलब्ध होने लगा । यहाँ तक कि पान वाले भी मास्क बेचने लगे । घरों और दफ्तरों की साफ़ सफाई करने वाले सफाई कर्मचारी भी मास्क लगाकर काम करने लगे भले ही उनको इसका ज्ञान न हो कि मास्क क्यों लगाईं जाती है और इसके क्या फायदे हैं ।

दफ्तरों में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा । डेटोल साबुन एवम सफाई करने वाले अन्य रासायनिक पदार्थों की बिक्री और खर्च बढ़ गई ।

कुछ सप्ताह सारे स्कूल, कॉलेज , सिनेमा घर इत्यादि को बन्द करने का प्रशासन ने आदेश दे दिया और बन्द भी रहे। पर कितने दिनों तक बन्द रहते , फिर से खुल गई है और लगा गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई । पर स्वाइन फ्लू का दहशत कम नहीं हुआ , डर तो अब तक बनी हुई है । कोई जरा सा छींका नहीं कि लोग उसे घूर कर देखने
लगते हैं । जरा सी सर्दी और बुखार से ही लोग घबरा जाते हैं, चाहे वह साधारण फ्लू ही क्यों न हो । सबके दीमाग में
एक ही बीमारी घूमती है , वह है स्वाइन फ्लू । कहीं यह स्वाइन फ्लू तो नहीं ? सारे स्कूल ,कॉलेज दफ्तर में स्पष्ट हिदायत है , जरा सी सर्दी बुखार हो तो न आयें । ऐसा माहौल है पर क्या पूरे शहर के लिए दो ही अस्पताल काफी है , जहाँ स्वाइन फ्लू की जांच होती है ? क्या "Tamiflu " हर मरीज़ को उपलब्ध हो पाता है या अब भी समय पर इसकी जाँच की सुविधा पर्याप्त है ?

मुझे एक वरिष्ट डॉक्टर से मिलने का मौका मिला था और मैं उनसे स्वाइन फ्लू के विषय में पूछ बैठी थी । उस समय उन्होंने बताया था , अभी पूरी तरह से यह बीमारी नहीं फैली है , न रोकी जा सकी है । महामारी का अंदेशा अब भी काफी है । आज वह सच साबित हो भी रहा है ठंढ में फ़िर से स्वाइन फ्लू का प्रकोप बढ़ गया है ।

मुझको कब यह वक्त मिला

"मुझको कब यह वक्त मिला "

मुझको कब यह वक्त मिला
कि सोच सकूँ क्या है भला
और क्या बुरा मेरे जीवन
की इस तन्हाई मे ।

मैं कहाँ समझ पाई अपने
अन्दर के उन भावों को
और जो समझूं तो करूँ मैं कैसे
सिंचित उन ख्वाहिशों को ।

पाई ख़ुद को वीराने में
सोची उसको क्षणिक प्रपंच
जीवन का यह सफ़र भी लंबा
  लगता न  कम रेतीला ।

साथ मिला बस चन्द कदमों का
नेह तो अब भी हुआ न कम
साथ साथ तो चल न पाए
पथ प्रदर्शक बन गए हो तुम ।।

- कुसुम ठाकुर -

मेरे दोस्त को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई !































"जन्मदिन "

चाहूँ मैं कहना बहुत कुछ ,
पर शब्दों की बंदिश न भाए ।
उपहार मैं चाहूँ कुछ देना ,
दूँ क्या यह समझ न आए ।
अपनी भावनाओं को कैसे ,
करुँ आज मैं व्यक्त ।
भावना तो मूक ही होती ,
स्नेह स्वरुप मैं लाई हूँ ।

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई !

-कुसुम -

पूर्ण विराम

पूर्ण विराम

सुना जब कहते हुए कि _
अर्ध विराम उनके जीवन में ,
इसकी तो कल्पना भी न थी ।
देखी जब मैं हूँ अकेली ,
गयी पास कही कानों में _
कुछ तो बोलो हो क्यों चुप ?
पर वह चुप्पी ऐसी कि ,
स्वप्न क्या तंद्रा भी टूटी ।
सारे सपने और लगी भी छूटी ,
पर मन माना न फ़िर भी ।
मन को देते हुए सांत्वना ,
बढ़ी ज्यों ही ठिठक गयी फ़िर ।
कानों को विश्वास न हुआ ,
सोची यह तो अर्ध विराम ।
लांघ इसे फ़िर बढ़ जाएगा ,
पर क्षण भर में ही भ्रम टूटा ।
लगा पूर्ण विराम और वह छूटा ।।

- कुसुम ठाकुर -