नैनो से बरसात क्यों


(आज की रचना उस प्रिय व्यक्ति के लिए है जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं अपने भावों को लिख पाऊं)

"नैनो से बरसात क्यों"

कह सकूं मैं आज फिर भी न कहूँ वह बात क्यों
छलक रहा जब आज खुशियाँ नैनो से बरसात क्यों 

इंसानियत की बात करते , इंसान तो पहले बनो 
 यदि  ख़ुशी तुम दे न पाओ दे रहे आघात क्यों 

गीत विस्मृत गुनगुनाऊं, अब भी वह अनुराग है
सुर में अपने ही मैं गाऊँ बदल गया जज्बात क्यों 

रिश्ते होते जो भी नाजुक बाँधता उसे प्यार ही
क्षण भंगुर जीवन लगे तो वाणी से फिर घात क्यों 

सींचता है सोच माली गुल से ही गुलजार हो
सुगंध बाँटे जो कुसुम उसे तोड़ते बेबात क्यों 

-कुसुम ठाकुर-