कर में हरसिंगार


"कर में हरसिंगार"

श्वेत केसरिया कोमल सुन्दर 
हो तुम सौम्य प्रतीक 
नम्र भाव को देख कर
भक्त हुए नत शीश 

तुमसे महके चारों दिशाएँ 
हो भक्तों के भक्त 
कष्ट भी उनके सोचते 
गिरो भूमि यह रीति 

देख तुम्हारी नम्रता 
हुए भक्त विभोर
भूमि दोष देखे नहीं
देव चढ़ावें शीश

कद में छोटे हो मगर
सौरभ मन को भाए
सूचना आगमन का
फल होगा सुखदाय

तन्मय होकर चुन रही
चेहरे पर मुस्कान
शिव की करूँ आराधना  
कर में हरसिंगार 

-कुसुम ठाकुर- 

मौन तराना सीख लिया


"मौन तराना सीख लिया"

तिमिर से रिश्ता है मेरा तो उसमे जीना सीख लिया 
छूटे रिश्ते, तन्हाई के जहर को पीना सीख लिया 

यादें आतीं वो बसंत जो बरसों पहले छूटा 
दूर भले पर यादों में अब पास बुलाना सीख लिया 

मिलते हैं कुछ लोग मुझे वे भीड़ में तन्हा जीते हैं 
 मीत बनाकर तन्हाई को हाथ मिलाना सीख लिय़ा

 थिरक रही अब उन यादों में झूले मन सावन के
फ़िक्र करूँ क्या इस दुनिया की मौन तराना सीख लिया 

जब हुई जुदाई बगिया से कुछ कुसुम गए देवालय तक
कुछ को सुन्दर सी परियों ने जूड़े में सजाना सीख लिया 

- कुसुम ठाकुर- 

तुम हो वही पलाश



"तुम हो वही पलाश"

सौंदर्य के प्रतीक 
तुम हो गए विलुप्त 
देख तुम्हें मन खुश हो जाता 
भूले बिसरे आस
तुम हो वही पलाश 

वह होली 
न भूली अबतक 
पिया प्रेम ने रंग दी जिसमे
दमक उठा मेरा अंग रंग  
तुम हो वही पलाश

खेतों के मेड़ पर
  खाली परती जमीन पर
न लगता अब वह बाग़ 
अब कैसे  चुनूँ हुलास 
 तुम हो वही पलाश

वह बसंत
क्या फिर आया 
पर खुशबू ही भरमाया
न भूली कभी बहार 
तुम हो वही पलाश 

-कुसुम ठाकुर-

सावन आज बहुत तड़पाया


"सावन आज बहुत तड़पाया"

फिर बदरा ने याद दिलाया 
पिया मिलन की आस जगाया 

तड़पाती है विरह वेदना 
सोये दिल की प्यास बढ़ाया

कट पाये क्या सफ़र अकेला 
बस जीने की राह दिखाया

पतझड़ बीता और वसंत भी
सावन आज बहुत तड़पाया

आदत काँटों में जीने की
जहाँ कुसुम हरदम मुस्काया

-कुसुम ठाकुर- 

दर्द की सौगात दूँ मैं


"दर्द की सौगात दूँ मैं"

 है इबादत इश्क तो संगीत से पूजा करूँ मैं
हो मुकम्मल या नहीं क्यों व्यर्थ की आहें भरूँ मैं

तिश्नगी मिटती नहीं और मुमकिन भी नहीं
हो रही झंकृत हृदय की वेदना फिर से सुनूँ मैं

भाव कोमल दिल में पलता इश्क सच्चा है अगर
दिल की सारी बातें सुनकर स्वप्न में बेज़ार हूँ मैं

कुछ भी मुमकिन है अगर नित भाव सपनों के सजे
भूल कर के प्यार को क्यों दर्द की सौगात दूँ मैं

प्यार में संजीदगी का है अलग इक मोल अपना
है यही फितरत कुसुम की हारकर भी खुश रहूँ मैं

-कुसुम ठाकुर-

इबादत - ईश्वर की उपासना, पूजा 
मुकम्मल - पूर्ण, पूरा
तिश्नगी - प्यास, पिपासा 
संजीदगी - गंभीरता 

रास्ते मुश्किल पड़ी है


"रास्ते मुश्किल पड़ी है"

 याद आए जो घडी अब, वो घडी मुश्किल बड़ी है
देख जिसको मुस्कुराऊँ, क्या कोई मुमकिन कड़ी है

हो के विह्वल कह दूँ सारी, बातें दिल की सोचती
बेड़ियाँ भी कम नहीं है, रास्ते मुश्किल पड़ी है

नैन समझे सब इशारे, दर्द सहकर कह न पाए
हो किनारे कह सकूँ पर, वो बहुत नाजुक घड़ी है

तोड़ के बंधन सभी गर, कह सकूँ जज्बात दिल के
क्यूँ लगे आघात दिल को, आंसुओं की ये लड़ी है

है कुसुम की कामना, हर स्वप्न ही तुमसे सजेंगे
मुस्कुराऊँ याद में फिर, भाव की ऐसी लड़ी है

-कुसुम ठाकुर- 

मन जाने क्या क्या कहता है


"मन जाने क्या क्या कहता है"

मन तो प्रतिपल ही बहता है 
पर बंधन का दुःख सहता है 

उठ तरंग जब छू ले मन को 
तब तब मन चंचल रहता है 

जब तरणी में बैठकर डोले 
मन जाने क्या क्या कहता है  

जब अपनों से चोट लगे तो 
बना खंडहर मन ढहता है 

सफल कुसुम जीवन है उसका 
सच्चे प्रेमी संग रहता है

- कुसुम ठाकुर-  

नैन बहुत कुछ कह जाते हैं


"नैन बहुत कुछ कह जाते हैं"

नैन बहुत कुछ कह जाते हैं, कितना भी इन्कार करो 
मगर समर्पण मूल प्रेम का, यह भी तो इकरार करो 

प्रेम की सीमा उम्र नहीं है जानो, मत अनजान बनो 
भले ह्रदय में द्वन्द के कारण, चाहो तो इज़हार करो 

बनो नहीं नादान कभी तुम, समझो सभी इशारों को 
और समेटो हर पल खुशियाँ, कभी नहीं तकरार करो 

चार दिनों का यह जीवन है,प्रेम फुहारें हों सुरभित 
कहीं वेदना अगर विरह की, उस पल को भी प्यार करो 

काँटों में रहकर जीने की, कला कुसुम ने सीख लिया 
देर हुई है मत कहना फिर, आकर के स्वीकार करो 

-कुसुम ठाकुर-