मेरे दोस्त को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई !
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Kusum Thakur
on Monday, November 30, 2009
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शुभकामनाएँ
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पूर्ण विराम
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Kusum Thakur
on Wednesday, November 25, 2009
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पूर्ण विराम
सुना जब कहते हुए कि _
अर्ध विराम उनके जीवन में ,
इसकी तो कल्पना भी न थी ।
देखी जब मैं हूँ अकेली ,
गयी पास कही कानों में _
कुछ तो बोलो हो क्यों चुप ?
पर वह चुप्पी ऐसी कि ,
स्वप्न क्या तंद्रा भी टूटी ।
सारे सपने और लगी भी छूटी ,
पर मन माना न फ़िर भी ।
मन को देते हुए सांत्वना ,
बढ़ी ज्यों ही ठिठक गयी फ़िर ।
कानों को विश्वास न हुआ ,
पर क्षण भर में ही भ्रम टूटा ।
लगा पूर्ण विराम और वह छूटा ।।
- कुसुम ठाकुर -
सुना जब कहते हुए कि _
अर्ध विराम उनके जीवन में ,
इसकी तो कल्पना भी न थी ।
देखी जब मैं हूँ अकेली ,
गयी पास कही कानों में _
कुछ तो बोलो हो क्यों चुप ?
पर वह चुप्पी ऐसी कि ,
स्वप्न क्या तंद्रा भी टूटी ।
सारे सपने और लगी भी छूटी ,
पर मन माना न फ़िर भी ।
मन को देते हुए सांत्वना ,
बढ़ी ज्यों ही ठिठक गयी फ़िर ।
कानों को विश्वास न हुआ ,
सोची यह तो अर्ध विराम ।
लांघ इसे फ़िर बढ़ जाएगा ,पर क्षण भर में ही भ्रम टूटा ।
लगा पूर्ण विराम और वह छूटा ।।
- कुसुम ठाकुर -
मुझे मेरा बचपन लौटा दो
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Kusum Thakur
on Monday, November 23, 2009
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" मुझे मेरा बचपन लौटा दो "
मुझे मेरा बचपन लौटा दो ,
कदम्ब तो नहीं झूले पर झुला दो ।
याद नहीं माँ की थपकी ,
और न मधुमय तुतलाना ।
स्मरण नहीं वे लम्हें अब तो ,
उन लम्हों को शाश्वत ही बना दो ।
मुझे मेरा ...................... ।
परीकथा की परी समझ ख़ुद ,
आते होठों पर मुस्कान ।
मेरे मन के निश्चल भावों को ,
पल भर को ही पंख लगा दो ।
मुझे मेरा ................... ।
अभिमानी अंचल मे भर दो ,
विपुल भावनाओं का हार ।
भोलापन यदि हो ना सम्भव ,
चंचलता थोड़ा ही सिखा दो ।
मुझे मेरा .................... ।
-कुसुम ठाकुर -
मुझे मेरा बचपन लौटा दो ,
कदम्ब तो नहीं झूले पर झुला दो ।
याद नहीं माँ की थपकी ,
और न मधुमय तुतलाना ।
स्मरण नहीं वे लम्हें अब तो ,
उन लम्हों को शाश्वत ही बना दो ।
मुझे मेरा ...................... ।
परीकथा की परी समझ ख़ुद ,
आते होठों पर मुस्कान ।
मेरे मन के निश्चल भावों को ,
पल भर को ही पंख लगा दो ।
मुझे मेरा ................... ।
अभिमानी अंचल मे भर दो ,
विपुल भावनाओं का हार ।
भोलापन यदि हो ना सम्भव ,
चंचलता थोड़ा ही सिखा दो ।
मुझे मेरा .................... ।
-कुसुम ठाकुर -
संस्मरण (दूसरी कड़ी )
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Kusum Thakur
on Tuesday, November 17, 2009
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कुसुम ठाकुर
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मुझे अपने बचपन की बहुत कम बातें ही याद , पर कुछ बातें जिसे माँ बराबर दुहराती रहती थी और हमेशा सबको बताती थी, वह मानस पटल पर इस तरह बैठ गए हैं कि अब शायद ही भूल पाऊँ । उनमें कुछ हैं मेरे और मेरे भाई के बीच का प्रेम।
मेरे बाबूजी उस समय भूटान में थे , मैं और मेरा भाई दोनों ही बहुत छोटे थे । उन दिनों मैं और मेरा भाई जिसे प्यार से हम बौआ कहते हैं और मुझसे १५ महीना छोटा है माँ के साथ दादी बाबा के पास रहते थे । हम दोनों भाई बहनों में बहुत ही प्यार था । बौआ तो फ़िर भी कभी कभी मुझे चिढा देता या मार भी देता था पर मैं उसे बहुत मानती थी । कभी कभी तंग करता तो उसे धमकी देती कि "मैं बाबुजी के पास चली जाऊँगी "। बौआ को यह अच्छा नही लगता था।
मुझे यह तो याद नहीं है कि उस दिन हुआ क्या था पर यह अच्छी तरह से याद है कि बौआ ने मुझे किसी बात को लेकर चिढाया और मैं बहुत रोई । उस दिन भी मैं और दिनों की भाँति उसे धमकी दी कि मैं बाबुजी के पास चली जाऊँगीपर वह न माना ।हम दोनों बाहर में खेल रहे थे, बस क्या था मैं वहीं से रोते हुए यह कह कर चल पड़ी कि मैं बाबुजी के के पास जा रही हूँ । बौआ को इसकी उम्मीद न थी कि मैं सच चल पडूँगी और मुझे जाता देख वह भी मेरे पीछे पीछे बढ़ने लगा। आगे आगे मैं रोती हुई जा रही थी, पीछे -पीछे बौआ "दीदी मत जाओ , बीच बीच में कहता " मेरी दीदी भागी जा रही है "। इस तरह से हम दोनों भाई बहन रोते हुए सड़क के किनारे तक पहुँच रुक गए । वहाँ एक बड़ा सा आम का बागीचा था और उस जगह पता नही क्यों मुझे बहुत डर लगता था , अतः उसके आगे न बढ़ पाई और वहीँ से रो रो कर बाबूजी को पुकारने लगी । मैं रो रो कर कहती "बाबुजी आप जल्दि आ जाईये बौआ मुझे चिढाता है "। मैं जितनी बार यह कहती बौआ भी रोते हुए कहता "दीदी मत जाओ अब मैं तुमको कभी नहीं मरुंगा न चिढाऊँगा घर चलो "। हम दोनों का इस तरह से रोना और मनाना उस रास्ते से जाता हुआ हर व्यक्ति देख रहा था और सब ने मानाने की कोशिश भी की पर हम न माने । अंत में सड़क पर भीड़ जमा हो गयी और उन्ही लोगों में से किसी ने जाकर बाबा दादी को हमारे बारे में बताया और दादी आकार हमें ले गयीं । घर जाने के बाद जब माँ हमसे पूछीं कि क्या हुआ तो मैं कुछ न बोली चुप रह गयी, अंत में बौआ से जब माँ ने पूछा तो वह सारी कहानी बता दिया ।
क्रमशः ............
भड़ास
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Kusum Thakur
on Sunday, November 15, 2009
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"भड़ास "
राज बाल की हिम्मत को
दिया चुनौती कईयों ने
पत्रकार तो पत्रकार
चिट्ठाकार भी कम नहीं
पत्रकारों ने बिक्री बढ़ाई
अखबार और पत्रिकाओं की
दूरदर्शन ने टी आर पी बढ़ाई
नेताओं के झूठे मंतव्यों से
फिर चिट्ठाकार क्यों पीछे रहें
हमने अपने चिट्ठों से
राज बाल के मंतव्यों के
बिना जड़ों को दिखाए हुए ही
सुशोभित किया अपने ब्लोगों को
कुछ चिट्ठाकार न रच पाए तो
उन्हें भी अफ़सोस नहीं
निकाल दिया अपनी भडास को
प्रतिक्रिया देकर चिट्ठों पर ।।
- कुसुम ठाकुर -
मेरा १०० वाँ पोस्ट
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Kusum Thakur
on Thursday, November 12, 2009
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(मेरा १०० वाँ पोस्ट मेरे उस साथी को समर्पित जिसने मुझ पर विश्वास किया ।)
"जीवन तो है क्षण भंगुर"
बिछड़ कर ही समझ आता,
क्या है मोल साथी का ।
जब तक साथ रहे उसका,
क्यों अनमोल न उसे समझें ।
अच्छाइयाँ अगर धर्म है,
क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।
सराहने मे अहँ आड़े,
अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।
ज्यों अहँ को गहन न होने दें,
तो परिलक्षित होवे क्यों ।
क्यों साथी के हर एक इच्छा,
को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।
सामंजस्य की कमी जो नहीं,
कटुता का स्थान भी न हो ।
कहने को नेह बहुत,
तो फ़िर क्यों न वारे हम ।
खुशियों को सहेजें तो,
आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।
दुःख भी तो रहे न सदा,
आपस में न बाटें क्यों ।
जो समर्पण को लगा लें गले,
क्यों अधिकार न त्यागे हम ।
यह जीवन तो है क्षण भंगुर,
विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।
-कुसुम ठाकुर -
बिछड़ कर ही समझ आता,
क्या है मोल साथी का ।
जब तक साथ रहे उसका,
क्यों अनमोल न उसे समझें ।
अच्छाइयाँ अगर धर्म है,
क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।
सराहने मे अहँ आड़े,
अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।
ज्यों अहँ को गहन न होने दें,
तो परिलक्षित होवे क्यों ।
क्यों साथी के हर एक इच्छा,
को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।
सामंजस्य की कमी जो नहीं,
कटुता का स्थान भी न हो ।
कहने को नेह बहुत,
तो फ़िर क्यों न वारे हम ।
खुशियों को सहेजें तो,
आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।
दुःख भी तो रहे न सदा,
आपस में न बाटें क्यों ।
जो समर्पण को लगा लें गले,
क्यों अधिकार न त्यागे हम ।
यह जीवन तो है क्षण भंगुर,
विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।
-कुसुम ठाकुर -
संस्मरण
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कुसुम ठाकुर
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एक बार मुझे किसी पत्रिका के लिए कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।
मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था ।
अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।
यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।
उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।
एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।
वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पडे तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।
मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।
लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा कि थी वो भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पडा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पडा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई साल तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नही है तो मन की शान्ति, नहीं है तो साथ ।
क्रमशः ............
संजो रही बस स्मृतियों को
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Kusum Thakur
on Saturday, November 7, 2009
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"संजो रही बस स्मृतियों को "
समय भी इतना बदल जायेगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।
हम तो रहते थे प्रतिपल ,
स्नेह सुधा लुटाने को ।
स्वयं के लिए न सोची अब तक ,
आज लगे सब बदला बदला ।
समय भी इतना बदल जाएगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।
खुशियों की तो बात ही क्या है ,
वह तो अपनो के सँग है ।
अब हम हर पल वारें किस पर ,
दूर देश मे वे बसते हैं ।
समय भी इतना बदल जायेगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।
यह मन बसता अब भी उनपर ,
जो हैं हमसे कोसों दूर ।
पर आह्लाद करें हम कैसे
संजो रही बस स्मृतियों को ।
समय भी इतना बदल जाएगा कभी सोची न थी ।
कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी ।
- कुसुम ठाकुर -
कब आओगे समझ न आये
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Kusum Thakur
on Thursday, November 5, 2009
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( आज मेरे लिए एक विशेष दिन है। यह कविता उस खास व्यक्ति को समर्पित है जिसने मुझे जीना सिखाया ।)
"कब आओगे समझ न आये"
मैं तो बैठी पलक बिछाए ,
कब आओगे समझ न आए ।
दिन भी ढल गया, हो गई रैना ,
जाने क्या ढूँढे ये नैना ।
हर आहट लागे कर्ण प्रिय ,
तिय धर्म निभाऊँ कहे यह जिय ।
कुछ कहने को भी उद्धत है हिय ,
समझ न आये करूँ क्या पिय ।
जानूँ मैं तुम जब आओगे ,
स्नेह का सागर छलकाओगे ।
फ़िर भी मेरे आर्द्र नयन हैं ,
सोच तिमिर यह ह्रदय विकल है।
- कुसुम ठाकुर -
ढूँढूँ तो पाऊँ मैं कैसे
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Kusum Thakur
on Thursday, October 29, 2009
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"ढूँढू तो पाऊँ मैं कैसे "
पर ढूँढूँ मैं तुमको वैसे ,
ढूँढूँ तो पाऊँ मैं कैसे ?
आज मैं कहना कुछ चाहूँ
पर ,कहूँ किसे यह समझ न पाऊँ ।
याद करूँ मैं हर पल तुमको ,
ढूँढूँ कैसे समझ न हमको।
कैसे बीता साथ सफर यह
समझ न पाई राज अभी वह।
अब तो लगता दिन भी भारी ,
रातों को तो स्वप्न ही सारी।
ध्यान में लिए छवि मैं सींचूं ,
पलक संपुटों में मैं भींचूं ।
जाने कब वह बस गयी उर में ,
चली गयी निद्रा के वश में ।
अर्ध रात्रि को नींद खुली तो ,
कानों ने यह बात सुनी तो _
मैंने तुमसे प्यार किया है ,
अपना सब कुछ वार दिया है ।
पर ढूँढूँ मैं तुमको वैसे ,
ढूढूं तो पाऊँ मैं कैसे ?
- कुसुम ठाकुर -
रहूँ मैं ऊहापोह में
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Kusum Thakur
on Wednesday, October 28, 2009
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"रहूँ मैं ऊहापोह में "
सोचूँ मैंने क्या बुरा किया ,
दिल की कही न छोड़ दिया ।
समय की पुकार को ,
किया कभी न अनसुना ।
किया कभी न आत्मसात ,
ह्रदय की पुकार को ।
चली तो सदा साथ साथ ,
समय को निहार कर ।
कठिन तो लागे है डगर ,
यह सोचूँ बार बार मैं ।
दिल की कही जो छोड़ दूँ । रहूँ मैं ऊहापोह में ।
- कुसुम ठाकुर -
कैसे कहूँ मुझे क्यों है फिकर इतनी
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Kusum Thakur
on Saturday, October 24, 2009
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कविता
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" मुझे क्यों है फिकर इतनी "
कैसे कहूँ मुझे क्यों है फिकर इतनी ,
कभी ख़ुद के लिए न शिकन जितनी ।
सुनी जब से है नासाज तबियत उसकी ,
न है चैन न पाऊँ तो ख़बर उसकी ।
कहने को तो दूर है वो मुझसे,
पर लगता है जैसे वो करीब रूह से ।
महसूस मैं करुँ बदलूँ जब करवट,
हाय इस हाल में तड़पूँ कब तक ।
लगूँ गैर सा मगर ये तड़प जब तक ,
आए भी न चैन न लूँ साँसें तब तक ।
कोई बतला दे मैं बयाँ करूँ कैसे ,
न मैं गैर, न हूँ अजनबी वैसे ।।
- कुसुम ठाकुर -
ख़ुद को मैं तन्हा पाई
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Kusum Thakur
on Friday, October 23, 2009
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"ख़ुद को मैं तन्हा पाई "
दुनिया की इस भीड़ में ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।
खुशियों के अम्बार को देखी ,
चाही गले लगा लूँ उसको ।
खुशियों के अम्बार में जाकर ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।
सोची दुःख में होश न होगा ,
चल पडूँ मैं साथ उसी सँग ।
दुःख के गोते खाई फ़िर भी ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।
सपनों के सपने मैं देखूँ ,
तन्हाई उसमे क्यों हो ।
पर सपना तो बीच में टूटा ।
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।
कहने को तो साथ बहुत से ,
पर साथ चलन को मैं तरसी ।
चाहे कहीं भी जाऊँ मैं तो ,
ख़ुद को मैं तन्हा पाई ।।
- कुसुम ठाकुर -
बस रहो तुम सदा मुस्कुराते हुए
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Kusum Thakur
on Wednesday, October 21, 2009
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"बस रहो तुम सदा मुस्कुराते हुए "
रहो तुम सदा मुस्कुराते हुए
यही एक तमन्ना, यही आरजू
कुछ कहूँ मैं तुम्हें तो सच मान लो ,
करो विश्वास हर मोड़ पर ।
मुझे अपने से ज्यादा भरोसा अगर ,
तुम पर ही है, यह मान लो
तुम जो भी कहो सिरोधार्य है,
कुछ प्रमाणित करो न यही मैं कहूँ
तुम कहते सदा मैं खुली हुई किताब ,
देर किस बात की, पढ़ लो मुझे
तुम चाहो अगर, पूछ सकते मुझे ,
मैं व्याख्या करूँ ,हर एक प्रश्न का ।
- कुसुम ठाकुर -
न वहाँ पर है चैन यहाँ पर न खुशियाँ
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Kusum Thakur
on Thursday, October 15, 2009
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"न वहाँ पर है चैन यहाँ पर न खुशियाँ "
न वहाँ पर है चैन, यहाँ पर न खुशियाँ ।
जाऊँ फिर कहाँ, पाऊँ मैं न पंथियाँ ।
है नन्हा सा दिल, कह सके सारी रतियाँ ।
पाऊँ मैं न ठौर, कहूँ कैसे बतियाँ ।
न वहाँ पर है चैन................ ।
थी मुद्दत से मेरी, तमन्ना यही कि ।
कोई मुझको मिल जाए, कह दूँ उसे कि ।
हो चाहत तुम मेरी, इबादत भी तुम हो ।
रहूँ मैं सदा बनके, तुम्हरी ही अँखियाँ ।
न वहाँ पर है चैन ................. ।
दिल की लगी अब, सहा भी न जाए ।
कहूँ अब मैं कैसे, कहा भी न जाए ।
मिला है तो बस, अब मेरे लब सिले हैं ।
खामोशियाँ हैं, बेबस हूँ मैं तो ।
न वहाँ पर है चैन ........... ।
- कुसुम ठाकुर -
जन्म मरण अज्ञात क्षितिज
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Kusum Thakur
on Friday, October 9, 2009
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"जन्म मरण अज्ञात क्षितिज"
जन्म मरण अज्ञात क्षितिज ,
जिसे समझ सका न कोई ।
न इसका कोई मानदंड ,
और न जोड़ है इसका दूजा ।
कभी लगे यह चमत्कार सा ,
लगे कभी मृगमरीचिका ।
कभी तो लागे दूभर जीवन ,
कभी सात जन्म लागे कम ।
धूप के बाद छाँव है आता ,
है यह रीति प्रकृति का ।
पर जीवन की धूप छाँव ,
रहे कभी न एक सा ।
कभी लगे जन्मों का फल ,
पर साथ भी फल है मिलता ।
पुनर्जन्म भी बीच में आए ,
पर नहीं सिद्ध है कर पाए
आत्मा तो है सदा अमर ,
दार्शनिकों का कहना ।
वैज्ञानिकों ने बस इतना माना ,
कुछ नष्ट न होवे पूर्णतः ।।
- कुसुम ठाकुर -
दिल की बातें
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Kusum Thakur
on Wednesday, October 7, 2009
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"दिल की बातें "
कहना चाहूँ दिल की बातें ,
पर कहूँ कैसे उसे ,
जिसे न है ख़ुद की ख़बर ,
वो करे कैसे परवाह मगर।
चाहूँ तो कहना बहुत कुछ ,
कहूँ कैसे समझ ना सकूँ ,
नयन तो फ़िर भी हैं उद्यत ,
पर होठ हिलते नहीं ।
हो गयी मुद्दत कि मैंने ,
दिल की कही अब छोड़ दी ,
शब्द तो लेतीं हिलोरें ,
पर कलम उठते नहीं ।
लेखनी तो ली हाथों में ,
पर शब्द जँचते नहीं ,
शब्दों की बंदिश न भाती ,
है मूक भावना मेरी।।
- कुसुम ठाकुर -
वीरान उपवन
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Kusum Thakur
on Monday, October 5, 2009
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"वीरान उपवन "
आज यह वीरान उपवन ,
किसकी बाट तक रहा है ।
शायद कोई माली आए ,
यह लगी मन में जगी है ।।
वह समय था जब कि उपवन ,
फूलों लताओं से महक उठता ।
पर आज उसकी दशा को ,
देखने न आते परिंदे ।।
था समय वह एक अपना ,
जब कि वह अभिमान में था ।
तितलियों की बात क्या थी ,
भौंरे भी मंडराते रहते ।।
कलियाँ जहाँ खिलखिलातीं ,
छटाएँ फूलों की निराली ।
रस चुरातीं मधुमक्खियाँ ,
अठखेलियाँ करता पवन भी ।।
है कोई उसका न माली ,
न कोई सींचे उसे अब ।।
जहाँ थे चुने जाते तिनके ,
सूखे पत्ते पड़े हुए अब ।।
- कुसुम ठाकुर -
चाहत
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Kusum Thakur
on Tuesday, September 29, 2009
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"चाहत "
जिन भावों की मैं, वर्षों से प्यासी
वह भाव आज, फ़िर से जगी है
जिस चाहत को मैं तो, भूल ही गई थी
वह चाहत मन में, जागृत हुई है
जिन नयनों को मैं, समझी कभी न
वे नयन अब मुझे, भाने लगे हैं
जिस द्वार पर मैं,न तकती थी उसपर
नजर मेरी अब तो, ठहर सी गई है
जिस समर्पण में न मुझे मिलती थी खुशियाँ
वह समर्पण मैं आज करने को उत्सुक
जिन खुशियों की मैं न की थी कल्पना
वह खुशी आज मिल ही गई है
- कुसुम ठाकुर -
जिन भावों की मैं, वर्षों से प्यासी
वह भाव आज, फ़िर से जगी है
जिस चाहत को मैं तो, भूल ही गई थी
वह चाहत मन में, जागृत हुई है
जिन नयनों को मैं, समझी कभी न
वे नयन अब मुझे, भाने लगे हैं
जिस द्वार पर मैं,न तकती थी उसपर
नजर मेरी अब तो, ठहर सी गई है
जिस समर्पण में न मुझे मिलती थी खुशियाँ
वह समर्पण मैं आज करने को उत्सुक
जिन खुशियों की मैं न की थी कल्पना
वह खुशी आज मिल ही गई है
- कुसुम ठाकुर -
वे लम्हें
Posted by
Kusum Thakur
on Tuesday, September 22, 2009
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कविता
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"वे लम्हें "
वे लम्हें भूले नहीं जाते ,
वे वादे चाहूँ भी न भूलूँ ।
पर यह कैसी मजबूरी ,
चाहकर, पाऊँ भी न तुमको ।
खुली हुई आँखों में तुम हो ,
बंद आँखों में भी बसा लूँ ।
व्याकुल हो ढूँढूँ मैं जब जब ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।
नैनो की भाषा भी तुम हो ,
चाहत की परिभाषा भी यही पर ,
सोचूँ तो लगे सपना सा ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।
अंसुवन की धार भी तुम हो ,
अंजन और श्रृंगार तुम्ही हो ।
पर करूँ कितना भी जतन मैं ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।
-कुसुम ठाकुर -
वे लम्हें भूले नहीं जाते ,
वे वादे चाहूँ भी न भूलूँ ।
पर यह कैसी मजबूरी ,
चाहकर, पाऊँ भी न तुमको ।
खुली हुई आँखों में तुम हो ,
बंद आँखों में भी बसा लूँ ।
व्याकुल हो ढूँढूँ मैं जब जब ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।
नैनो की भाषा भी तुम हो ,
चाहत की परिभाषा भी यही पर ,
सोचूँ तो लगे सपना सा ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।
अंसुवन की धार भी तुम हो ,
अंजन और श्रृंगार तुम्ही हो ।
पर करूँ कितना भी जतन मैं ,
चाहकर पाऊँ भी न तुमको ।
-कुसुम ठाकुर -

