मुझे आज मेरा वतन याद आया

मुझे आज मेरा वतन याद आया

मुझे आज मेरा वतन याद आया।
ख्यालों में तो वह सदा से रहा है ,
 मजबूरियों ने जकड़ यूँ रखा कि,
मुड़कर भी देखूँ तो गिर न पडूँ मैं ,
यही डर मुझे तो सदा काट खाए ।
मुझे आज ......................... ।


छोड़ी तो थी मैं चकाचौंध को देख ,
 मजबूरी अब तो निकल न सकूँ मैं,
करुँ अब मैं क्या मैं तो मझधार में हूँ ,
इधर भी है खाई, उधर मौत का डर ।
मुझे आज ............................... ।


बचाई तो थी टहनियों के लिए मैं ,
है जोड़ना अब कफ़न के लिए भी ।
काश, गज भर जमीं बस मिलाता वहीँ पर ,
मुमकिन मगर अब तो वह भी नहीं है ।
मुझे आज ................................ ।


साँसों में तो वह सदा से रहा है ,
मगर ऑंखें बंद हों तो उस जमीं पर।
इतनी कृपा तू करना ऐ भगवन ,
देना जनम  निज वतन की जमीं पर ।
मुझे आज .................................. ।

-कुसुम ठाकुर-


बरसों मैं तो भूल गयी थी

"बरसों मैं तो भूल गई थी"


बरसों मैं तो भूल गई थी
सारे अरमानों ख्वाबों को
भूल गयी थी मैं हँसना
या हँसी में शामिल होना।
आज अचानक मुझमे
आई ऐसी तब्दिली कि
ख़ुद पर ही हैरान हूँ मैं,
दिन सोची रात सोची
पर समझ न आया कुछ
आख़िर एक दिन जब मैं
गुम सुम बैठी नयन पथारे
सोच रही किसी और ठौर
छलकी होंठों पर हँसी
और लगी गुन गुनाने मैं
आ गई समझ मेरे यही कि
किसी की बातों और विश्वासों ने
मुझे फ़िर से वही चुलबुली
हँसने वाली बाला बना दिया

-कुसुम ठाकुर -

जो बीत गई उसे क्यों भूलूँ


जो बीत गई उसे क्यों भूलूँ

जो बीत गई उसे क्यों भूलूँ ?
वही तो मेरी धरोहर है
जिस पर नाज़ करूँ इतना
 साक्षात्कार कराया मुझको
जीवन की सच्चाई से
पग पग मेरे संग चला
और किया आसान डगर
अब क्या हुआ जो सँग नहीं
उसकी यादें करें मार्ग प्रशस्त
करे हर मुश्किलों को आसान
जो मैं याद करूँ हर पल
चाहे मन में ही सही
वह तो मेरे सँग ही है
मैं ने भी तो किया प्रयास
शायद मेरा कुछ दोष ही हो
अब जो छूटा तो हताश हूँ मैं
पर मैं कैसे न स्मरण करूँ ?
माना वह अब करे विचलित
जिसको मैं याद करूँ हर पल
पर यह तो एक सच्चाई है
जो बीत गई उसे क्यों भूलूँ ?

-कुसुम ठाकुर -

बेटियाँ




"बेटियाँ"

जीवन में थी एक तमन्ना ,
वह हुई आज पूरी
जब भी देखती बेटियाँ ,
सोचती हरदम
जीवन
की यह कमी ,
क्या होगी कभी पूरी ?
मेरे
घर भी आएगी ,
कोई रूठने वाली
नाजों
नखरों और फरमाइशें,
करूँगी मैं उसकी पूरी।
विदा करूँ मैं उसे पिया घर ,
ख़ुद हाथों से श्रृंगार कर
सूने घर को फ़िर निहार ,
बाट
तकुँ मैं हर त्यौहार पर
दिन
बीता साल बीते ,
और
आया ऐसा दिन
मुझे मिली नाजों नखरों ,
और फरमाइशें करने वाली
विदा भी करना पड़ा ,
और ताकूँ बाट

-कुसुम-

आपना तो बस आपना है


"अपना तो बस अपना है"

चाहे तुम कितना झुठलालो,
अपना तो बस अपना है।

कुछ भी कर लो ख़ुशी मना लो ,
पर अपनों की याद न छूटे,
अपनों से कितना भी रूठो ,
अपनों के साथ ही रुचे।

अपने देश की बात क्या कहना,
पास अगर तो मोल न समझें,
दूर हुए तो मन भर आये ,
उसकी मिट्टी को भी तरसें ।

-कुसुम ठाकुर -

स्वतंत्रता दिवस के दिन छाया रहा शाहरुख खान

हमारे यहाँ विशिष्ट व्यक्तियों की लम्बी फेहरिस्त है और उन्हें जो सुविधायें दी जाती हैं उसका वह इतना आदी हो जाता है कि जब वह बाहर जाता है और उसे सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ता है या फिर नियम कानूनों का पालन करना पङता है तो वह उसे असह्य हो उठता है और उसे वह अपना अपमान समझता है। विशिष्ट व्यक्ति के साथ उसके बाल बच्चे, पूरे परिवार को ही विशिष्ट का दर्जा प्राप्त हो जाता है। उसकी किसी भी प्रकर की सुरक्षा जाँच करना तो दूर उसे अधिकार प्राप्त हो जाता है सारे नियमों कानूनों तोड़ने का।

विदेशो और खास कर अमेरिका की नक़ल करने वालों ने क्या कभी इस बात पर गौर किया है कि वहाँ हर नागरिक के लिए नियम क़ानून एक है, चाहे वह राष्ट्रपति के बच्चे ही क्यों न हों? कभी उसकी भी नक़ल करें। " वहाँ राष्ट्रपति की बेटी को भी शराब पीकर गाड़ी चलाने की जुर्म में २४ घंटे के लिए जेल में डाल दी जाती है। यहाँ जेल में डालना तो दूर क्या मजाल कि किसी विशिष्ट व्यक्ति को, उसके बच्चों या परिवार के किसी भी सदस्य को सुरक्षा के नाम पर छू भी सकें या क़ानून तोड़ने के जुर्म पर सज़ा दे सकें।

शाहरुख खान को नेवार्क हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के लिए कुछ घंटे रुकना क्या पड़ गया हमारे देश की आजादी के जश्न का समाचार ही फीका पड़ गया। सारा दिन हर समाचार चैनेल पर शाहरुख़ खान ही छाया रहा। स्वतंत्रता दिवस तो फ़िर अगले वर्ष भी मनाई जायेगी पर शाहरुख खान की गिनती अगले वर्ष विशिष्टो में हो न हो?

यदि सच में इतना ख़राब लगा तो कभी" टॉम क्रूज़"(Tom Cruis) या "ब्राड पिट"(Brad Pitt) को यहाँ के सुरक्षा अधिकारीयों को सुरक्षा जाँच करने का अधिकार देकर तो देखें या फ़िर उनकी सुरक्षा जाँच करके तो देखें ? मगर नहीं यहाँ "टॉम क्रूज़" और "ब्राड पिट" तो दूर किसी भी गोरी चमड़ी को देख लिया बस सारे के सारे यह भूल जाते हैं कि हमारी आम जनता के अधिकार क्या हैं और वे किस सुविधा के अधिकारी हैं । सारे के सारे आम जनता की असुविधाओं को भूल बस उनके पीछे लग जाते हैं।

वह हंसती है

"वह हँसती है"

वह हँसती है..
पर क्या किसी ने उसकी हँसी के
पीछे की सिसकियों को देखा है ?
ऊपर से खिलखिला कर हँसने वाली
आत्मा की पुकार को देखा है ?
ऊपर से दृढ दिखने वाली को,
रातों के अँधेरे में बेसहारा होते हुए देखा है ?
मैंने देखा है..
वह हँसती है लोगों को झुठलाने के लिए 
दृढ दिखती है कमजोरी को छुपाने के लिए 
सहारा देती है तो बस , लोग उसे बेसहारा न कहें

-कुसुम ठाकुर-


गुम सुम सी बैठी रहती हूँ

"गुम सुम सी बैठी रहती हूँ " 
 
गुम सुम सी बैठी रहती हूँ। 
ख़्वाबों को ख्यालों को , 
नयनों मे बसाती रहती हूँ । 
थक जाते हैं मेरे ये नयन , 
पर मैं तो कभी नहीं थकती । 
गुम सुम ........................ । 
कानों को कभी लगे आहट , 
आते हैं होठों पर ये हँसी । 
पल भर की ये उम्मीदें थीं , 
दूसरे क्षण ही विलीन हुए । 
गुम सुम सी ................... । 
फिर आया एक झोंका ऐसा , 
सब लेकर दूर चला गया । 
अब बैठी हूँ चुप चाप मगर , 
न ख्वाब है, न ख़्याल ही है।
-कुसुम ठाकुर -

ख़ुद को ही न समझ पाई


ख़ुद को ही न समझ पाई

लोग दूसरों को नहीं समझते।
मैं ख़ुद को ही न समझ पाई।।

जब भी अकेली होती हूँ।
ख्यालों में डूब जाती हूँ।।

तलाशती हूँ मैं अपनी खुशी।
पर ढूंढ न पाऊं वह मैं ख़ुशी ।।

 जब भी लगता मंजिल यह मेरी।
तन्हाई भी संग मेरे।।

पर बेडियों ने जकड़ रखा।
न पैर मेरे उस ओर उठे ।।

 आखिर में आह मैं भरती हूँ।
ख़ुद की तलाश में भटकती हूँ।।

-कुसुम ठाकुर -

संस्मरण(चतुर्थ कड़ी )

टाटा स्टील के पदाधिकारी एवं कर्मचारियों मे सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाने के लिए टाटा स्टील प्रतिवर्ष एक अन्तर विभागीय नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करती थी। अपने अपने विभाग के पदाधिकारी और कर्मचारी इसमें भाग लेते थे परन्तु इस पर बहुत ही कम खर्च किया जाता था और यह बिल्कुल ही नीरस होता था जो मात्र संदेश के लिए होता था । इस नाटक में मात्र अपने विभागीय पदाधिकारी और कुछ दूसरे विभाग के लोग होते थे। टाटा स्टील में पद भर संभालने के कुछ ही महीने बाद श्री ठाकुर ने अपने विभाग के सुरक्षा नाटक में भाग लिया और उस नाटक के संवाद को कुछ अपने तरीके से फेर बदल कर उस नाटक में श्रेष्ठ कलाकार का पुरस्कार प्राप्त किया।


दूसरे वर्ष जब श्री ठाकुर को नाटक के लिए बोला गया तो उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया वे नाटक रविन्द्र भवन , जो कि जमशेदपुर का सबसे अच्छा प्रेक्षागृह था, में ही मंचित करेंगे। उस वर्ष नाटक रविन्द्र भवन में ही हुआ और उस नीरस विषय पर मंचित नाटक की प्रशंसा श्री ठाकुर जी को मिली साथ ही यहीं से उनके नाट्य यात्रा की शुरुआत भी हुई।


सुरक्षा नाटक की सफलता के बाद सदा श्री ठाकुर जी के मन में रहता था कि हिन्दी एवं अपनी मात्रृ भाषा मैथिली की सेवा अपने कलम से करें साथ ही उन्हें लगा कि अपने विचारों को आम जनता तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम भी यही है।यह उस समय की बात है जिस समय मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल आन्दोलन चल रहा था और निर्णय लिया गया था कि प्रत्येक शहर और गाँव से पोस्टकार्ड पर मैथिली को अष्ठम सूचि में शामिल करने का अनुरोध लिखकर प्रधानमन्त्री तक पहुंचाई जाय। जमशेदपुर से भी पोस्टकार्ड भेजने का निर्णय लिया गया और साथ ही एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन का भी निर्णय लिया गया जिसका भार श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दी गयी। समय कम था पर उन्होंने कुछ अलग सा कार्यक्रम करने की सोची।


उन्होंने एक संगीत संध्या करने की सोची और उस कार्यक्रम का नाम "संकल्प दिवस" दिया। पूरे कार्यक्रम के लिए मैथिली में गीत स्वयं लिख सारे गीतोंके धुन भी दी तथा मुख्य गायक भी स्वयं ही थे। उस कार्यक्रम के उद्घाटन गीत का नाम " संकल्प गीत" रखा। यह कार्यक्रम अत्यन्त ही सफल रहा ओर श्री ठाकुर जी के कला का परिचय जमशेदपुर के कलाकार और दर्शकों से हुआ।


"संकल्प दिवस" कार्यक्रम की सफलता ने श्री ठाकुर जी को नाटक मंचित करने को प्रेरित किया। उसी समय जमशेदपुर की मिथिला सांस्कृतिक परिषद् ने अपने महिला शाखा की स्थापना की थी और महिला शाखा की सदस्यों ने श्री ठाकुर जी से एक कार्यक्रम करने का अनुरोध किया जिसे उनहोंने स्वीकार भी कर ली और तय हुआ कि नाटक का मंचन होगा। श्री ठाकुर का पहला नाटक "बड़का साहब" उसी की देन है। उस नाटक की रचना के समय की एक एक बातें अब भी मुझे याद हैं।उन्होंने इतने सरल और सामान्य भाव से नाटक लिखा कि मालुम ही नहीं हुआ कि नाटक लिखना भी किसी के लिए कठिन काम हो सकता है। उसके एक एक संवाद मुझे कई कई बार सुनना पडा था। पूर्वाभ्यास से पहले ही मुझे नाटक के सारे संवाद याद हो गए


बड़का साहब का पूर्वाभ्यास महिला शाखा की एक सदस्य के घर पर ही होता थाकलाकार के चुनाव में ही अंदाजा हो गया कि जितने भी इच्छुक कलाकार थे सभी नए थेकलाकार के आभाव में मुख्य भूमिका श्री ठाकुर को स्वयं ही करना पड़ा हम चारों प्रतिदिन पूर्वाभ्यास में जाते थेविक्की को तो उस नाटक में बाल कलाकार की भूमिका निभानी थी मुझे नाटक सम्बंधित अनेको कार्य बता दिया था और उन सब के लिए प्रतिदिन नाटक का पूर्वाभ्यास देखना जरूरी था न जाने क्यों, शायद महिला शाखा की सदस्यों को इनके कार्य करने का ठंग पसंद नहीं था या उन्हें यह विशवास नहीं था कि नाटक अच्छा होगा, पर वे प्रतिदिन पूर्वाभ्यास के दौरान कुछ न कुछ नाटक किया करती थीं कुछ को तो होता था कि उन्हें नाटक का अधिक ज्ञान था पर असलियत यही होता है कि हर निर्देशक की अपनी सोच होती है और वह उसी के अनुसार निर्देशन करता है एक तो कलाकार अच्छे नहीं थे दूसरा बिल्कुल नए, व्यवस्थापक ऐसे कि हर बात में टांग अड़ाने की तो जैसे उन्होंने ठान ली थी हर दिन श्री ठाकुर जी उन व्यवस्थापक को समझाते कि वे निश्चिंत रहें नाटक अच्छा होगा ही पर वे नहीं समझतीं पूर्वाभ्यास के बाद प्रतिदिन मैं और बालमुकुन्द जी श्री ठाकुर जी को समझाती एक तो अच्छे कलाकार का अभाव दूसरा व्यवस्थापकों का हस्तक्षेप उसी नाटक में श्री ठाकुर जी ने सोच लिया कि दूसरों या दूसरी संस्था के लिए नाटक नहीं करेंगे, वह भी महिलाओं के लिए तो बिल्कुल ही नहीं


नाटक मंचन की तारीख से तीन चार दिन पहले श्री मति इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी और प्रशासन की ओर से सारे कार्यक्रम रद्द करने का आदेश आ गया
नाटक के मंचन की दूसरी तारीख तय करने में देरी नहीं की गयी और सभी समाचार पत्रों में भी दे दी गई पर नाटक मंचन की पूर्व तारीख के दिन कुछ लोगों और कलाकारों को साथ लेकर खुद भी रविन्द्र भवन के सामने खड़े हो गए जिससे आम लोगों को तकलीफ न हो


२० नवम्बर को जमशेदपुर में बड़का साहब नाटक का सफल मंचन हुआ जिसे देख जमशेदपुर वासी अचम्भित रह गए
पहली बार किसी मैथिली नाटक का मंचन टिकट पर हुआ था "बड़का साहब" नाटक की सफलता और अनुभव ने श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को दूसरा नाटक लिखने और मंचित करने पर बाध्य कर दिया

संस्मरण (तीसरी कड़ी )

मालुम नहीं मैं इसे क्या कहूँ लगाव या बंधन। शादी के एक वर्ष बाद जब मैं जमशेदपुर आयी थी उस समय सोची भी नहीं थी कि जमशेदपुर से इतनी सारी यादें जुड़ जाएँगी। कुछ ऐसी यादें जो मुझे खुशियाँ देंगीं कुछ दर्द का एहसास कराएंगी और कुछ तो जीवन भर सालती रहेंगी। जीवन का सबसे ज्यादा समय इस लौह नगरी में बिताउंगी यह भी तो नहीं जानती थी। पर होता वही है जो उसको मंज़ूर हो। किसके नसीब में कहाँ की मिट्टी है यह तो किसी को नहीं पता पर आज जो बंधन या लगाव मुझे जमशेदपुर से है वह मैं भी नहीं जानती क्यों?


शादी के एक वर्ष बाद जब मैं अपने बाबुजी के साथ जमशेदपुर आयी थी उस समय समय मेरे पति पढ़ रहे थे। सोची कुछ महीने बाद द्विरागमन (गौना ) हो जाएगा और तब मैं अतिथि की तरह कभी कभी आउंगी वह भी जब तक बाबुजी की बदली कहीं और नहीं हो जाती। यह किसको पता था कि बाबुजी की तो बदली हो जायेगी, मैं ही यहाँ रह जाउंगी। यहाँ तक कि मेरे दोनों बच्चों का जन्म भी यहीं होगा।

बाबुजी की बदली होने से कुछ महीने पहले मेरे पति श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर को, जो पहले गंगा ब्रिज पटना में कार्यरत थे, टाटा स्टील में नौकरी मिल गयी। उसी वर्ष मेरे छोटे बेटे का जन्म हुआ था। बाबुजी तो राँची चले गए, हम जमशेदपुर ही रह गए। पहली बार अकेले वह भी दो दो बच्चों को लेकर रहने का मौका मिला। उसके पहले एक बार कुछ दिनों के लिए मैं पटना में अपने पति के साथ रही थी। मेरा बड़ा बेटा उस समय बहुत छोटा था।


कैसे समय बीते, पता ही नहीं चला। बड़ा बेटा पुत्तु (भास्कर)स्कूल जाने लगा मुझे उसके स्कूल का पहला दिन अब भी वैसे ही याद है। पास के ही एक नर्सरी स्कूल में उसका नाम लिखवाई थी । प्रतिदिन मेरे पति ऑफिस जाते समय उसे स्कूल छोड़ आते ओर मैं छुट्टी समय उसे लेने जाती थी। एक दिन संयोग से मेरा एवं मेरे पति, दोनों की घड़ी खरब हो गयी। मैं हर दिन सुबह नहलाने के बाद विक्की (छोटे बेटे)को सुला देती और जब पुत्तु के छुट्टी का समय होता तब तक वह उठ जाता था। उस दिन विक्की कुछ देरी से सोया, मैं काम में व्यस्त थी समय का भान ही नहीं हुआ। अचानक ध्यान आया और विक्की को गोद में लेकर जल्दी जल्दी स्कूल की ओर चल पड़ी। मैं जैसे ही स्कूल की ओर जाने के लिए मुड़ी अचानक मेरे कानों में पुत्तु के रोने की आवाज आयी और मेरी नजर सामने वाली सड़क पर गयी। उस सड़क से पुत्तु रोता हुआ दौडा चला आ रहा था साथ में उसकी अध्यापिका थीं। मैं अपने स्थान पर ही खड़ी हो गयी। पुत्तु दौड़ता हुआ मेरे पास आकर मुझसे बिल्कुल लिपट गया। मै उसे लेकर घर आ गयी और कुछ देर बाद उससे पूछी" तुम रो क्यों रहे थे? " उसने बड़े ही भोलेपन से जवाब दिया " मैं तो सोचा तुम मुझे छोड़, विक्की के साथ कहीं जा रही थी। लेने क्यों नहीं आयी"? मुझे भीतर से अपने आप पर बहुत ही गुस्सा आया। उस बाल बोध की कही बातें आज भी मुझे याद हैं और जब भी अकेली होती हूँ बच्चों द्वारा कही गयीं इस तरह की बातें सोच सोच कर अपने आप ही खुश होती हूँ। ऐसा लगता है मानो आज की ही घटना हो।


समय की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि पता ही नहीं चला कब विक्की भी स्कूल जाने लायक हो गया। बचपन से ही मेरे पति को लिखने एवं नाटक का शौक था और स्कूल कॉलेज की सारी नाट्य एवं कला की गतिविधियों में सक्रीय रहे। जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो कलाकार मन ज्यादा दिनों तक चुप न बैठ पाया और वे अपनी नाट्य गतिविधियों में जुट गए। शुरुआत तो उन्होंने की "टाटा स्टील" के सुरक्षा नाटक से पर वह शौक सिनेमा तक पहुँच गया।

कवि कोकिल विद्यापति (तृतीय)

कवि कोकिल विद्यापति


कहा जाता है कि महा कवि विद्यापति की भक्ति एवं पद की माधुर्य से प्रसन्न हो" त्रिभुवन धारी शंकर"
उनके यहाँ उगना(नौकर) के रूप में उनकी सेवा की।

विद्यापति को उगना जंगल में मिला था और उस दिन से वह विद्यापति की चाकरी करने लगा। एक बार भगवन शंकर उगना के साथ जंगल के रास्ते कहीं जा रहे थे। उन्हें जोरों की प्यास लगी। भगवान शंकर ने पानी पीने की इच्छा उगना के सामने रखी और कहा इस वन प्रदेश में कुँआ और पोखरा तो कहीं मिलेगा नहीं। उगना यह सुनते ही कह उठा कि उसे वहां का कुआँ देखा हुआ था और वह पानी लेने चला गया। कवि जब भी उससे कुछ लेने कहते वह तुंरत लाकर दे देता था जिससे कवि को बहुत आश्चर्य होता। उस दिन पानी पीकर कवि समझ गए कि वह तो गंगा का पानी था और उगना से इसकी चर्चा की। उगना के रूप में भगवन शंकर को तब असली रूप में आना पड़ा। उस समय उन्होंने विद्यापति से वचन लिया कि वे किसी को उनका असली रूप नहीं बताएँगे और जिस दिन बता देंगे उस दिन वह अंतर्ध्यान हो जायेंगे।

एक दिन उनकी धर्मपत्नी ने उगना को कुछ लाने को कहा पर उगना ने लाने में बहुत देर कर दी। ज्यों ही उगना उनके सामने आया वह उसे जलावन वाले लकडी लेकर मारने दौडीं, यह देख विद्यापति के मुहं से निकल गया "यह क्या कर रही हो साक्षात शिव को मार रही हो"। इतना सुनना था कि शिव जी अंतर्ध्यान हो गए। तत्पश्चात कवि जंगल जंगल भटक व्याकुल हो गाते :

उगना रे मोर कतय गेलाह।
कतय गेलाह शिव किदहु भेलाह।।

भांग नहिं बटुआ रुसि बैसलाह।
जोहि हेरि आनि देल हंसि उठलाह।।

जे मोर कहताह उगना उदेस।
ताहि देवओं कर कंगना बेस। ।

नंदन वन में भेंटल महेश।
गौरी मन हखित मेटल कलेश। ।

विद्यापति भन उगना सों काज।
नहि हितकर मोर त्रिभुवन राज। ।

कवि विद्यापति की इन पाक्तियों में व्याकुलता और शिव जी को खोने का दुःख भरा हुआ है। कवि कहते हैं :

हे मेरे उगना तुम कहाँ चले गए। हे शिव यह क्या हो गया, कहाँ चले गए। भांग नहीं है इसलिए शिव मुझसे रूठ गए हैं। ढूंढ कर ला दूँगा तो फिर खुश हो जायेंगे। मुझे तो महेश नंदन वन में मिले थे और उनके आने से गौरी का मन हर्षित हो उठा था सारे क्लेश दूर हो गए थे। अंत में विद्यापति कहते हैं, उगना से काम करवाकर मैंने त्रिभुवन के राजा के साथ अच्छा नहीं किया।




कवि कोकिल विद्यापति(द्वितीय)


कवि कोकिल विद्यापति


कवि विद्यापति ने सिर्फ़ प्रार्थना या नचारी की ही रचना नहीं की है अपितु उनका प्रकृति वर्णन भी उत्कृष्ठ है। बसंत और पावस ऋतु पर उनकी रचनाओं से मंत्र मुग्ध होना आश्चर्य की बात नहीं। गंगा स्तुति तो किसी को भाव विह्वल कर सकता है। ऐसा महसूस होता है मानों हम गंगा तट पर ही हैं।

गंगा स्तुति


बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे।
छोड़इत निकट नयन बह नीरे। ।

कर जोरि बिनमओं विमल तरंगे।
पुन दरसन दिय पुनमति गंगे। ।

एक अपराध छेमब मोर जानी।
परसल माय पाय तुअ पानी । ।

कि करब जप तप जोग धेआने।
जनम कृतारथ एक ही सनाने। ।

भनहि विद्यापति समदओं तोहि।
अंत काल जनु बिसरह मोहि। ।

उपरोक्त पंक्तियों मे कवि गंगा लाभ को जाते हैं और वहां से चलते समय माँ गंगा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि :

हे माँ गंगे आपके तट(किनारा) पर बहुत ही सुख की प्राप्ति हुई है, परन्तु अब आपके तट को छोड़ने का समय आ गया है तो हमारी आँखों से आंसुओं की धार बह रही है। मैं आपसे अपने हाथों को जोड़ कर एक विनती करता हूँ। हे माँ गंगे आप एक बार फिर दर्शन अवश्य दीजियेगा।

कवि विह्वल होकर कहते हैं : हे माँ गंगे मेरे पाँव आपके जल में है, मेरे इस अपराध को आप अपना बच्चा समझ क्षमा कर दें। हे माँ मैं जप तप योग और ध्यान क्यों करुँ जब कि आपके एक स्नान मात्र से ही जन्म सफल हो जाता है, कृतार्थ हो जाता है।

अंत मे विद्यापति कहते हैं हे माँ मैं आपसे विनती करता हूँ आप अंत समय में मुझे मत भूलियेगा अर्थात कवि की इच्छा है कि वे अपने प्राण गंगा तट पर ही त्यागें।




संस्मरण(दूसरी कड़ी)

मैं जिस दिन पन्द्रह साल की हुई उसके ठीक दूसरे दिन मेरी शादी हो गयी। शादी का मतलब क्या होता है यह भी तो मैं नहीं जानती थी। मुझे तो यह यह भी पता नहीं था कि दीदी की शादी के तुंरत बाद मेरी भी शादी हो जायेगी। मैं तो मैट्रिक की परीक्षा देकर खुशी खुशी अपनी दोस्तों को यह कह कर गाँव गयी थी कि अपने चाचा की बेटी यानि अपनी बड़ी बहन बहन की शादी में जा रही हूँ खूब मस्ती करूंगी। मैं उससे पहले कभी शादी नहीं देखी थी। मैं अपने सारे भाई बहनों में सबसे बड़ी हूँ पर मुझे बचपन में बड़ी बहन का बहुत शौक था। जब भी मेरी सहेलियां अपनी बड़ी बहन की बातें करतीं तो मैं दुखी हो जाती जो मेरी बड़ी बहन नहीं हैं।

मेरे चाचा की शादी मेरी मौसी से हुई है। मैं उन्ही के पास रह कर राँची में पढ़ रही थी, कारण मेरे बाबुजी उस समय अरुणाचल में पदासीन थे और वहां केवल छोटे बच्चों के लिए ही स्कूल थी। हम छः भाई बहनों में से मैं और मेरा बड़ा भाई चाचा के पास राँची रह गए और बाकी तीन बहनें और सबसे छोटा भाई बाबुजी माँ के साथ अरुणाचल चले गए।

दीदी की शादी में मैं अपने चाचा मौसी के साथ गयी थी और माँ बाबुजी अरुणाचल से आए थे। मुझे इस बात की बहुत खुशी थी कि पहली बार किसी की शादी वह भी अपने घर में देखूंगी, साथ ही अपने माँ बाबुजी और सभी भाई बहनों से मिलूंगी यह सोचकर खुशी और दुगनी हो रही थी। शादी के तुंरत बाद बाबुजी और चाचा कहीं चले गए। कहाँ वह तो मुझे किसी ने बताया भी नहीं और मैं अपने भाई बहनों और सहेलियों में इतना व्यस्त थी कि जानने की इच्छा भी नही हुई। खूब आम खाती और खूब खेलती थी।

वैसे तो हम जब भी जाते तो दादी हमे बहुत मानतीं थीं पर इस बार मुझे कुछ ज्यादा ही मानतीं थी। एक दिन सुबह जब मेरी नींद खुली और अपने कमरे से बाहर आयी तो कुछ अजीब ही लगा। घर में सभी व्यस्त थे दादी सब को डांट कर कह रही थीं जल्दी जल्दी सब काम करो अब समय नहीं है। मुझे देखते ही बोल पड़ीं यह देखो अभी तक मेरी पोती फ्राक में ही घूम रही है। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। मैं धत बोल कर वहां से चली गयी। मुझे लगा शायद कल मेरा जन्मदिन है और दादी पहले से ही मुझे चिढाने के लिय कह रही थीं जन्मदिन के दिन इस बार साड़ी पहनना पड़ेगा इसलिए ऐसा कह रहीं हैं।

अचानक चाचा को बाबा के साथ आँगन में घुसते हुए देखी। चाचा की नज़र ज्यों ही मुझपर पड़ी तुंरत कह उठे अरे मिठाई खिलाओ तुम्हारी शादी ठीक करके आया हूँ। मैं तो बिल्कुल आवाक रह गयी। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था क्या कहूँ ? कुछ कहना भी चाहिए या नहीं? यह खुशी की बात है या........? हाँ एक बात अवश्य दिमाग में आया और मैं दुखी हो गयी। मैं तो अपनी दोस्तों को कह कर आयी थी कि मैं अपनी बहन की शादी में जा रही हूँ। वह भी इतराते हुए कही थी क्यों कि अक्सर किसी न किसी सहेली को अपने भाई बहनों की शादी में जाना होता था और जब वे मुझे सुनातीं तो बहुत बुरा लगता था। मैं शादी के विषय में क्या सोचूंगी, सोचने लगी अपनी सहेलियों को क्या कहूँगी। वे तो मेरा मजाक बना देंगीं कि अपनी बहन की शादी का कह कर गयी और अपनी ही शादी कर आ गयी। मैं सारी रात यही सोचती रह गयी। माँ को भी मैं खुश नहीं देखी।

चाचा सिर्फ़ ख़बर करने आए थे शादी की तैयारी तो यहाँ दादी बाबा को ही करना था। चाचा दिन में खाने के बाद चले गए। दूसरे दिन सुबह बाबुजी आए और उनको चाय वगैरह देने के बाद माँ को पूछते सुनी लड़का क्या करता है। बाबुजी ने और क्या कहा वह तो नहीं सुनी पर यह सुनी कि लड़का इंजीनियरिंग में पढ़ता है। बाबुजी से बात करने के बाद से माँ भी खुश दिखीं।जन्मदिन के दिन दादी की ही बात रही और मुझे शाम में थोडी देर के लिए साड़ी पहनना पडा। जन्मदिन के दिन सुबह सुबह बाबुजी भी आ गए। बाबुजी जिस दिन आए उसके दूसरे दिन मेरी शादी खूब धूम धाम से हो गयी। मेरे पति उस समय इंजीनियरिंग में पढ़ते थे।

क्रमशः ........

मोमबत्ती का रस्म

जन्मदिन 
 एक बार मैं अपने पति से बोली 
इस बार मैं अपना जन्मदिन 
खूब धूम धाम से मनाऊंगी। 
पति बोले अरे भाग्यवान 
जन्मदिन तो मना लोगी 
उस रस्म का क्या करोगी 
जिसमे केक काटी जाती है 
और केक पर उतनी ही 
मोमबत्तियां लगाई जातीं हैं 
जितने उम्र के लोग होते हैं। 
इतने दिनों से तुम अपनी 
उम्र छुपाती आयी हो 
जन्मदिन मनाओगी तो 
सारा भेद खुल जाएगा। 
ऐसा करते हैं _ 
बारह को तुम्हारा जन्मदिन है 
तेरह को हमारी शादी का सालगिरह 
क्यों न हम 
तेरह को दोनों ही धूम धाम से मना लें 
कहने को शादी का सालगिरह 
और मोमबत्तियां बस उतनी ही 
जितने सालों से मैं तुम्हें 
 झेलता आया हूँ।।
-कुसुम ठाकुर-

एक लब्ध प्रतिष्ठित डॉक्टर को श्रद्धाँजलि

स्व. डॉ. मोहन राय





डॉ. मोहन राय एवं उनकी पत्नी डॉ. विमल यादव मयुर एवं अनुराधा के साथ

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि हजारों को जीवन दान देने वाले डॉक्टर (cardiac thoracic surgeon)। जिसने कईयों को जीवन दान दिया हो कइयों की ह्रदय गति रुकने से बचाया हो वह अपने ही ह्रदय को नहीं समझ पायेगा। कैलिफोर्निया, ओरंज काउंटी (orange county) के रहने वाले लब्ध प्रतिष्ठित डॉ. मोहन राय का निधन १८ मई २००९ को ६५ वर्ष की आयु में उनके निवास पर ह्रदय गति रुक जाने से हो गयी।

डॉ. मोहन राय पूर्णिया(बिहार) के रहने वाले थे तथा उन्होंने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई दरभंगा मेडिकल कॉलेज से की थी। इसी वर्ष फरवरी महीने में दरभंगा मेडिकल कॉलेज ने उनके सम्मान में एक द्वार बनवाया जिसका उदघाटन डॉ. राय के हाथों ही करवाया गया। यह उनकी अन्तिम भारत यात्रा थी।

यों तो मैं डॉ. राय से तीन बार मिली हूँ, पहली बार मेरे बेटे की शादी में दूसरी बार जब मैं कैलिफोर्निया(अमेरिका ) गयी थी तब फ्रीमोंट (Freemont) में, तीसरी बार जब मैं लॉसअन्जेल्स(Los Angeles) गयी थी तो उनके अनुरोध पर उनसे मिलने उनके यहाँ भी गयी थी पर पहले ही मुलाकात में मैं उनकी प्रशंसक बन गयी। एक उच्च विचार रखने वाले, मृदुभाषी डॉ. राय सही मायने में समाज सेवी भी थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दें।

कवि कोकिल विद्यापति


कवि कोकिल विद्यापति

"कवि कोकिल विद्यापति" का पूरा नाम "विद्यापति ठाकुर था। धन्य है उनकी माता "हाँसिनी देवी"जिन्होंने ऐसे पुत्र रत्न को जन्म दिया, धन्य है विसपी गाँव जहाँ कवि कोकिल ने जन्म लिया।"श्री गणपति ठाकुर" ने कपिलेश्वर महादेव की अराधना कर ऐसे पुत्र रत्न को प्राप्त किया था। कहा जाता है कि स्वयं भोले नाथ ने कवि विद्यापति के यहाँ उगना(नौकर का नाम ) बनकर चाकरी की थी। ऐसा अनुमान है कि "कवि कोकिल विद्यापति" का जन्म विसपी गाँव में सन १३५० . में हुआअंत निकट देख वे गंगा लाभ को चले गए और बनारस में उनका देहावसान कार्तिक धवल त्रयोदसी को सन १४४० . में हुआ

यह उन्हीं की इन पंक्तियों से पता चलता है। :

विद्यापतिक आयु अवसान।
कार्तिक धवल त्रयोदसी जान।।

यों तो कवि विद्यापति मथिली के कवि हैं परन्तु उनकी आरंभिक कुछ रचनाएँ अवहटट्ठ(भाषा) में पायी गयी हैं। अवहटट्ठ संस्कृत प्राकृत मिश्रित मैथिली है। कीर्तिलता इनकी पहली रचना राजा कीर्ति सिंह के नाम पर है जो अवहटट्ठ (भाषा) में ही है। कीर्तिलता के प्रथम पल्लव में कवि ने स्वयं लिखा है। :

देसिल बयना सब जन मिट्ठा।
ते तैसन जम्पओ अवहटट्ठा । ।

अर्थात : "अपने देश या अपनी भाषा सबको मीठी लगती है। ,यही जानकर मैंने इसकी रचना की है"।

मिथिला में इनके लिखे पदों को घर घर में हर मौके पर, हर शुभ कार्यों में गाई जाती है, चाहे उपनयन संस्कार हों या विवाह। शिव स्तुति और भगवती स्तुति तो मिथिला के हर घर में बड़े ही भाव भक्ति से गायी जाती है। :

जय जय भैरवी असुर-भयाउनी
पशुपति- भामिनी माया
सहज सुमति बर दिय हे गोसाउनी
अनुगति गति तुअ पाया। ।
बासर रैन सबासन सोभित
चरन चंद्रमनि चूडा।
कतओक दैत्य मारि मुँह मेलल,
कतौउ उगलि केलि कूडा । ।
सामर बरन, नयन अनुरंजित,
जलद जोग फुल कोका।
कट कट विकट ओठ पुट पाँडरि
लिधुर- फेन उठी फोका। ।
घन घन घनन घुघुरू कत बाजय,
हन हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
पुत्र बिसरू जुनि माता। ।

इन पंक्तियों में कवि कोकिल विद्यापति ने ने माँ के भैरवी रूप का वर्णन किया है। कवि  कहते हैं कि असुरों को भय प्रदान करने वाली हे शिवानी ! आपकी जय हो ! हे देवी ! हमें सहज सुबुद्धि दें, वरदान दें। हे देवी आपके चरणों का अनुगत हो चलने में ही हमारी सद्गति है।  आपके चरण सदा मृतक के आसन पर शोभायमान रहता है , आपके सीमांत चंद्रमणि से अलंकृत हैं। कई दानवों को मारकर अपने मुख में रख लिया, अर्थात उसे विलीन कर दिया, तो कईयों गो उगल दिया, कुल्ला की तरह फेंक दिया। आपका रूप श्यामल और आँखें लाल-लाल। ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश में कमल खिला हो। क्रोध से आपके दांत कट-कट करते हुए, दांत के प्रहार से युगल होठ पांडुर फूल की तरह लाल हो गया है । उसपर विद्यमान रक्त का फेन बुलबुलामय है। आपके चरणों के नुपुर से घन- घन का संगीतमय स्वर निकल रहा है। हाथ में कृपाण हनहना  रहा है ।  आपके चरणों के सेवक कवि विद्यापति कहते हैं कि , हे माता आप अपनी संतान को कभी न भूलें  । 

-कुसुम ठाकुर-

तब और अब

पहले भी जाती थी
शादी ब्याह शुभ कार्यों में
आज भी जाती हूँ
अन्तर सिर्फ़ इतना है
पहले मैं सबसे आगे रहती थी
आज सबसे पीछे
पहले लोग मुझे
सौभाग्यवती कहते
आज सौ को हटा
भाग्यवती भी नहीं कहते
कहते हैं तो बस
इसमे हर्ज़ ही क्या है
यह कर लो वह कर लो
सब कर लो यह न कहता कोई।

- कुसुम ठाकुर-

संस्मरण

एक बार एक पत्रिका के लिए मुझे कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रही है।

मैं तो केवल अपनी अभिव्यक्ति किया करती थी लेखनी और लिखने वाला तो कोई और था। उसके सामने मैं अपने आप को उसकी सहचरी, शिष्या एवं न जाने क्या क्या समझ बैठती थी। क्या उनकी कभी कोई रचना ऐसी है जो मैंने शुरू होने से पहले तीन चार बार न सुनी हो, या यों कह सकती हूँ कि लगभग याद ही हो जाता था। एक एक पात्र दिमाग मे इस प्रकार बैठ जाते थे कि एक सच्ची घटना सी मानस पटल पर छा जाता था।

अदभुत कलाकार थे। एक कलाकार मे एक साथ इतने सारे गुण बहुत कम देखने को मिलता है। एक साथ लेखक निर्देशक, कलाकार सभी तो थे वो। मुझे क्या पता कि ऐसे आदमी का साथ ज्यादा दिनों का नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति की भगवान को भी उतनी ही जरूरत होती है जितना हम मनुष्यों को। परन्तु यदि ईश्वर हैं और मैं कभी उनसे मिली तो एक प्रश्न अवश्य पूछूंगी कि मेरी कौन सी गल्ती की सज़ा उन्होंने मुझे दी है। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, न ही भगवान से कभी कुछ मांगी। मैं तो सिर्फ़ इतना चाही थी कि सदा उनका साथ रहे।

यह शायद किसी को अंदाज़ भी न हो कि मुझे हर पल हर क्षण उनकी याद आती है और मैं उन्ही स्मृतियों के सहारे जिंदा हूँ और अपनी जीवन नैया खिंच रही हूँ। उनका प्यार ही है जो मैं अपने आप को संभाल पाई। इतने कम दिनों का साथ फिर भी उन्होंने जो मुझे प्यार दिया, मुझ पर विशवास किया वह मैं किसे कहूं और कैसे भूलूँ ? मैं कैसे कहूं कि अभी भी मैं उन्हें अपने सपनों में पाती हूँ। मैं जब भी उनकी फोटो के सामने खड़ी हो जाती हूँ उस समय ऐसा महसूस होता है मानो कह रहे हों मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।

उनके जाने के बाद मैं ठीक से रो भी तो नहीं पाई। बच्चों को देखकर ऐसा लगा यदि मैं टूट जाउंगी तो उन्हें कौन सम्भालेगा। परन्तु उनकी एक दो बातें मुझे सदा रुला देतीं हैं। ऊपर से मजबूत दिखने या दिखाने का नाटक करने वाली का रातों के अन्धकार मे सब्र का बाँध टूट जाता है।

एक दिन अचानक बीमारी के दिनों मे इन्होने कहा " मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा"? उनकी यह वाक्य जब जब मुझे याद आती है मैं मैं खूब रोती हूँ। क्यों कहा था ऐसा ? एक दिन अन्तिम कुछ महीने पहले बुखार से तप रहे थे। मैं उनके सर को सहला रही थी । अचानक मेरी गोद मे सर रख कर खूब जोर जोर से रोते हुए कहने लगे इतना बड़ा परिवार रहते हुए मेरा कोई नहीं है। मैं तो पहले इन्हें सांत्वना देते हुए कह गयी कोई बात नहीं मैं हूँ न आपके साथ सदा। परन्तु इतना बोलने के साथ ही मेरे भी सब्र का बाँध टूट गया और हम दोनों एक दूसरे को पकड़ खूब रोये। यह जब भी मुझे याद आती है मैं विचलित हो जाती हूँ। मुझे लगता है उनके ह्रदय मे कितना कष्ट हुआ होगा जो ऐसी बात उनके मुँह से निकली होगी।

वैसे मैं शुरू से ही भावुक हूँ परन्तु इनकी बीमारी ने जहाँ मुझे आत्म बल दिया वहीँ मुझे और भावुक भी बना दिया। मैं तो कोशिश करती कि कभी न रोऊँ पर आंसुओं को तो जैसे इंतज़ार ही रहता था कि कब मौका मिले और निकल पड़े। इनके हँसाने चिढाने पर भी मुझे रोना आ जाता था। एक दिन इसी तरह कुछ कह कर चिढा दिया और जब मैं रोने लगी तो कह पडे तुम बहुत सीधी हो तुम्हारा गुजारा कैसे चलेगा। शायद उन्हें मेरी चिंता थी कि उनके बाद मैं कैसे रह पाउंगी। उनके हाव भाव से यह तो पता चलता था कि वो मुझे कितना चाहते थे पर अभिव्यक्ति वे अपनी अन्तिम दिनों मे करने लगे थे जो कि मुझे रुला दिया करती थी। उनके सामने तो मैं हंस कर टाल जाती थी पर रात के अंधेरे मे मेरे सब्र का बाँध टूट जाता था और कभी कभी तो मैं सारी रात यह सोचकर रोती रहती कि अब शायद यह खुशी ज्यादा दिनों का नहीं है।

मुझे वे दिन अभी भी याद है। मैं उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ । वह तो मेरे लिए सबसे अशुभ दिन था। वेल्लोर मे जब डॉक्टर ने मेरे ही सामने इनकी बीमारी का सब कुछ साफ साफ बताया था और साथ ही यह भी कहा कि इस बीमारी में पन्द्रह साल से ज्यादा जिंदा रहना मुश्किल है। यह सुनने के बाद मुझ पर क्या बीती यह मेरे भी कल्पना के बाहर है। आज मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती। मैं क्या कभी सपने मे भी सोची थी कि उनका साथ बस इतने ही दिनों का था। उस रात उन्होंने तो कुछ नहीं कहा पर उनके हाव भाव और मुद्रा सब कुछ बता रहे थे। मैं उनके नस नस को पहचानती थी, या यों कह सकती हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। उस रात बहुत देर से ही, ये तो सो गए पर मुझे ज़रा भी नींद नहीं आयी और सारी रात रोते हुए ही बीत गया।

लोग कहतें हैं कि भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है, पर मैं क्या कहूं मेरे तो समझ में ही कुछ नहीं आता? मैं कैसे विशवास करुँ कि उसने जो मेरे साथ किया वह सही है? मैं तो यही कहूँगी कि भगवान किसी को ज्यादा नहीं देता। उसे जब यह लगने लगता है कि अब ज्यादा हो रहा है तो झट उसके साथ कुछ ऐसा कर देता है जिससे फिर संतुलित हो जाता है। मेरे साथ तो भगवान ने कभी न्याय ही नहीं किया। आज तक मेरी एक भी इच्छा भगवान ने पूरी नहीं की या फिर यह कि मैंने एक ही इच्छा कि थी वो भी भगवान ने पूरी नहीं की। मैंने भगवान से सिर्फ़ इनका साथ ही तो माँगा था? पता नहीं क्यों मुझे शुरू से ही अर्थात बचपन से ही अकेलेपन से बहुत डर लगता था। ईश्वर की ऐसी विडंबना कि बचपन मे ही मुझे माँ से अलग रहना पडा। बाबुजी का तबादला गया से जनकपुर फिर अरुणाचल हो जाने की वजह से मुझे उनसे दूर अपनी मौसी चाचा के पास रहना पड़ा। तब से लेकर शादी तक माँ से अलग मौसी के पास रही। उस समय जब मुझे माँ के पास अच्छा लगता था उससे अलग रहना पडा। शादी के बाद लड़कियों को अपने पति के पास रहना अच्छा लगता है। उस समय मुझे कई कारणों से अपनी माँ के पास कई साल तक रहना पड़ा। पहले माँ के पास छुट्टियों मे जाने का इंतजार करती थी बाद मे इनके आने का इंतजार करने लगी। इसी तरह दिन कटने लगा और एक समय आया जब हम साथ रहने लगे। जो भी था चाहे पैसे की तंगी हो या जो भी हम अपने बच्चों के साथ खुश थे और हमारा जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था। अचानक भगवान ने फिर ऐसा थप्पड़ दिया कि उसकी चोट को भुलाना नामुमकिन है। आज हमारे पास पैसा है घर है बाकी सभी कुछ है पर नही है तो मन की शान्ति, नहीं है तो साथ।

मित्रता

मित्रता

किसी ने कहा
वह मेरा दोस्त है
मेरे बचपन का साथी
हम साथ पढ़े और बढे हैं
क्या इस उम्र मे अब
ऐसा साथी बन सकता है
मैं बोली यह न है सच
साथी या दोस्त
कब कहाँ मिल बन जाए
कहना बहुत मुश्किल है
हाँ सच्चा दोस्त
केवल किस्मत वालों
को ही मिलता है
चाहे बचपन मे मिले
या बुढापे मे।

-कुसुम ठाकुर-